
वर्तमान समय मृदा की विषाक्तता और इसके दुष्परिणाम Publish Date : 19/08/2026
वर्तमान समय मृदा की विषाक्तता और इसके दुष्परिणाम
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
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मृदा के अन्दर छिपी हुई अनेक प्रकार की समस्याएं, जो किसानों की फसलों को नुकसान पहुँचाती हैं।
“जब आपकी मृदा में हानिकारक पदार्थों का स्तर इतना अधिक हो जाता है कि वह पौधों को नुकसान पहुँचाने लगते हैं और साथ ही टनय लाभकारी सूक्ष्म जीवों को मारने लगते हैं, अथवा पौधों के द्वारा किए जाने वाले पौषक तत्वों के अवशोषण क्रिया को अवरूद्व कर देते हैं। इस समस्या के विभिन्न कारण हो सकते हैं” जैसे कि-
अत्याधिक उर्वरकों का प्रयोग करना-
- रासायनिक उर्वरर्कों का अत्याधिक प्रयोग करने से फसलीय पौधों की जड़ें जलने लगती हैं।
- पौधों के अन्दर पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता हैं।
- रासायनिक उर्वरक जमीन में नमक के स्तर में बढ़ोत्तरी करते हैं।
रासायनिक अवशेष
रासायनिक उर्वरकों का अत्याधिक प्रयोग करने से जमीन, जल एवं फसल के उत्पादों में रासायनिक उर्वरकों के अवशेष रह जाते हैं जो कि मृदा स्वास्थ्य, पर्यावरण, जल, वायु एवं मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्व होते हैं।
विषाक्त मृदा के लक्षण:
जमीन में लवणता का प्रभाव:
- जब किसान भाई अपनी फसल की सिंचाई करते हैं तो जमीन के अन्दर के लवण पानी के साथ एकत्र हो जाते हैं।
- इसके फलस्वरूप पौधों की जड़ों को जल तथा अन्य पोषक तत्वों का अवशोषण करने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ता हैं।
मृदा में रासायनिक अवशेषों का स्तर में वृद्वि
- विषाक्त मृदा के कारण फसलों की वृद्वि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
- इससे फसलीय पौधों की पत्तियों के किनारे या तो पीले पड़ने लगते हैं अथवा जलने लगते हैं।
- फसलीय पौधों की जड़ों का विकास भी समुचित रूप से नहीं होता है।
- ऐसी मृदा में लगाए गए खाद का प्रभाव आशा के अनुरूप नहीं मिल पाता है और किसानों को आर्थिक हानि का समाना करना पड़ता है।
भारी धातुओं के स्तर में वृद्वि
रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का अत्याधिक प्रयोग करने से भूमि में व्याप्त विभिन्न भारी धातुओं जैसे कि लैड (Pb), कैडमियम (Cd) और ऑर्सेनिक (As) आदि के स्तर में वृद्वि होने लगती है, जो कि फसल के उत्पादों में प्रवेश कर हमारे स्वास्थ्य को हानि पहुँचाती हैं।
पीएच का असंतुलन
- रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों का अन्धाधुन्ध प्रयोग करने से मृदा के अम्लीय अथवा क्षारीय प्रभाव में वृद्वि होती है।
- इससे विषैले तत्व अधिक मात्रा में मुक्त होते हैं।
- इससे मृदा अधिक अम्लीय अथवा क्षारीय हो जाती है।
हालांकि, विषाक्त मृदा सदैव ही क्षतिग्रस्त अथवा समस्या युक्त दिखाई नहीं देती है, जबकि पौधों की जड़ें मृदा की विषाक्तता को शीघ्रता से महसूस कर सकती हैं।
सम्भवतः आप समझते हैं कि “बस अधिक से अधिक खादों का प्रयोग करें तो फसलें अपने आप ही अच्छी होने लगेंगी”।
अधिकतर हमारे किसान भाई यही समझते हैं, जबकि देखा जाए तो यह कहानी केवल एक भाग ही है, क्योंकि कोई भी खाद कभी अकेले काम नहीं करती है। खाद का क्या, कैसे और कितना प्रभाव होगा यह तो आपके खेत की मृदा प्रणाली पर ही अधिक निर्भर करता है। ऐसे में यदि आपके खेत की मिट्टी की संरचना खराब है, उसकी संघन्न प्रक्रिया सही नहीं है, आपके खेत की मिट्टी में जैविक गतिविधियाँ कम हैं और उसकी रासायनिक एवं भौतिक संरचना खराब है तो आप चाहे उसमें कोई भी खाद, कितनी भी अधिक मात्रा में प्रयोग क्यों न प्रयोग कर लें उसका आपको सही प्रतिफल नहीं मिल पाएगा।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
