जलवायु परिवर्तन के समय फसल उत्पादन की आधुनिक रणनीतियाँ      Publish Date : 18/08/2026

जलवायु परिवर्तन के समय फसल उत्पादन की आधुनिक रणनीतियाँ

                                                                                        प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

जलवायु परिवर्तन के वर्तमान दौर में कृषि क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन आज सम्पूर्ण विश्व के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहां बहुत से किसान वर्षा आधारित खेती पर निर्भर करते हैं। फसल उत्पादन को लगातार तापमान में वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में बदलाव, लंबे सूखे, अचानक बाढ़, ओलावृष्टि, लू और और असामान्य घटनाएं कृषि को प्रभावित करती हैं। किसानों को इन हालात में उत्पादन को बनाए रखना, खर्च कम करना और प्राकृतिक संसाधनों का बचाव करना बहुत कठिन कार्य है।

औसत तापमान पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है, जिससे फसलों की वृद्धि अवधि कम हो गई है। अत्यधिक तापमान प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करता है, जिससे पौधों का विकास रुकता है। गेहूँ जैसी फसलों में दानों का भराव कम होता है, लेकिन धान में फूल आने के समय अधिक तापमान परागण को प्रभावित करता है। अनियमित वर्षा के कारण कभी बहुत अधिक जलभराव होता है तो कभी लंबे समय तक सूखे होते हैं। बीज अंकुरण, पौधों की वृद्धि और उत्पादन सभी इससे प्रभावित होते हैं। साथ ही, बदलती जलवायु के कारण रोग और कीट तेजी से फैल रहे हैं, जो किसानों की उत्पादन लागत को बढ़ा रहा है।

जलवायु अनुकूल किस्मों का चयन तापमान, सूखा, जलभराव और लवणीय हालात को सहन करने वाली फसलों का चयन करना जलवायु परिवर्तन से निपटने का सबसे प्रभावी तरीका है। विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICARI) निरंतर उन्नत किस्में विकसित कर रहे हैं जो बदलती जलवायु के अनुरूप अधिक उत्पादन देते हैं। उचित किस्म का चयन करते समय, स्थानीय जलवायु, मिट्टी, सिंचाई की उपलब्धता और बाजार की मांग को ध्यान में रखना चाहिए। इससे उत्पादन स्थिर रहता है और जोखिम कम होता है। जल संरक्षण एवं आधुनिक सिंचाई तकनीक जलवायु परिवर्तन ने जल संसाधनों पर लगातार प्रभाव डाला है। इसलिए प्रत्येक बूंद पानी का सही उपयोग होना चाहिए। ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर सिंचाई, रेनगन और माइक्रो इरिगेशन जैसे तरीके पानी को 30 से 50 प्रतिशत तक बचाते हैं। साथ ही पौधों को पर्याप्त मात्रा में जल मिलने से पोषक तत्वों का उपयोग अधिक प्रभावी तरीके से होता है। वर्षा जल को संग्रहित करने में खेत तालाब, चेक डैम और कृषि पॉन्ड जैसी संरचनाएँ महत्वपूर्ण हैं। इससे सूखे में भी सिंचाई की जा सकती है। संरक्षण कृषि का महत्व वर्तमान में, संरक्षण कृषि एक महत्वपूर्ण खेती तकनीक बन चुकी है।

फसल अवशेषों का संरक्षण और फसल चक्र शामिल हैं। इससे मृदा अपरदन कम होता है, कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है और मिट्टी की नमी बनी रहती है। संरक्षित कृषि न केवल जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों को कम करती है, बल्कि ईंधन बचाता है, उत्पादन लागत कम करता है और मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन जैविक और अकार्बनिक स्रोतों का संतुलित उपयोग, केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय अधिक लाभदायक सिद्ध हो रहा है। मिट्टी उर्वर रहती है जब गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, जैव उर्वरक और रासायनिक उर्वरकों का समान रूप से उपयोग किया जाता है। मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरक का प्रयोग करने से लागत कम होती है और पर्यावरण को प्रदूषित होने का खतरा भी कम रहता है। इससे पौधों को सही पोषण मिलता है और उपज की गुणवत्ता बढ़ावा देना है। किसानों के लिए सुझाव किसानों को बदलती जलवायु के अनुसार समय पर बुवाई, मृदा परीक्षण, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, सूक्ष्म सिंचाई, फसल बीमा, और मौसम पूर्वानुमान का नियमित उपयोग करना चाहिए। किसान कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों में प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेकर नवीन तकनीकों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

निष्कर्ष

कृषि क्षेत्र के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती है, लेकिन इसके बुरे प्रभावों को कम करने के लिए जल संरक्षण, संरक्षण कृषि, फसल विविधीकरण, डिजिटल कृषि, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन जैसी नवीनतम वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। भविष्य की खेती अधिक उत्पादन पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि संसाधन-संरक्षण, जलवायु - अनुकूल और टिकाऊ प्रणाली पर आधारित होगी। यदि किसान, वैज्ञानिक, नीति निर्माता और कृषि संस्थान मिलकर काम करें, तो बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए कृषि को अधिक लाभकारी और स्थायी बनाए रखा जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।