
परकोटों की दरकार Publish Date : 04/08/2026
परकोटों की दरकार
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं इं0 कार्तिकेय
बड़ी टेक कंपनियां अपने एआइ उत्पादों को अपरिहार्य बताती हैं और नियम-कायदों को नवाचार एवं मुक्त व्यापार विरोधी कहकर खारिज करती हैं। नतीजतन भारत को ऐसे वैश्विक नियम-कायदे अपनाने पड़ते हैं जो यहां के लोगों के मुफीद नहीं होते-
एआइ गवर्नेस के बारे में भारत का नजरिया इसकी क्षमताओं और कमजोरियों की साफ-साफ समझ से संचालित होना चाहिए। नया साल हमारे नेताओं को सोचने-समझने का मौका देता है कि इसका क्या मतलब है। वे उद्योग की ओर से सामने रखे गए घिसे-पिटे विचारों से आगे बढ़कर एआइ के वैश्विक नियामकीय विमर्श में नेतृत्व की भूमिका का दावा कर सकते हैं। यह भारत के उस समृद्ध इतिहास के अनुरूप होगा जिसमें हम वैश्विक नियम तय होते वक्त अपने विचारों का योगदान देते रहे हैं।
यह हंसा मेहता के उस ऐतिहासिक हस्तक्षेप से शुरू हुआ जिसमें उन्होंने यह पक्का किया कि मानवाधिकारोंकी सार्वजनिक घोषणा 'पुरुषों' के बजाए 'मनुष्यों' के अधिकारों के बारे में हो। वैसे, संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर इंटरनेट गवर्नेस के लिए वैश्विक निकाय बनाने के भारत के प्रस्ताव को पर्याप्त सियासी ताकत नहीं मिल सकी, मगर वह दूरदर्शी विचार था जिसने जरूरी बहसों की नींव रखी।वर्षों संयुक्त राज्य अमेरिका में अलग-थलग रहने के बाद मैंने दिल्ली में एक बड़ी टेक्नोलॉजी लीडरशिप समिट में हिस्सा लिया, और एआइ गवर्नेस पर आलोचनात्मक नजरियों को मिटाए जाते देख निराश हुई।
राजनीति और उद्योग के अगुआओं ने भारत में एआइ के विकास के लिए उत्साह दिखाया मगर इस बात पर कम ही चर्चा हुई कि नियम-कायदे कैसे नवाचार और विस्तार से ज्यादा सुरक्षा दे सकते हैं। यह एआइ उद्योग के हाथों गढ़े गए उस परेशान करने वाले वैश्विक रुझान (जिसे मैं सिलिकॉन वैली प्रभाव कहती हूं) के अनुरूप है जो एआइ के लिए नियामकीय-मुक्त एजेंडे की तरफदारी करता है। यह बड़ी टेक कंपनियों के एआइ उत्पादों को अनिवार्य बताकर ऐसा करता है। यही नहीं, यह नियम-कायदों को नवाचार-विरोधी और मुक्त व्यापार-विरोधी मानकर ऐसा करता है। यह पहली बार नहीं है जब भारत के सामनेऐसी वैश्विक नियामकीय रूपरेखाएं रखी गई हैं जो उसके लोगों के लिए कारगर नहीं हैं।
एआइ के नियमन में भारत को न केवल नवाचार की जगह और एआइ उत्पादों के बाजार के रूप में बल्कि दुनिया को कुशल-अकुशल श्रम प्रदाता के तौर पर भी अपनी भूमिका पर विचार करने की दरकार है। इसमें एआइ को ईंधन देने वाला डेटा उत्पन्न और प्रोसेस करना, और वैश्विक एआइ कंपनियों के लिए डेटा केंद्रों और एआइ के अन्य बुनियादी ढांचों (जो पर्यावरण पर असर डालते हैं) की मेजबानी शामिल है। हमारे नेताओं को एआइ गवर्नेस के ऐसे विकल्प चुनने की जरूरत है जो उस वक्त बहुसंख्यक भारतीयों को सुरक्षा प्रदान करें जब वैश्विक एआइ उद्योग अपनी जरूरतों के लिए भारत का रुख करेगा। हम भले बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के सीईओ पैदा करते हों मगर भारत उन श्रमिकों तथा पेशेवरों का भी घर है जो एआइ उद्योग के लिए अपनी जिंदगी और सेहत जोखिम में डालते हैं।

जेनरेटिव एआइ का गहरा असर उन भारतीयों पर भी पड़ा है जिन्होंने कभी इसका इस्तेमाल नहीं किया। कई लोगों ने बेहद कम मेहनताने पर ई-कचरे को संभाला। कई लोग इससे निकले जहरीले रसायनों और भारी धातुओं के असर में आए। सरकार कंपनियोंके प्रतिरोध के बावजूद ई-कचरे को नियम-कायदों के दायरे में लाने की सराहनीय कोशिश कर रही है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक उद्योग के लिए एक न्यूनतम कीमत तय की गई है जो उन्हें इस कचरे का प्रबंधन करने वाले रिसाइक्लरों को चुकानी होगी। यह देखते हुए कि ई-कचरा वैश्विक समस्या है, भारत आगे बढ़कर वैश्विक अगुआई संभाल सकता है, न सिर्फ इस मामले में कि रिसाइक्लिंग की लागत कौन उठाए, बल्कि बेहतर डिजाइन और टिकाऊ उत्पादों सरीखे उभरते सवालों के मामले में भी। ये सवाल महज टिकाऊपन को लेकर नहीं बल्कि बाजार को डिजाइन के नवाचारों के लिए खोलकर अवसरों के निर्माण के बारे में भी हैं।
एआइ उद्योग छोटे वक्त की नौकरियां पैदा करता है। कुशल भारतीय ग्रेजुएट डेटा लेबलिंग के लाभप्रद उद्योग को ताकत देते हैं, जिसमें वे एआइ को प्रशिक्षित करने के लिएजरूरी डेटा को साफ और लेबल करते हैं। अस्थायी तौर पर तो यह फायदेमंद रोजगार है मगर काम के घंटे और परिस्थितियां शोषणकारी हैं। ये ग्रेजुएट ऐसे उद्योग में हैंजिसमें उनकी न तो लगातार तरक्की होती है और न पेंशन मिलती है। कानून भी उन्हें नौकरी के उन गुमराह करने वाले विज्ञापनों का शिकार होने से बचाने के लिए कुछ नहीं करता जिनके जरिए उन्हें इन कामों के लिएलुभाया जाता है, जहां वे इंजीनियर की तरह करिअर की वृद्धि की उम्मीद करते हैं, न कि जॉब वर्कर के तौर पर बंधकर रह जाने की। शिक्षा और कड़ी मेहनत के बल पर भारतीय सपने को साकार करने की कोशिश कर रहे पहली पीढ़ी के पेशेवर इसलिए इसका शिकार हो जाते हैं क्योंकि उनके पास जानकारी का कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं होता। उन्हें वे श्रम अधिकार हासिल नहीं हैं जिन्हें उनसे पहले केकार्यबल ने कड़े मोलभाव के जरिए हासिल किया था। दुर्भाग्य से श्रम कानून से जुड़े सुधार समूचे कार्यवल के लिए श्रम अधिकारों में कटौती की तरफदारी करते नजर आते हैं।
लागू किए जाने योग्य डेटा सुरक्षा कानूनों और मजबूत उपभोक्ता कानूनों के बिना भारतीय जेनरेटिव एआइ चैटबॉट से होने वाले नुक्सान के आगे वेबस हैं। बड़ी एआइ कंपनियां भारत में इन औजारों को मुफ्त में दे रही हैं। इसी की बदौलत वे कई भारतीयों पर अध्ययन और प्रयोग कर पाती हैं। एहतियात से लागू किए गए निजता और उपभोक्ता कानूनों के बिना बड़े पैमाने पर नुक्सान होना तय है। यह सिर्फ वक्त की बात है कि कब ये उत्पाद अपने उपयोगकर्ताओं को नुक्सानदायक कंटेंट का निशाना बनाने लगेंगे। कानून को उनका नियमन और यह स्पष्ट करने की दरकार है कि उपयोगकर्ता अपनी शिकायत का निवारण कैसे कर सकते हैं।
जब अन्य देश भी एआइ उत्पादोंको नियम-कायदों के दायरे में लाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, ऐसे में भारत को दो कदम बढ़ाकर आगे आना चाहिए,सवाल उठता है कि कैसे? इसके छोटे वक्त के जवाब उन नीतिगत प्रस्तावों की शक्ल में हैं जिन पर सरकार पहले ही विचार कर रही है, जैसे एआइ कंपनियों को उस कंटेंट की कीमत अदा करने के लिए मजबूर करना जिसका वे मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह श्रम, पर्यावरण और डेटा की सुरक्षा के लिए तथा एआइ के नुक्सानदायक उत्पादों को नियम-कायदों के दायरे में लाने के लिए बहुत कुछ कर सकता है। और इसे इसकी तरह ही वैश्विक अगुआई की भूमिका ले रहे दूसरे देशों के साथ भी जोड़ना चाहिए। एआइ का बढ़ता इस्तेमाल पारदेशीय कानूनी नियम-कायदों को जरूरी बना देता है।
एआइ के नुक्सानों का अनुमान लगाने और उनसे बचने के साथ-साथ भारतीयसमाज के लिए इसकी क्षमता का पूरा इस्तेमाल करने के लिए और ज्यादा काम करने की जरूरत है। इसके लिए विज्ञान में निवेश के साथ समाज का अध्ययन करने और बेहतरीन शिक्षकों को आकर्षित करने में निवेश करना होगा। एआइ टेक्नोलॉजी और समाज के बीच पारस्परिक असर का मसला है। भारतीय समाज पेचीदा और दिलचस्प है, जिससे यहां टेक्नोलॉजी पर हुए शोध दुनिया के लिए प्रासंगिक हो जाते हैं। सही संसाधनों के साथ अध्येता यह अध्ययन कर सकते हैंकि टेक्नोलॉजी भारत पर कैसे असर डाल रही और हमारे लिए कैसे फायदेमंद हो सकती है।एआइ समाज में अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल करने के लिए राजनेताओं को भारत के नगाड़े की धुन पर चलना होगा, विदेशी एआइ फर्मों की लय पर नहीं।
वे कोशिश जरूर कर रहे हैं, मगर आलोचनात्मक समेत विभिन्न नजरियों में निवेश किए बिना ऐसी दूरदृष्टि और कल्पनाशक्ति हासिल कर पाना कठिन है जो इस नई टेक्नोलॉजी और समाज के संगम से उत्पन्न संभावित नतीजों और मौकों को राजनेताओं के सामने पेश करे। अगर उन्हें हमारे पेचीदा समाज के हिसाब से ढली कानूनी रूपरेखा को लेकर आना है, तो उन्हें तरह-तरह के ज्ञान, राय और आवाजों की जरूरत है।
खास बातें
- वैश्विक एआइ उद्योग अपनी जरूरतों के लिए भारत का रुख कर रहा। ऐसे में भारत को अपने लोगों को सुरक्षा देने वाले विकल्पों की जरूरत।
- मजबूत डेटा और उपभोक्ता संरक्षण कानून बेहद जरूरी हैं; भारतीय लोग जेनरेटिव एआइ चैटवॉट के आगे बेबस हैं।
- भारत के जटिल और विविध समाज से निकलने वाले विचार वैश्विक एआइ नीति में इसके नेतृत्व की दावेदारी को मजबूत कर सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
