
बढ़ते तापमान का प्रभाव Publish Date : 31/07/2026
बढ़ते तापमान का प्रभाव
प्रो0 आर. एस. सेंगर
ग्रीनहाउस प्रभाव, पृथ्वी के वायुमंडल में कुछ गैसें ऐसी होती हैं जो सूर्य से आने वाली ऊष्मा को रोककर पृथ्वी को गर्म बनाए रखती हैं। उन्हें ग्रीनहाउस गैसें कहते हैं। मुख्य ग्रीनहाउस गैसें कार्बन डाइऑक्साइड (+CO_2+), मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, ओजोन, क्लोरोफ्लोरोकार्बन हैं। इन गैसों की सामान्य मात्रा पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन जब इनकी मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है, तब वैश्विक तापमान में वृद्धि होने लगती है। जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, औद्योगिक संयंत्रों से होने वाला प्रदूषण, वनों की कटाई, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का अत्यधिक उपयोग इसके मुख्य कारण हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद से वातावरण में इन गैसों की मात्रा में भारी वृद्धि हुई है, जिससे वैश्विक तापमान बढ़ रहा है।
रेडियोधर्मी गैसों का उत्सर्जन औद्योगिक और लोक-प्रथाओं में ईंधन के रूप में अत्यधिक उपयोग गैसों को बढ़ावा देता है। यह उच्च स्तर पर वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा की मात्रा को प्रभावित करता है और तापमान में इस तरह का अत्यधिक परिवर्तन ही सामान्य रूप से "ग्लोबल वार्मिंग" कहलाता है। यह वर्तमान में सबसे बड़ी वैश्विक चुनौतियों में से एक बन चुका है। रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2025 में तापमान बहुत तेजी से बढ़ा है, जो इसके वैश्विक प्रभावों को दर्शाता है।
भारतीय परंपरा के अनुसार मौसम एवं लोक कथाओं के अनुसार सौर ऊर्जा के तीखे प्रभाव से पृथ्वी काफी गर्म हो जाती है, जिससे जल स्रोतों में कमी आने लगती है। इस गर्मी के कारण कई जगहों पर जल संकट की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है और लोग पानी की कमी से परेशान होने लगते हैं। इन दिनों में लोग पानी की किल्लत से जूझते हैं, नदियों, तालाबों का जलस्तर नीचे चला जाता है और धरती सूखने लगती है। इस अवधि में धरती सूर्य के सबसे नजदीक (25 मार्च से 2 जून) मानी जाती है। इस दौरान तापमान बढ़ने से जो हवाएं उठती हैं, वह काफी तेज और गर्म होती हैं, जिसे 'लू' कहा जाता है। इन दिनों में सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं और तापमान में अत्यधिक वृद्धि देखने को मिलती है। यह समय पूरे वर्ष का सबसे गर्म समय माना जाता है, जिसमें लोगों को अत्यधिक गर्मी का सामना करना पड़ता है।

वैज्ञानिक और लोक-प्रथाओं के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव भारी नुकसान का संकेत देता है। मौसम का चक्र प्रभावित होता है और बारिश की कमी के कारण कृषि क्षेत्र में भारी नुकसान होता है। वनों की कटाई और अत्यधिक उत्सर्जनों से वैश्विक तापमान में भारी वृद्धि होती है। इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं हमारी अपनी गलतियों और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार का परिणाम हैं, जिससे हमें आर्थिक और सामाजिक विकास में काफी नुकसान उठाना पड़ता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस अवधि (मई के अंत और जून की शुरुआत) के दौरान सूर्य पृथ्वी के सबसे करीब होता है और पृथ्वी का झुकाव ऐसा होता है कि सूर्य की किरणें सीधे उत्तरी गोलार्ध पर पड़ती हैं। यही कारण है कि इस दौरान तापमान में रिकॉर्ड वृद्धि देखने को मिलती है और मौसम काफी शुष्क हो जाता है।
जलवायु के इस तीव्र परिवर्तन के कारण, वनों से दूध से सूखे, पत्तियां सूखने लगी हैं, हल्के सूखे कपड़े पहने, नींबू पानी आदि पीने, बच्चों और बुजुर्गों को विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है। जलवायु परिवर्तन और भूजल के गिरते स्तर के कारण आज पूरी दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इसके पीछे अनेक वैज्ञानिक कारण कार्य कर रहे हैं। भारत के संदर्भ में बात करें तो 15 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपने भूजल का अत्यधिक दोहन कर रहे हैं-पंजाब, राजस्थान और हरियाणा जितना भूजल निकालते हैं, उसकी मात्रा पुनर्भरण की तुलना में कहीं ज्यादा है। इसके अलावा, औद्योगिक गतिविधियों और शहरी कचरे के अनुचित प्रबंधन के कारण पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार, पिछले एक दशक में वनों की कटाई और कार्बन उत्सर्जन में भारी वृद्धि हुई है, जिससे पृथ्वी का सुरक्षा कवच कमजोर हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में इसके और भी भयानक और विनाशकारी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इसके लिए सामूहिक प्रयासों, जन-जागरूकता और पर्यावरण-अनुकूल नीतियों को अपनाना बेहद जरूरी है, ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य दे सकें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
