आज का सिरदर्द बनता प्लास्टिक खुद बनेगा दर्द की दवा      Publish Date : 28/07/2026

आज का सिरदर्द बनता प्लास्टिक खुद बनेगा दर्द की दवा

                                                                                                                     प्रो0 आर. एस. सेंगर

प्लास्टिक प्रदूषण इस समय की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। जिसकी वजह से हर साल, लाखों टन प्लास्टिक कचरा हमारे महासागरों को अवरुद्ध कर रहा है, वन्यजीवों का दम घोंटता रहा है, तथा सदियों तक लैंडफिल में यूँ ही पड़ा रहता है जो कि कई तरह की भयंकर बीमारियों को जन्म देता है।

यूँ तो लगभग हर तरह कि प्लास्टिक हमारे पर्यावरण को नुकसान ही पहुँचाती है लेकिन अगर बात की जाये एक साइलेंट किलर प्लास्टिक की तो सबसे आम है पॉलीइथिलीन टेफ्थेलेट (PET) है जो की पानी की बोतलों से लेकर लगभग हर खाद्य पैकेजिंग तक में मौजूद है और साथ ही साथ हमारे शरीर में मइक्रोप्लास्टिक के रूप में प्रवेश करता जा रहा है जिसकी घातकता का हमें अभी कोई अंदाज़ा भी नहीं है।

                                 

लेकिन जरा सोचिये, क्या होगा अगर इसी साइलेंट किलर प्लास्टिक यानि की पेट (PET) को ही दवा जैसी किसी लाभकारी चीज़ में परिवर्तित किया जा सके।

इसी संकट का निवारण ढूंढ निकला है वैज्ञानिकों ने, नेचर केमिस्ट्री पत्रिका में प्रकाशित एक अभूतपूर्व अध्ययन के अनुसार, वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक कचरे को पैरासिटामोल (जिसे एसिटामिनोफेन भी कहा जाता है) में परिवर्तित किया है, जो दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली दर्द व बुखार की दवा है जो की आमतौर पर हम सभी के घरों में हर वक्त मौजूद रहती है।

                                

यह अविश्वसनीय उपलब्धि रसायन विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी के एक अद्भुत और सटीक मिश्रण का उपयोग करके हासिल की गई है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।