धुंध में घुलता जीवन      Publish Date : 23/07/2026

                धुंध में घुलता जीवन

                                                                                                                     प्रो0 आर. एस. सेंगर

आज भारत (ख़ास कर दिल्ली जैसे बड़े शहरों) वायु प्रदूषण एक जटिल और बहुआयामी समस्या बन गयी है, जिसका समाधान केवल तकनीकी उपायों से नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता, नीति निर्माण और सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। भारत में बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण और कृषि गतिविधियों के कारण प्रदूषण स्तर चिंताजनक हैं। अतः आवश्यक है कि सरकार, हमारा समाज और उद्योग मिलकर इस समस्या का समाधान करें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण मिल सके।

वायु, जिसमें जीवन का संचार है, आज समूची मानव सभ्यता के लिए गहरी चिंता का विषय बन चुकी है। हमारी धमनियों में प्रवाहित जीवन-लहरों का आधार यही शुद्ध वायु है; इसकी शुचिता ही शरीर, मन और समाज की सेहत का सहारा है। किंतु वर्तमान समय में वायु की मलिनता ने केवल फेफड़ों को ही नहीं, मानव की चरित्र और चेतना को भी धुंधला कर दिया है, जिससे मानव के सोच की स्पष्टता मटमैली पड़ गई है, संवेदना थककर बैठ गई है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि अपराधी किसे ठहराएँ? 'रोटी' की तलाश में जलाया जाने वाला 'कोयला', जो आजीविका का कड़वा सच है, या विकास के नाम पर निरंतर धुआँ उगलती चिमनियाँ, जो समृद्धि का चमकीला भ्रम रचती हैं। वास्तव में दोष एक का नहीं, 'व्यवस्था' एवं व्यवहार दोनों का है। जैसे ही मनुष्य की आजीविका और पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता है, वायु तुरंत अपना 'प्रतिकार' दर्ज कराती है। इसलिए आवश्यक है कि विकास की रफ्तार और शुद्ध वायु की मर्यादा को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय उन्हें सहयात्री बनाया जाए। जहाँ उद्योग उत्तरदायित्व निभाएँ, नीतियाँ कठोर होते हुए भी संवेदनशील रहें, वहीं नागरिक उच्च आचरणों को अपनाते हुए वायु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करें, ताकि हमारी साँसें फिर हल्की हों और हमारी चेतना पर जमी धूल हट सके।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, आज वैश्विक स्तर पर 99% आबादी ऐसी वायु में साँस ले रही है जिसमें प्रदूषकों की मात्रा उसके मानकों से कहीं अधिक है, और इसका सबसे बड़ा भार निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों पर पड़ रहा है। यह आँकड़ा मात्र एक संख्या नहीं, बल्कि करोड़ों रसोइयों, गलियों, फैक्ट्रियों और खेतों की एक 'धुओं-भरी' कथा है। इसी सच को 'द स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2024' और कठोर बनाती है, जो बताती है कि वर्ष 2021 में अकेले वायु प्रदूषण 8.1 मिलियन मौतों का कारण बना जो कि उस वर्ष मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा जोखिम कारक भी था। इन मौतों का बड़ा हिस्सा उन बीमारियों से जुड़ा है जो देह को भीतर से क्षीण कर देती हैं अर्थात, हृदयरोग, स्ट्रोक, सीओपीडी, फेफड़ों का कैंसर, मधुमेह इत्यादि। यह स्थिति हमें चेताती है कि स्वच्छ वायु कोई विलासिता नहीं, बल्कि मूल मानवाधिकार है, और आने वाले समय में मनुष्य के विकास की सच्ची कसौटी वही होगी, जो सांस लेने योग्य भविष्य की निश्चितता दे पाए।

वायु प्रदूषण के मुख्य कारण

उत्पन्न हुए हैं। वायु प्रदूषण के सबसे प्रमुख वायु प्रदूषण के 'कारक' अत्यंत जटिल और विविध हैं, जो मानव सभ्यता के अविचारित एवं अनियंत्रित विकास के कारण कारणों में औद्योगिकीकरण का अनियंत्रित विस्तार शामिल है, जहाँ पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखे बिना फैक्ट्रियों और संयंत्रों का निर्माण अवैध रूप से निरंतर किया जा रहा है। इन औद्योगिक प्रक्रियाओं से अत्यधिक मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा अन्य रासायनिक प्रदूषकों का उत्सर्जन होता है, जो वायु-गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन भी एक मुख्य कारण है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई, खनन गतिविधियाँ और निर्माण कार्य वातावरण में धूल-कणों और विषैले तत्वों की मात्रा बढ़ाते हैं। वनों की कटाई से न केवल वातावरण में ऑक्सीजन की आपूर्ति घटती है, बल्कि वन-परितंत्र की जल, मिट्टी और वायु को शुद्ध रखने की प्राकृतिक क्षमता भी क्षीण हो जाती है। इसके अतिरिक्त, कृषि गतिविधियाँ, विशेषकर 'पराली' जलाने की प्रथा ने हाल के वर्षों में प्रदूषण को और बढ़ा दिया है। हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों में पराली दहन से विशाल मात्रा में धुआँ उठता है, जो न केवल स्थानीय क्षेत्रों बल्कि आस-पास के शहरी केंद्रों (जैसे कि दिल्ली) की वायु-गुणवत्ता को भी विकट बनादेता है।

इसी क्रम में, कोयला जलाने से सल्फर डाइऑक्साइड एवं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें वायुमंडल में फैलती हैं, जो वायु को और अधिक दूषित करती हैं। इसके अलावा, तेजी से बढ़ते वाहनों का बेड़ा भी वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। शहरों में वाहनों की अति-वृद्धि और उनसे निकलने वाले कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO2) तया पार्टिकुलेट मैटर (PM) जैसे उत्सर्जन, प्रदूषण की भयावहता को बढ़ाते हैं। घरेलू स्तर पर कठोर ईंधनों, जैसे लकड़ी, कोयला और बायोमास इत्यादि का उपयोग भी एक गंभीर समस्या है। इनके दहन से निकलने वाली हानिकारक गैसें और सूक्ष्म कण न केवल घरों के भीतर बल्कि व्यापक वातावरण को भी प्रभावित करते हैं।

इन सबके साथ ही जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित शहरीकरण जैसे संरचनात्मक कारक वायु प्रदूषण को और अधिक जटिल बना देते हैं। हरित क्षेत्रों की कमी, धूल उड़ाने वाली निर्माण-गतिविधियाँ और ऊर्जा की अस्वच्छ खपत इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। आज, इन सभी कारणों ने मिलकर वायु प्रदूषण को एक वैश्विक संकट का रूप दे दिया है, जिसे नियंत्रित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर समन्वित एवं कठोर नीतिगत कदमों की तात्कालिक आवश्यकता है।

वायु प्रदूषण का पूर्वानुमान

वर्तमान में "वायु प्रदूषण" से निपटने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का समेकित उपयोग तेज़ी से बढ़ रहा है। उपग्ग्रह प्रौद्योगिकी NO2, SO2, ओज़ोन, एयरोसोल जैसे प्रदूषकों के बड़े क्षेत्रफल पर उच्च-रिज़ॉल्यूशन मानचित्र उपलब्ध कराती है, जिससे हॉटस्पॉट और दीर्घ दूरी परिवहन (जैसे धूल-आँधी) की पहचान आसानी से हो जाती है। ये उपग्रह स्पेक्ट्रल विश्लेषण और परिष्कृत प्रदूषक-पहचान एल्गोरिदम (sophisticated pollutant detection algorithms) का उपयोग करते हैं, जिनसे वातावरणीय घटकों, जैसे PM PM10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), ओज़ोन (O3) तथा एयरोसोल के बारे में विस्तृत और अपेक्षाकृत सटीक जानकारी प्राप्त होती है। दूसरी ओर इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT)- आधारित लो-पॉवर सेंसर नेटवर्क मोहल्ला/गली स्तर पर PM23/PM, और अन्य प्रदूषक गैसों की मिनट-से-घटेरियल-टाइम रीडिंग देते हैं, जो उपग्रह के व्यापक दृष्टिकोण को ज़मीनी सूक्ष्मता से जोड़ते हैं।

एक उपकरण जो वायु में उपस्थित हानिकारक गैसों का पता लगाने, मापने या निगरानी करने के लिए उपयोग किया जाता है, उसे 'वायु गुणवत्ता गैस सेंसर' कहा जाता है। 'MQ135' वायु गुणवत्ता सेंसर, 'MQ गैस सेंसर' का एक प्रकार है, जिसे हवा में उपस्थित विभिन्न गैसों जैसे अमोनिया, एल्कोहल, बेंजीन, धुआँ, कार्बन डाइऑक्साइड इत्यादि का पता लगाने, मापने और निगरानी करने के लिए उपयोग किया जाता है। भारत में वायु गुणवत्ता निगरानी का ढांचा बीते कुछ वर्षों में उल्लेखनीय रूप से मजबूत हुआ है, जिसमें भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) जैसी संस्थाएं अहम भूमिका निभा रही हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग के वायु गुणवत्ता पूर्वानुमान तंत्र में ज़मीन-आधारित ऑटोमैटिक स्टेशनों, लो-पॉवर सेंसर-नेटवर्क और उपग्रह-आधारित अवलोकनों का संयोजन, अब एक मानक अभ्यास बन चुका है।

वायु गुणवत्ता पूर्वानुमान के लिए सबसे पहले शहर भर के ऑटोमैटिक मॉनिटरिंग स्टेशन और लो-पॉवर सेंसर हवा में मौजूद कण (PM2.5, PM10) और प्रदूषक गैसें (कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड ओज़ोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड इत्यादि) मापते हैं। इसी के साथ उपग्रह, धूल, धुआँ इत्यादि के बड़े पैमाने पर फैलाव की तस्वीरें देता है। फिर मौसम की जानकारी, अर्थात हवा की दिशा-गति, तापमान, नमी, बारिश की संभावना और दिन-रात का तापमान, को उन्नत कम्प्यूटरी मॉडल में डाला जाता है, जो यह "गणना" करते हैं किअगले 24-72 घंटों में प्रदूषक कहाँ-कहाँ और कितनी मात्रा में फैलेंगे या जमा होंगे। इस पूरे वायु गुणवत्ता पूर्वानुमान प्रणाली को उपरोक्त चित्र संख्या 2 में दर्शाया गया है। कई जगह मशीन-लर्निंग तकनीकें पुराने डेटा से सीखकर भविष्यवाणी को और सटीक बनाने में सहयोग करतीं हैं। अलग-अलग स्रोतों (स्टेशन, सेंसर, उपग्रह) के आंकड़ों की आपस में जाँच-पड़ताल करके एक संयुक्त पूर्वानुमान तैयार किया जाता है, जिसे AQI (Air quality Index; ग्रीन से मैरून रंग के कोड, चित्र संख्या 3) के रूप में जारी किया जाता है, आमतौर पर दिन में एक से दो बार अपडेट के साथ। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि AQI प्रति घंटा नहीं, बल्कि 24 घंटे या 8 घंटे की औसत सांद्रता पर निर्भर करता है। जैसे मौसम में अचानक बदलाव से बारिश का अनुमान बदल सकता है, वैसे ही धूल आँधी, पराली-दहन या ट्रैफिक स्पाइक से AQI पूर्वानुमान में थोड़ी बहुत त्रुटियाँ हो सकती हैं। इसलिए अपडेटेड बुलेटिन देखना सबसे अच्छा रहता है।

विविध महानगर, एक समाधान-SAFAR: भारत का पहला वायु गुणवत्तापूर्वानुमान ढांचा

2010 में जब भारत ने 19वें कॉमन वेल्य खेलों की मेज़बानी की, तव दिल्ली में वायु प्रदूषण का खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर असर देखते हुए लगभग 8,000 एथलीटों (71 देशों से) को हवा की गुणवत्ता और मौसम की सही जानकारी देने की ज़रूरत महसूस हुई। इसी ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए, बड़े भारतीय शहरों (दिल्ली, पुणे, मुंबई एवं अहमदाबाद) के लिए सफर (SAFAR) नामक वायु गुणवत्ता पूर्वानुमान तंत्र विकसित किया गया। SAFAR का पूरा नाम है System of Air Quality and Weather Forecasting and Research। यह भारत सरकार का पहला आधिकारिक और नियमित रूप से चलने वाला ऑपरेशनल वायु गुणवत्ता पूर्वानुमान ढांचा है, जिसे IITM, पुणे, जो भारतीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का एक स्वायत्त संस्थान है, ने बनाया है। SAFAR का उद्देश्य है लोगों और प्रशासन को समय पर, भरोसेमंद और सरल भाषा में हवा की गुणवत्ता व मौसम से जुड़ी जानकारी देना, ताकि स्कूली बच्चों से लेकर खिलाड़ियों और नीति निर्माताओं तक सभी समय रहते वायु गुणवत्ता सम्बंधित सही कदम उठा सकें।

आज विश्व भर में (खास कर दिल्ली जैसे बड़े शहरों में) वायु प्रदूषण एक जटिल और बहुआयामी समस्या बन गयी है, जिसका समाधान केवल तकनीकी उपायों से नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता, नीति निर्माण और सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। भारत में बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण और कृषि गतिविधियों के कारण प्रदूषण स्तर चिंताजनक हैं। अतः आवश्यक है कि सरकार, हमारा समाज और उद्योग मिलकर इस समस्या का समाधान करें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण मिल सके।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।