
बदलेगी सोच तभी बचेगा पानी Publish Date : 22/07/2026
बदलेगी सोच तभी बचेगा पानी
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
जल ही जीवन है, यह वह शाश्वत वाक्य है, जिसे हम सब बचपन से सुनते आ रहे हैं और दीवारों पर लिखे स्लोगनों में पढ़ते आ रहे हैं। परंतु क्या कभी इस बात पर गंभीरता से विचार किया है कि इस अनमोल जीवन की 'एक्सपायरी डेट' विज्ञान के नियमों से नहीं, बल्कि इंसानी स्वार्थ, उसकी सहूलियत और संकीर्ण मानसिकता से तय हो रही है? आज आधुनिकता की अंधी दौड़ और उपभोक्तावादी संस्कृति में पानी की बर्बादी को लेकर समाज में एक ऐसा अजीबोगरीब विरोधाभास पनप चुका है, जो भविष्य के लिए गहरे जल संकट की खतरे की घंटी बजा रहा है। पानी को लेकर समाज में एक बेहद दिलचस्प लेकिन चिंताजनक मानसिकता विकसित हो गई है। हम अक्सर अपनी सुविधा, उपलब्धता और आदतों के आधार पर पानी की 'एक्सपायरी डेट' तय कर लेते हैं, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से पानी की उपयोगिता केवल समय से नहीं, बल्कि उसकी स्वच्छता, भंडारण की स्थिति और प्रदूषण के स्तर से तय होती है। यही कारण है कि कई बार हम सहज उपलब्ध पानी को 'बासी' कहकर बहा देते हैं, जबकि संकट की स्थिति में वही पानी अमृत के समान मूल्यवान लगने लगता है।

जल संकट आज केवल भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बनता जा रहा है। देश के कई शहरों और गांवों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। नदियां सिकुड़ रही हैं और स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता लगातार चुनौती बनती जा रही है। ऐसे समय में पानी को लेकर हमारी सोच और व्यवहार दोनों बदलने की आवश्यकता है। पानी बचाना केवल सरकारी योजनाओं या अभियानों की जिम्मेदारी नहीं है। यह हर व्यक्ति का नैतिक दायित्व है। यदि हम छोटी-छोटी आदतों में बदलाव लाएं-जैसे आधी भरी बोतलें न फेंकना, जरूरत भर पानी लेना और जल स्रोतों को प्रदूषित न करना-तो आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं। यदि हम अपने दैनिक जीवन और सामाजिक व्यवहार का सूक्ष्म विश्लेषण करें, तो पानी को लेकर हमारी दोहरी सोच हैरान करने वाली और डराने वाली है। शहरी जीवन में जहां घरों में प्रतिदिन नल का पानी उपलब्ध हो जाता है, वहां अक्सर पिछले दिन का बचा पानी बेकार मान लिया जाता है। कई घरों में रात भर रखा पानी सुबह फेंक दिया जाता है। यह केवल आदत नहीं बल्कि संसाधनों के प्रति हमारी बदलती संवेदनहीनता का उदाहरण भी है।
इसी तरह विवाह समारोहों, सामाजिक आयोजनों और बड़े कार्यक्रमों में अक्सर लोग नई पैक्ड पानी की बोतल लेते ही पुरानी आधी भरी बोतल छोड़ देते हैं। हजारों लीटर पानी केवल इस मानसिकता के कारण व्यर्थ चला जाता है कि 'ताजा पानी' केवल वही है जो अभी-अभी खोला गया हो। इसके बिल्कुल विपरीत, देश के कई ग्रामीण और रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी कई-कई दिनों के अंतराल पर उपलब्ध होता है। वहां लोग उसी पानी को सावधानी से सहेजकर रखते हैं और पूरी जिम्मेदारी से उपयोग करते हैं। रेगिस्तान में यात्रा करने वाला व्यक्ति जानता है कि पानी की हर बूंद जीवन बचा सकती है। वहां पानी की 'ताजगी' नहीं, उसकी उपलब्धता और उपयोगिता महत्वपूर्ण होती है।

जिन महानगरों या विकसित इलाकों में नगर निगम या जल बोर्ड के नल का पानी रोज आता है, वहां कल का भरा हुआ पानी सिर्फ 24 घंटे बीतते ही 'बासी' मान लिया जाता है। सुबह नया पानी आते ही पुराने पानी को नालियों में बहा दिया जाता है। यहां पानी की जीवन अवधि महज एक दिन तय कर दी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार शुद्ध पानी की कोई निश्चित 'एक्सपायरी डेट' नहीं होती। यदि पानी स्वच्छ पात्र में सुरक्षित रखा जाए और उसमें बैक्टीरिया, रसायन या अन्य प्रदूषक न मिलें, तो वह लंबे समय तक उपयोग योग्य रह सकता है। दरअसल बोतलबंद पानी पर लिखी 'एक्सपायरी डेट' अक्सर पानी की नहीं, बल्कि प्लास्टिक पैकेजिंग और गुणवत्ता मानकों की होती है।
दूर-दराज के क्षेत्रों या झुग्गियों में पानी दो, चार या आठ दिनों में एक बार नसीब होता है, वहां उसी पानी को कई दिनों तक पूरी तरह ताजा, पवित्र और पीने योग्य मानकर बर्तनों में सहेज कर रखा जाता है। वहां पानी तब तक बासी नहीं होता, जब तक वह खत्म न हो जाए।
जिन दूर-दराज के क्षेत्रों या झुग्गियों में पानी दो, चार या आठ दिनों में एक बार नसीब होता है, वहां उसी पानी को कई दिनों तक पूरी तरह ताजा, पवित्र और पीने योग्य मानकर बर्तनों में सहेज कर रखा जाता है। वहां पानी तब तक बासी नहीं होता, जब तक वह खत्म न हो जाए। यह संदेश केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक चेतावनी भी है। जिस दिन स्वच्छ पानी की उपलब्धता गंभीर संकट में बदल जाएगी, उस दिन हमें समझ आएगा कि पानी की असली कीमत क्या थी। इसलिए आवश्यक है कि हम आज ही जिम्मेदारी और संयम के साथ जल का उपयोग करें। 'जल ही जीवन है' केवल एक नारा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का सबसे बड़ा सत्य है। यदि जल सुरक्षित रहेगा, तभी आने वाला कल सुरक्षित रहेगा। पानी की बर्बादी रोकना हमारा लक्ष्य होना चाहिए, लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
