जलवायु सहिष्णु भविष्य के निर्माण में जैव प्रौद्योगिकी, अवसर, चुनौतियाँ और संभावनाएँ      Publish Date : 19/07/2026

जलवायु सहिष्णु भविष्य के निर्माण में जैव प्रौद्योगिकी, अवसर, चुनौतियाँ और संभावनाएँ

प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

जलवायु परिवर्तन से हमारा वास्तविक तात्पर्य स्थानीय, क्षेत्रीय तथा वैश्विक जलवायु को परिभाषित करने वाले औसत मौसमीय प्रतिरूपों में आने वाले दीर्घकालिक बदलावों से है। यह बदलाव, कई दशकों या उससे अधिक समय में घटित होते रहे हैं तथा प्राकृतिक पारितंत्र, मानव समाज और पर्यावरणीय प्रक्रियाओं को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं। बीसवीं शताब्दी के मध्य से देखे गए इन जलवायु परिवर्तनों का प्रमुख कारण मानव गतिविधियाँ ही मानी जाती रही हैं, जिसमें विशेष रूप से जीवाश्म ईंधनों एवं फॉसिल फ्यूल्स का दहन सबसे प्रमुख है। इन गतिविधियों के परिणामस्वरूप वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव अधिक तीव्र हुआ है और पृथ्वी के औसत सतही तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है।

                                             

हालांकि, विभिन्न प्राकृतिक कारक भी जलवायु परिवर्तनशीलता को प्रभावित करते हैं, किंतु उनके प्रभाव मानवजनित गतिविधियों के कुप्रभावों की तुलना में काफी कम होते हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन द्वारा प्रकाशित किए गए आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 वैश्विक स्तर पर अब तक के तीन सबसे अधिक गर्म वर्षों में शामिल रहा है। इस अवधि के दौरान पृथ्वी का औसत सतही तापमान पूर्व-औद्योगिक संदर्भ अवधि (1850-1900) की तुलना में लगभग 1.44C अधिक दर्ज किया गया है।

हाल के वर्षों में वायुमंडल में प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड की सांद्रता अभूतपूर्व स्तर तक पहुँच गई है। विशेष रूप से कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता पूर्व औद्योगिक स्तरों की तुलना में लगभग 52 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई है जो कि वैश्विक तापन और जलवायु परिवर्तन की तीव्रता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। जलवायु परिवर्तन में प्राकृतिक योगदानकर्ताओं में आंतरिक जलवायु परिवर्तनशीलता शामिल है जैसे कि महासागर वायुमंडल की आवर्ती घटनाएँ- अल नीनो, ला नीना तथा पैसिफिक डेकाडल ऑसिलेशन आदि। इसके अतिरिक्त बाह्य प्रेरक कारक जैसे ज्वालामुखीय विस्फोट, सौर विकिरण में उतार चढ़ाव तथा पृथ्वी की कक्षा और अक्षीय झुकाव में परिवर्तन आदि भी जलवायु को प्रभावित करते हैं।

जलवायु परिवर्तन को प्रभावी बढ़ावा देना तथा जन-जागरूकता में वृद्धि करना, एक टिकाऊ और जलवायु सहिष्णु भविष्य के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक कदम है। जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों से निपटने में जैव प्रौद्योगिकी, एक प्रभावशाली साधन के रूप में उभरकर सामने आ रही है जो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने और वैश्विक तापमान के प्रभावों को कम करने के लिए नए समाधान प्रस्तुत करती है। वैज्ञानिक ऐसे अभियांत्रिकीकृत सूक्ष्मजीव विकसित कर रहे हैं जो कि वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने में सक्षम हैं। इसके साथ ही उन्नत जैव प्रौद्योगिकीय तकनीकों की सहायता से स्वच्छ ईंधनों के विकास, कृषि दक्षता में वृद्धि तथा अधिक टिकाऊ औद्योगिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है।

                                  

नवाचार और पर्यावरण विज्ञान के समन्वय के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी एक ऐसे भविष्य के निर्माण में योगदान दे रही है जो अधिक सतत पर्यावरण-अनुकूल तथा जलवायु संबंधी चुनौतियों के प्रति अधिक लचीला साबित हो सकेंगे। जलवायु सहनशीलता के लिए भी जैव प्रौद्योगिकीय दृष्टिकोण-

क्रिस्पर जीन संपादन प्रौद्योगिकी: क्रिस्पर जीन संपादन प्रौद्योगिकी परिशुद्ध फसल सुधार के लिए एक लाभकारी तकनीक के रूप में उभरकर सामने आई है जो पौधों के जीनोम में बाहरी डीएनए को सम्मिलित किए बिना ही लक्षित एवं सटीक आनुवंशिक परिवर्तन करने में सक्षम बनाती है। वर्तमान समय में यह उन्नत तकनीक वैज्ञानिकों को अजैविक एवं जैविक तनाव सहनशीलता, पोषण गुणवत्ता, उपज क्षमता तथा समग्र कृषि-प्रदर्शन जैसे महत्वपूर्ण गुणों से संबंधित जीनों में संशोधन करने की सुविधा प्रदान करती है। इसकी उच्च विशिष्टता, दक्षता और बहुउपयोगिता CRISPR-Cas9 को उन्नत फसल किस्मों के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बनाती है, जो भविष्य की कृषि एवं पर्यावरणीय चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने में सक्षम बनाती हैं।

मार्कर सहायित प्रजनन कार्यक्रम: आणविक मार्कर प्रौद्योगिकियों ने पारंपरिक प्रजनन कार्यक्रमों को महत्वपूर्ण रूप से सुदृढ़ तापमान अनियमित वर्षा, लंबे समय तक पड़ने वाले सूखे तथा मृदा लवणता में वृद्धि कृषि फसलों की उत्पादकता और कृषि की स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। कृषि जैव प्रौद्योगिकी, बदलती जलवायु एवं पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति फसलों की अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ करना तथा जनसहभागिता और जागरूकता को बढ़ावा देना भी अत्यंत आवश्यक है।

जलवायु कार्रवाई में जैव प्रौद्योगिकी की भविष्य की संभावनाएँ: जलवायु परिवर्तन से निपटने में जैव प्रौद्योगिकी का भविष्य अत्यंत ही आशाजनक प्रतीत हो रहा है, जिसका प्रमुख कारण सिंथेटिक, जीव-विज्ञान, सिस्टम्स बायोलॉजी और परिशुद्ध कृषि जैसे उभरते वैज्ञानिक क्षेत्रों में निरंतर हो रही प्रगति है। इन नवोन्मेषी क्षेत्रों में जलवायु सहिष्णु फसल किस्मों के विकास, प्रभावी कार्बन अवशोषण एवं उसके संचयन के लिए विशेषीकृत सूक्ष्मजीवों के अभियांत्रिकीकरण तथा पारंपरिक उत्पादों के विकल्प के रूप में टिकाऊ और जैव अवक्रमणीय सामग्रियों का निर्माण करने की अपार संभावनाएँ विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त, जैव प्रौद्योगिकी का कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स तथा बिग डेटा विश्लेषण जैसी उन्नत डिजिटल प्रौद्योगिकियों के साथ एकीकरण से अनुसंधान की दक्षता बढ़ाने, संसाधनों के बेहतर उपयोग को अनुकूलित करने तथा जलवायु-स्मार्ट समाधानों के विकास को गति प्रदान करने में भी सहायक हो सकता है। सामूहिक रूप से यह प्रगतियाँ वैश्विक सतत विकास को बढ़ावा देने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की क्षमता रखती हैं।

निष्कर्षः

जैव प्रौद्योगिकी जलवायु परिवर्तन से निपटने के के लिए जारी वैश्विक प्रयासों में एक शक्तिशाली और बहुआयामी साधन के रूप में उभरकर सामने आई है। आनुवंशिक अभियांत्रिकी, सिंथेटिक जीव-विज्ञान, जैव-ऊर्जा उत्पादन, जलवायु-सहिष्णु कृषि, कार्बन संचयन तथा पर्यावरणीय सुधार के जैसे क्षेत्रों में हुए नवाचारों के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने और पारिस्थितिकी तंत्रों की अनुकूलन क्षमता को बढ़ाने के लिए एक टिकाऊ समाधान प्रदान करती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।