हर्बल दवाईयों का बढ़ता कारोबार      Publish Date : 11/07/2026

          हर्बल दवाईयों का बढ़ता कारोबार

                                                                                   प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

पिछले 5, 6 वर्षों से आए दिन कोई न कोई आदमी हमें किसी न किसी हर्बल कंपनी के प्रोडक्ट दिखाने, समझाने और बताने का प्रयास करता है।

कंपनी के health produts और agriculture कृषि वाले produts खाद और कई प्रकार के फसल ग्रोथ आइटम रहते हैं।

लोग घूम घूम कर आते हैं, फोन करते हैं, मिलना चाहते हैं, बीच में कमीशन भी देना चाहते हैं, यहां तक कि कहते हैं सिर्फ किसानों की मीटिंग बैठक में यदि मौका दे दें अपनी कंपनी के produts दिखाने का तो हमारा भला हो जाएगा और आपका भी।

अब कैसे उन्हें बताएं कि देश से वैध परंपरा खत्म होने, भारत के परंपरा का चिकित्सा ज्ञान के विलुप्त होने के बाद इन बड़ी, बड़ी कंपनियों के produts से देश के लोगों का भला नहीं होने वाला, और देश के किसानों का भला कैसे हो सकता है, किसानों की हालत तो कुछ ऐसे हो गई है जैसे आसमान से गिरा और खजूर में अटका।

                                      

यानी खुद की जैविक, प्राकृतिक खाद बनाना भूलकर, हरी खाद से लेकर गोबर और तरल खाद बनाना भूलकर फंस गया है बाजार के चंगुल में एक ऐसे ट्रैप में जहां सिर्फ किसान बाजार का शिकार होता है, किसी न किसी कंपनी के प्रोडक्ट का शिकार होता है और लगातार लुटता रहता है।

लाखों कंपनियां मार्केट में तेजी से आ गई है, जिनके पास health produts के साथ एग्रीकल्चर के प्रोडक्ट होते हैं, जिनका दावा होता है कि यह डालने से किसानों की फसल की पैदावार बढ़ जाएगी, इनकम बढ़ जाएगी, मिट्टी की क्वालिटी बहुत अच्छी हो जाएगी, तेजी से पौधे बड़े होंगे और भी बहुत कुछ।

जबकि सच यही है कि इन कंपनियों को और इन कंपनियों के एजेंटों को किसानों की इनकम से घंटा फर्क नहीं पड़ता, इनका कोई लेना देना ही नहीं है, सिर्फ एक फोकस रहता है कि किस तरीके से लुभावने बातें करके, बहुत सारे वादे करके किसी न किसी तरीके से यह प्रोडक्ट सेल हो जाए तो इनकम आए, प्रॉफिट मिले।

सच में देखा जाए तो देश में किसानों की इनकम से वास्ता किसको है, किसको मतलब है की इनकम हो कि ना हो, किसान जिए या मरे कौन सोचता है, हर एक की अपनी गरज है, हर एक का अपना लाभ लालच है, उसी हिसाब से वह किसान और खेती को टारगेट करता है।

जब तक देश के किसान खुद अपनी खाद अपने उत्पाद नहीं तैयार करेंगे तब तक इन कंपनियों के प्रोडक्ट और बाजार के चंगुल में फंसते रहेंगे, और इन कंपनियों की नेटवर्थ इनका टर्नओवर लाखों से करोड़ों और करोड़ों से अरबों का होता रहेगा। किसान और गरीब होते जाएंगे, कंपनियां और मालामाल होती जाएंगी।

ऐसा नहीं है कि पैसे की जरूरत हमें नहीं है, गृहस्थ जीवन और भौतिक संसार में सब को जरूरत होती है, पर यही लगता है कि किसी का घाटा करवाकर किसी को गलत रास्ता बता कर, किसी को लूट कर कोई पैसा नहीं कमाना है। जरूरत भर का पैसा वैसे भी ईश्वर की दया से मिल ही जाता है।

जिनको खेती की कोई समझ नहीं है, जिन्होंने कभी खेती नहीं की, वह ज्ञान देते हैं किसानों को वह दुनियाभर के प्रोडक्ट देते हैं, यह डाल लो तो कितना का उत्पादन इतना होगा, यह डालने से यह हो जाएगा, वह डालने से यह होगा, जबकि जो किसान वर्षों से खेती कर रहे हैं जमीन पर वह सब अपने परंपरागत खेती के ज्ञान को, अपने हुनर को, अपने तौर तरीकों को भूलते जा रहे हैं बाजार के चंगुल में और मार्केट के दबाव में।

किसान जब तक अपनी खाद अपना बीज अपना पानी अपना कीटनाशक तैयार नहीं करेगा, फसल चक्र अपनाने से लेकर खेती के हर व्यायाम जो हमारे पूर्वज करते थे अगर वह नहीं करेंगे तो इसी तरह बाजार में लूटते रहेंगे, हम जैसे लोग कुछ नहीं कर पाएंगे।

 बड़ी-बड़ी कंपनियों के सामने हम जैसे आम लोगों का बहुत कोई वजूद नहीं है। इसलिए देश के किसानों से अपील है कि आप लोग सस्टेनेबल खेती, इंटीग्रेटेड फार्मिंग, प्राकृतिक खेती, इन सबके उन मॉडल उन तौर तरीकों को समझे जिससे हम लोकल स्तर पर गांव स्तर पर ही सारी चीजें बना सके, तैयार कर सकें जो हमारे खेत और फसलों के लिए जरूरी होता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।