भविष्य उन्मुख अर्थव्यवस्था की नींव      Publish Date : 10/07/2026

      भविष्य उन्मुख अर्थव्यवस्था की नींव

                                                                                                                   प्रो0 आर. एस. सेंगर

संघ बजट 2026-27 भारत को भविष्य की प्रौद्योगिकियों में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाने की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करता है। 'विकसित भारत 2047' की दृष्टि के अनुरूप एआई डेटा केंद्रों को राष्ट्रीय अवसंरचना का दर्जा देते हुए वैश्विक निवेश आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 चिप डिज़ाइन और निर्माण में घरेलू क्षमता बढ़ाएगा, जबकि 'रेयर अर्थ कॉरिडोर' महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित करेंगे। 'बायोफार्मा शक्ति' पहल उच्च-मूल्य जैविक दवाओं को बढ़ावा देती है। साथ ही, हाई-टेक विनिर्माण में निवेश भारत को प्रौद्योगिकी उपभोक्ता से वैश्विक उत्पादक बनाने की दिशा में निर्णायक कदम है।

केंद्रीय बजट 2026-27 ऐसे भारत की रूपरेखा प्रस्तुत करता है, जो केवल आर्थिक वृद्धि नहीं बल्कि भविष्य की प्रौद्योगिकियों में वैश्विक नेतृत्व का लक्ष्य रखता है। 'विकसित भारत 2047' की दृष्टि पर आधारित यह बजट एआई डेटा केंद्रों को राष्ट्रीय अवसंरचना का दर्जा देता है और स्थिर नीतिगत वातावरण के माध्यम से निवेश को प्रोत्साहित करता है। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0, रेयर अर्थ कॉरिडोर और 'बायोफार्मा शक्ति' जैसी पहलें उन्नत विनिर्माण और उच्च मूल्य प्रौद्योगिकी क्षेत्रों को सुदृढ़ करती हैं। समग्र रूप से, यह रणनीति भारत को तकनीकी उपभोक्ता से वैश्विक उत्पादक के रूप में स्थापित करने कीदिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

                                 

1 फरवरी को संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026-27 भारत की दीर्घकालिक विकास रणनीति में एक निर्णायक मोड़ का संकेत देता है। यह उस व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि को प्रतिबिंबित करता है, जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के रूप में अभिव्यक्त किया है।पिछले एक दशक में विकास यात्रा का केंद्र बुनियादी मानवीय आधारों को सुदृढ़ करना रहा जिसमें शौचालयों की सार्वभौमिक उपलब्धता, नल से जल, स्वच्छ ईंधन और विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करना शामिल रहे। इस वर्ष का बजट अगली छलांग का संकेत देता है। अब भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डेटा अवसंरचना, सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ प्रसंस्करण, उन्नत बायोफार्मा और सटीक विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में क्षमताएँ विकसित करने की तैयारी कर रहा है। यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं, बल्कि क्रमिक और विकसित प्रक्रिया है। अवसंरचना, डिजिटल संपर्क, वित्तीय समावेशन और विनिर्माण प्रोत्साहनों में पिछले वर्षों में किए गए कार्य अब भविष्य-उन्मुख आर्थिक ढाँचे के लिए सशक्त आधार प्रदान कर रहे हैं। केंद्रीय बजट 2026-27 केवल प्रोत्साहनों की घोषणा नहीं करता, बल्कि संपूर्ण पारितंत्र निर्माण का प्रयास करता है। विभिन्न क्षेत्रों में एक स्पष्ट रणनीति दिखाई देती है- अवसंरचना का निर्माण, आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करना, मानव पूँजी का विकास तथा अनुसंधान और विनियामक क्षमता को मजबूत करना। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत उन्नत प्रौद्योगिकियों का केवल बड़ा बाजार न रहे, बल्कि एक प्रमुख वैश्विक उत्पादक के रूप में उभरे।

एआई और डेटा सेंटरः भविष्य का डिजिटल राजमार्ग

बजट की सबसे उल्लेखनीय घोषणाओं में से एक एआई डेटा केंद्रों को मूलभूत डिजिटल अवसंरचना के रूप में मान्यता देना है-ठीक वैसे ही जैसे भौतिक अर्थव्यवस्था में राजमार्गों का महत्व होता है। यह दृष्टिकोण परिवर्तन महत्वपूर्ण है। अब डेटा केंद्रों को केवल निजी व्यावसायिक इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक संप्रभुता से जुड़े राष्ट्रीय परिसंपत्तियों के रूप में देखा जा रहा है। वैश्विक पूँजी और प्रौद्योगिकी आकर्षित करने के लिए बजट में भारतीय डेटा केंद्रों के माध्यम से कार्यरत विदेशी क्लाउड और एआई सेवा प्रदाताओं को वर्ष 2047 तक कर अवकाश देने का प्रस्ताव है। साथ ही, अंतरण मूल्य निर्धारण (ट्रांसफर प्राइसिंग) से जुड़े 'सेफ हार्बर' प्रावधान निवेशकों को दीर्घकालिक नीतिगतस्थिरता प्रदान करते हैं। दो दशकों से अधिक अवधि तक विस्तृत यह प्रोत्साहन भारत को वैश्विक कम्प्यूट क्षमता केंद्र के रूप में स्थापित करने की रणनीतिक मंशा को दर्शाता है।भारत ने पहले ही उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2019 के बाद से डेटा केंद्र क्षमता 590 मेगावॉट से बढ़कर 1.4 गीगावॉट से अधिक हो चुकी है। इंडिया एआई मिशन के अंतर्गत 38,000 से अधिक जीपीयू अनुसंधान संस्थानों और स्टार्टअप्स को उपलब्ध कराए गए हैं, जबकि व्यापक प्रौद्योगिकी पारितंत्र में लाखों लोग कार्यरत हैं। वर्ष 2024 तक इस क्षेत्र में लगभग 4.2 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश हुआ और अनुमान है कि वर्ष 2027 तक संचयी निवेश 100 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो सकता है। मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे प्रमुख केंद्रों के रूप में उभरे हैं।

अंतरराष्ट्रीय सूचकांक भी इस प्रगति की पुष्टि करते हैं।यूएनसीटैड के आँकड़ों के अनुसार, भारत की उभरती प्रौद्योगिकी तत्परता रैंकिंग वर्ष 2022 में 48वें स्थान से वर्ष 2024 में 36वें स्थान पर पहुँची है। वैश्विक नवाचार सूचकांक में भी भारत 39वें स्थान पर पहुँच चुका है। बजट के उपाय भारत को केवल एआई अनुप्रयोग बाजार से आगे बढ़ाकर एआई अवसंरचना की रीढ़बनाने की दिशा में इस प्रगति को सुदृढ़ करने का प्रयास करते हैं। हालाँकि, डेटा केंद्र अत्यधिक ऊर्जा आधारित होते हैं। इनके लिए नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण, विद्युत ग्रिड उन्नयन और प्रशिक्षित मानव संसाधन की सतत उपलब्धता आवश्यक है। इसलिए नीति का जोर केवल कर प्रोत्साहनों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक पारितंत्र सुदृढ़ीकरण पर भी है ताकि घोषणाएँ वास्तविक क्षमता में परिवर्तित हों।

सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्सः विनिर्माण आधार की प्रतिबद्धता

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 भविष्य-उन्मुख अर्थव्यवस्था रणनीति का दूसरा प्रमुख स्तंभ है। बजट केवल असेंबली और परीक्षण तक सीमित न रहकर सामग्री, उपकरण, डिप्ताइन बौद्धिक संपदा और कौशल प्रशिक्षण तक संपूर्ण पारितंत्र को विकसित करने की प्रतिबद्धता दर्शाता है।इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना का आवंटन लगभग ₹22,900 करोड़ से बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ किया गया है, जो आपूर्ति श्रृंखला के ऊपरी चरणों को सुदृढ़ करने की मंशा दर्शाता है। भारत ने छह सेमीकंडक्टर निर्माण संयंत्रों को स्वीकृति दी है, जिनका अनुमानित व्यय 1.3 अरब अमेरिकी डॉलर है। ये संयंत्र अत्याधुनिक उप-10 नैनोमीटर चिप्स के बजाय परिपक्व प्रौद्योगिकी नोड्स पर केंद्रित हैं, परंतु इनका लक्ष्य संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण है।सेमीकंडक्टर डिप्ताइन अनुसंधान में भारत का योगदान वैश्विक स्तर पर उल्लेखनीय है। चुनौती इस बौद्धिक शक्ति को विनिर्माण क्षमता में रूपांतरित करने की रही है। विभिन्न सेमीकंडक्टर-संबद्ध पहलों के लिए लगभग ₹1.25 लाख करोड़ की प्रतिबद्धता नीति की गंभीरता को दर्शाती है। उद्योग आकलनों के अनुसार, यदि विनिर्माण, डिजाइन और अनुसंधान एवं विकास में निवेश निरंतर बना रहता है, तो वर्ष 2030 तक भारत विश्व के शीर्ष पाँच सेमीकंडक्टर उत्पादन केंद्रों में शामिल हो सकता है। यह एक दशक पहले की नगण्य उपस्थिति की तुलना में असाधारण परिवर्तन होगा। बजट की रणनीति संतुलित है: उत्पादन आधारित प्रोत्साहन, अनुसंधान समर्थन और पारितंत्र विकास का संयोजन। सफलता राज्यों के सहयोग, वैश्विक प्रौद्योगिकी साझेदारियों और कुशल कार्यबल के तीव्र विस्तार पर निर्भर करेगी। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली से आगे बढ़कर रणनीतिक औद्योगिक नीति पर आधारित सेमीकंडक्टर क्षमता विकसित करना चाहता है।

रेयर अर्थ और महत्वपूर्ण खनिजः रणनीतिक संसाधनों की सुरक्षा

उन्नत विनिर्माण की प्रगति सुरक्षित और स्थिर महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति के बिना संभव नहीं है। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए बजट में ओडिशा, केरल, आंध प्रदेश और तमिलनाडु में समर्पित रेयर अर्थ कॉरिडोर स्थापित करने की घोषणा की गई है। इन कॉरिडोरों का उद्देश्य खनन, प्रसंस्करण, विनिर्माण और अनुसंधान को क्षेत्रीय क्लस्टरों के रूप में एकीकृत करना है।रेयर अर्थ स्थायी चुंबक विद्युत वाहनों, पवन टर्बाइनों, रक्षा प्रणालियों, रोबोटिक्स और उच्च-प्रदर्शन इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए अनिवार्य है। वर्तमान में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ अत्यधिक केंद्रीकृत है, जिससे रणनीतिक निर्भरता और जोखिम उत्पन्न होते हैं। घरेलू प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देकर भारत आयात निर्भरता कम करने और प्रौद्योगिकी संप्रभुता सुदृढ़करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।यह पहल प्रति वर्ष 6,000 टन एकीकृत रेयर अर्थ स्थायी चुंबक क्षमता विकसित करने के पूर्व प्रयासों को आगे बढ़ाती है। सरकार निजी विनिर्माताओं को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण सहित समर्थन प्रदान करेगी, ताकि सीमित कच्चे संसाधनों का उपयोग घरेलू मूल्य सृजन में किया जा सके।

बाजार अनुमान इस क्षेत्र की संभावनाओं को रेखांकित करते हैं। भारत का रेयर अर्थ चुंबक बाजार वर्ष 2024 में लगभग 635 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2032 तक 1.05 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक होने की संभावना है, जिसका मुख्य कारण विद्युत वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स की बढ़ती माँग है। इस प्रकार ये कॉरिडोर औद्योगिक नीति के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन संक्रमण लक्ष्यों की भी पूर्ति करते हैं।हालाँकि, सफल क्रियान्वयन के लिए सुदृढ़ पर्यावरणीय विनियमन और अवसंरचनात्मक योजना आवश्यक होगी। रेयर अर्थ प्रसंस्करण पर्यावरणीय और अपशिष्ट प्रबंधन संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न करता है। दीर्घकालिक सफलता स्पष्ट नीतिगत ढाँचे, जिम्मेदार खनन पद्धतियों और सतत निजी निवेश पर निर्भर करेगी।

बायोफॉर्मा शक्तिः औषधि मूल्य श्रृंखला में ऊर्ध्वगामी परिवर्तन

भारत वैश्विक स्तर पर जेनेरिक दवाओं के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित है। अब सरकार 'बायोफॉर्मा शक्ति' पहल के माध्यम से भारत को उच्च मूल्य बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स की दिशा में अग्रसर करना चाहती है, जिसके लिए पाँच वर्षों में ₹10,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है।बायोलॉजिक्स वैश्विक औषधि उद्योग का तीव्र गति से बढ़ता हुआ क्षेत्र है। यद्यपि जेनेरिक दवाओं के उत्पादन और निर्यात में भारत की मजबूत स्थिति है, उन्नत जैव-औषधि अनुसंधान और नवाचार में वह अभी अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं से पीछे है। यह पहल अनुसंधान संस्थानों, विनियामक क्षमता और विनिर्माण पारितंत्र को सुदृढ़ कर इस अंतर को कम करने का प्रयास करती है।

नए राष्ट्रीय संस्थानों की स्थापना और सुदृढ़ क्लिनिकल परीक्षण नेटवर्क के माध्यम से वैश्विक अनुसंधान सहयोग आकर्षित करने की योजना है। उद्देश्य उच्च मूल्य उपचारात्मक बाजारों में भारत की उपस्थिति बढ़ाना और स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी संबद्ध निर्यात की जटिलता को कम करना और गुणवत्ता उन्नत करना है।वर्ष 2030 तक भारत के जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तीव्र विस्तार का अनुमान है। तथापि, वैश्विक प्रतिस्पर्धा प्राप्त करने के लिए अनुसंधान एवं विकास में अधिक निवेश, कौशल उन्नयन और मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी आवश्यक होगी। बजट बायोलॉजिक्स को केवल औषधि उद्योग का विस्तार नहीं, बल्कि रणनीतिक औद्योगिक अग्रिम क्षेत्र के रूप में स्थापित करता है।

हाई-टेक टूल रूम और पूँजीगत वस्तुएँ

आधुनिक उद्योग चाहे सेमीकंडक्टर हो, एयरोस्पेस या रक्षा-सटीक विनिर्माण पर आधारित है, इस क्षेत्र में लंबे समय से मौजूद अंतर को दूर करने के लिए बजट में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों द्वारा हाई-टेक टूल रूम स्थापित करने तथा उन्नत निर्माण एवं अवसंरचना उपकरणों को प्रोत्साहन देने की योजना प्रस्तावित की गई है।ऐसे निवेश बहुगुणक प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। उच्च-सटीकता उपकरण लघु और मध्यम उद्योगों को सशक्त बनाते है, घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करते हैं और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आयात निर्भरता घटाते हैं। पूँजीगत वस्तु क्षमता पर ध्यान केंद्रित कर भारत औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता की आधारभूत परतों को सुरक्षित करने का प्रयास कर रहा है जहाँ गुणवत्ता, पैमाना और आत्मनिर्भरता साथ-साथ आगे बढ़ें।

समेकित भविष्य अर्थव्यवस्था रणनीति

समग्र रूप से देखें तो बजट की घोषणाएँ एक सुव्यवस्थित भविष्य-उन्मुख अर्थव्यवस्था की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करती हैं। एआई डेटा केंद्र जैसी डिजिटल अवसंरचना डेटा-आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनती है। सेमीकंडक्टर और रेयर अर्थ खनिज उन्नत विनिर्माण की भौतिक नींव प्रदान करते हैं। बायोफार्मा उच्च-मूल्य स्वास्थ्य निर्यात को सुदृढ़ करता है, जबकि सटीक टूलिंग औद्योगिक गहराई को बढ़ाती है।यह दृष्टिकोण माँग-पक्षीय प्रोत्साहनों और आपूर्ति-पक्षीय क्षमता निर्माण का संतुलित संयोजन है। कर अवकाश वैश्विक निवेश आकर्षित करते हैं, बढ़ा हुआ व्यय घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओं को विकसित करता है, रणनीतिक कॉरिडोर संसाधन सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं और अनुसंधान व कौशल विकास में निवेश मानव पूँजी को सुदृढ़ बनाता है। कौशल विकास तंत्रऔर संस्थागत सशक्तीकरण, पूँजी निवेश के साथ मिलकर दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा का आधार तैयार करते हैं।

भारत की महत्वाकांक्षा स्पष्ट है-उभरते सहभागी से अग्रणी वैश्विक प्रतिस्पर्धी बनने तक की दूरी तय करना। यद्यपि अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ जैसे वैश्विक अग्रणी अभी भी गहन अनुसंधान, उन्नत विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला प्रभुत्व में बढ़त रखते हैं, इन अंतरालों को पाटने के लिए निरंतर नीतिगत स्थिरता, राजकोषीय अनुशासन और संस्थागत सुधार आवश्यक होंगे।संतोषजनक तथ्य यह है कि बजट महत्वाकांक्षा और समष्टि आर्थिक विवेक के बीच संतुलन स्थापित करता है। वित्तीय संस्थानों और रेटिंग एजेंसियों ने दीर्घकालिक संरचनात्मक निवेश और राजकोषीय उत्तरदायित्व के इस संतुलन को सकारात्मक रूप से रेखांकित किया है।

प्रौद्योगिकी परिवर्तन का मानवीय आयाम

इन नीतिगत पहलों के पीछे एक व्यापक सामाजिक दृष्टि निहित है। बुनियादी अवसंरचना से उन्नत प्रौद्योगिकी की ओर यह संक्रमण पूर्व उपलब्धियों को प्रतिस्थापित नहीं करता, बल्कि उन पर आधारित होकर आगे बढ़ता है। विद्युत, डिजिटल संपर्क और वित्तीय समावेशन से सुसज्जित परिवार एआई-आधारित अर्थव्यवस्था में अधिक प्रभावी भागीदारी कर सकता है। सेमीकंडक्टर डिजाइन या जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान में प्रशिक्षित युवा भारत की जनसांख्यिकीय क्षमता का अगला चरण है।ग्रामीण उद्यमियों, स्टार्टअप्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए उन्नत विनिर्माण और डिजिटल अवसंरचना नए बाजार अवसरों के द्वार खोलते हैं। छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए विस्तारित अनुसंधान पारितंत्र देश में रहते हुए वैश्विक सहयोग के अवसर प्रदान करता है। श्रमिकों के लिए उभरते क्षेत्र उच्च-मूल्य रोजगार और सामाजिक-आर्थिक उन्नयन की संभावनाएँ उत्पन्न करते हैं। केंद्रीय बजट 2026-27 इस प्रकार केवल कारखानों और डेटा केंद्रों की आधारशिला नहीं रखता, बल्कि आत्मविश्वास और राष्ट्रीय संकल्प की भी नींव स्थापित करता है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि भारत भविष्य की प्रौद्योगिकियों को केवल अपनाना नहीं, बल्कि आकार देना चाहता है।यह परिवर्तन तात्कालिक नहीं होगा। इसके लिए नीतिगत निरंतरता, संस्थागत दक्षता और निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी आवश्यक होगी। फिर भी दिशा स्पष्ट है-लक्षित निवेश और रणनीतिक प्रोत्साहनों के माध्यम से भारत एक लचीली, नवाचार-आधारित और दीर्घकालिक विकास समर्थ अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है।इस संदर्भ में, बजट केवल संसाधनों का आवंटन नहीं करता बल्कि क्षमता, प्रतिस्पर्धा और दूरदर्शिता पर आधारित राष्ट्रीय आकाँक्षा को अभिव्यक्त करता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।