
गांव के रास्तों का भी डिजिटलीकरण Publish Date : 04/07/2026
गांव के रास्तों का भी डिजिटलीकरण
प्रो0 आर. एस. सेंगर
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क्यूआर कोड स्कैन करने पर मिल जाएगी गांव की सड़क का रास्ता
पीपल के पेड़ से बाएँ मुर जाइए। हैंडपंप के पास वाली गली पकड़ लीजिए। चौपाल के पीछे तीसरा घर है। गाँव में किसी पते तक पहुंचने का यही तरीका वर्षों से चला आ रहा है। शहरों में जहां मोबाइल का लोकेशन अर्थात नेविगेशन कुछ ही क्षणों में मंजिल तक पहुंचा देता है, वहीं गाँव में आज भी रास्ता बताने के लिए पेड़, मंदिर, कुएं और चौपाल जैसी पहचान का सहारा लेना पड़ता है। अब यह तस्वीर बदलने वाली है। पहली बार पंचायती राज मंत्रालय अन्य मंत्रालयों की सहभागिता से गांवों की अंदरूनी सड़कों को नाम यूनिकोड और डिजिटल पहचान देने की तैयारी में है।

यह पहल केवल सड़कों को नाम देने भर की नहीं है, बल्कि गांवों को भी डिजिटल भारत की उस व्यवस्था से जोड़ने की है जहां किसी पते पर पहुंचने के लिए अब संकेतों की जरूरत नहीं होगी, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर दिख रही सड़क ही मंजिल तक पहुंचा देगी। आज देश के अधिकांश गांवों की अंदरूनी सड़कें किसी मानक नाम या कोड के बिना है, बाहरी व्यक्ति ही नहीं डाक एंबुलेंस, ई कॉमर्स कंपनियों और कई सरकारी एजेंसियों को भी सही स्थान तक पहुंचने में कठिनाई होती है। कई बार जीपीएस भी गांव के भीतर पहुंचकर जवाब दे देता है।

इसी व्यवस्था को बदलने के लिए पंचायती राज मंत्रालय राष्ट्रीय स्तर पर स्टैंडर्ड जियो कोडिड विलेज रोड कोडिंग और एडिसन सिस्टम विकसित कर रहा है। गांव की प्रत्येक सड़क को एक यूनिक अल्फा, न्यूमेरिक कोड नाम और डिजीपिन आधारित डिजिटल पहचान दी जाएगी।
भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित रोड कोडिंग व ग्रेडिंग सिस्टम को डीजीपी ग्राम मानचित्र और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के रोड कोडिफिकेशन स्टैंडर्ड से जोड़ने का प्रस्ताव तैयार किया है। सड़कों का वर्गीकरण मुख्य सड़क, क्रास रोड व अन्य सड़क के रूप में किया जाएगा। इसका क्यूआर कोड होगा। जिसे आसानी से आसानी से पहचाना जा सकेगा, पहली बार पंचायती राज मंत्रालय गांवों की अंदरूनी सड़कों को नाम यूनिकोड और डिजिटल पहचान देने की तैयारी कर चुका है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
