
गजल के जुगनुओं से रोशनी बांटता शायर Publish Date : 02/07/2026
गजल के जुगनुओं से रोशनी बांटता शायर
प्रो0 आर. एस. सेंगर
बषीर बद्र को न जानने वाले भी उनकी शायरी से परिचित हैं। प्रत्येक अवसर पर अपनी बात को प्रभावी बनाने के लिए लोगों की जुबान पर उनके शेर चढ़े हुए हैं। यह उनकी शायरी की शक्ति है, जो सबके सिर चढ़कर बोलती है। उन्होंने आमफहम भाषा में गजलें कहकर उर्दू-हिंदी का भेद ही मिटा दिया। वे संसार में नहीं रहे, लेकिन उनके अशआर तब तक संसार में उद्धरण बनते रहेंगे, जब तक लोगों में काव्यात्मक संवेदना जीवित रहेगी...
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।
यह शेर कई बार संसद में गूंजा, कई बार स्टेशन से छूटती रेलगाड़ी या बस की खिड़की से अलविदा में उठते हाथों ने किसी से यही शेर कहा होगा... और सच यह है कि बीते गुरुवार की गली में जिंदगी की तब शाम हो गई, जब यह शेर लिखने वाले शायर बशीर बद्र ने शरीर छोड़ दिया। यह उनकी शायरी की ताकत है कि वर्षों से सार्वजनिक उपस्थिति से दूर रहने पर भी वह हम सबके बीच ऐसे ही थे, जैसे कोई बुजुर्ग साथ वाले कमरे में आराम कर रहा हो। प्रसिद्ध पश्चिमी कवि पीबी शैली ने कहा था कि कवि दुनिया के अघोषित कानून निर्माता होते हैं। यहां कानून का आशय किसी विधान से नहीं, जन संस्कृति और वातावरण को प्रभावित करने की क्षमता से है।
यह उक्ति बशीर बद्र पर इसलिए चरितार्थ होती है, क्योंकि उनकी शायरी का प्रभाव केवल भारत में ही नहीं, बाहर भी वहां तक था, जहां-जहां गजल को चाहने वाले बैठे हैं।
ऐसा इसलिए था, क्योंकि बशीर बद्र ने गजल के व्याकरण को निभाते हुए कथ्य में नितांत नए प्रयोग किए। यह ठीक है कि भाषा कभी क्लिष्ट या सरल नहीं होती, लेकिन बशीर बद्र जानते थे कि अंतिम पंक्ति तक पहुंचने के लिए किस भाषा का प्रयोग करना होगा। उद्धरणीयता मूलतः गजल का गुण है, जिसे बद्र साहब ने और बढ़ाया। अपरिचित शब्दों में परिचित बात कहने के बजाय, वह परिचित शब्दों में वह बात कहते रहे, जो सीधे दिल पर लगती है। वह भारत के उन चुनिंदा आधुनिक शायरों में से हैं, जिनकी रचनाएं सर्वाधिक उद्धृत की गई हैं-
वो जाफरानी पुलोवर उसी का हिस्सा है, कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे।
या फिर
चाय की प्याली में नीली टैबलेट घोली, सहमे-सहमे हाथों ने इक किताब फिर खोली!
ये तो प्रयोग बोले, अब सादगी को सुनिए:
खुशबू की तरह आया वो तेज हवाओं में, चाहा था जिसे हमने दिन-रात दुआओं में।
ये ऐसे अशआर हैं, जिनके लिए किसी शब्दकोश की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में बशीर बद्र के यहां उदासी का ताप वैसा नहीं है, जो लपटों में दिखाई दे। वहां यह गैस या चूल्हे पर फूलती रोटी के भीतर जैसा गर्भित ताप है, जो दिखाई नहीं देता, पर बाहर आए तो उंगलियों को झुलसा देता है :
हंसो आज इतना कि इस शोर में, सदा सिसकियों की सुनाई न दे।
या फिर
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
शायर मनोवैज्ञानिक स्थितियों का छायाकार होता है। बशीर बद्र के पास शायरी का जो लेंस था, उसमें हर अनुभूति दर्ज हो जाती थी। जुदाई, दर्द, सौंदर्य आदि जैसे परंपरागत विषय भी और सामाजिक विषयों के साथ-साथ प्रेम की पराकाष्ठा भी :
जिंदगी तू ने मुझे कब्र से कम दी है जमीन, पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है।
यह अनुभूति भी अविस्मरणीय है :
न जी भर के देखा न कुछ बात की, बड़ी आरजू थी मुलाकात की।मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई, जवां सब समझते हैं जज्बात की।
या फिर
सड़कों बाजारों मकानों दफ्तरों में रात दिन, लाल पीली सब्ज नीली जलती बुझती औरतें...
क्या यह स्त्री विमर्श का शेर नहीं?
बशीर बद्र की प्रसिद्धि व व्यापक स्वीकार्यता का सबसे बड़ा कारण संश्लिष्टतम स्थिति को भी सहजता से अभिव्यक्त करना है :
मुझ से बिछड़ के खुश रहते हो, मेरी तरह तुम भी झूठे हो।मुझ को शाम बता देती हैतुम कैसे कपड़े पहने हो।
क्या कहेंगे बशीर बद्र के जाने पर? यह सवाल शायर वसीम बरेलवी से पूछा तो वह बोले, 'हम दोनों का बहुत लंबा साथ रहा। हालांकि वह मुशायरों में मेरे बाद आए, पर हम दोनों मंच पर होते थे तो गजल का नया मिजाज मंचासीन होता था। 1970 से लेकर 2010 तक जितना समय हम दोनों ने देश-विदेश में साथ गुजारा, उतना हमने अपने-अपने घरों में नहीं गुजारा होगा। यही वह दौर है, जब बद्र साहब ने गजल को गलियों-मोहल्लों से निकाल तक एलीट तक पहुंचाया, उस दोस्त और भाई के जाने का दुख है।'
गजल की नोक-पलक संवारने वाले बशीर बद्र सामाजिक, सांस्कृतिक व अकादमिक पसंद-नापसंद का ख्याल रखते रहे... उनका एक शेर इस बात की पुष्टि करता है :
गजल भी इस तरह उसके हुजूर लाया हूं, कि जैसे बच्चा कोई आए इम्तिहां के लिए।
उनकी गजलों के जन-जन तक पहुंचने में गजल गायकों की भी प्रभावी भूमिका रही, जिनमें कई नाम हैं, किंतु जगजीत सिंह, गुलाम अली, तलत अजीज और चंदन दास प्रमुख हैं। इन गजलों का मूड जगजीत सिंह ने अपने खास अंदाज में अभिव्यक्त किया तो चंदन दास की गाई गजल 'न जी भर के देखा न कुछ बात की, बड़ी आरजू थी मुलाकात की' आज भी उतने ही शौक से सुनी जाती है। उनका एक शेर है :
वो अपने घर चला गया अफसोस मत करो, इतना ही उसका साथ था अफसोस मत करो।
यह परामर्श कोई माने न माने, बद्र साहब के कद जितनी जगह हमेशा खाली रहेगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
