पर्यावरण को बचाने की जरूरत      Publish Date : 27/06/2026

          पर्यावरण को बचाने की जरूरत

                                                                                                                   प्रो0 आर. एस. सेंगर

भूमि एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, जो हमें मुख्य भोजन प्रदान करती है। कुपोषण से निजात के लिए जमीं जैविक तत्व से युक्त अथवा उर्वरक बहुत जरूरी है अथवा जरूरी फसल, तथा सुरक्षित मिट्टी व उपजाऊ भूमि से मिलता है। मिट्टी का कटाव ऊपरी मिट्टी को हटा देता है जो कार्बनिक पदार्थ, पोषक तत्वों, सूक्ष्म जीवों के लिए जरूरी होते हैं, जिनके लिए पौधों को बढ़ने और इनमें में मदद करता है। संरक्षण एक ऐसा कदम है जो मिट्टी की शक्ति को नष्ट होने से बचाता है। मृदा प्रदूषण कृषि भूमि पर कीटनाशकों और उर्वरकों की अधिकता के कारण फैलता है।

पर्यावरण शब्द परि और आवरण की सन्धि से बना है। पृथ्वी पर रहने वाले सारे जीव इसी आवरण में उत्पन्न होते हैं, फलते-फूलते हैं, तथा मृत्यु के पश्चात् इसी में विलीन हो जाते हैं। जीवों का शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। माता पूजनीय होती है और पृथ्वी तो माता की भी माता है अतः वह भी पूजनीय है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने पृथ्वी की पूजा के लिए सभी वेदों में अनेकों मन्त्र बनाये हैं और पृथ्वी के लिए हमें अपना जीवन तक बलिदान करने की शिक्षा दी है (हमारे ऋषि वायु की शुद्धता की महिमा से भी परिचित थे। इसीलिए उन्होंने पवन को देवता माना और ऑक्सीजन को प्राण वायु कहा है।

                         

उन्होंने वायु की शुद्धता बनाये रखने के लिए कई प्रकार के यज्ञों का विधान भी बनाया था। इसी प्रकार अग्नि को भी देवता माना गया है। ऋग्वेद में अग्नि की पूजा बार-बार की गई है। अग्नि ही नाली प्रकृति के हर घटक से, जो कि हमें जीवन और आरोग्य प्रदान करते हैं, देवता मान कर उन्हें पूजा गया है। हमारे ऋषियों ने हमें पृथ्वी, द्यौ, सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, पाताल, पेड़, वायु, जल सभी की पूजने और आदर करने की शिक्षा दिया है। कालान्तर में मानव ने अपने विज्ञान का दुरुपयोग करते हुए अपने पोषण के अतिरिक्त अपने निहित स्वार्थ, अहंकार और अपने को शक्तिशाली सिद्ध करने के लिए प्रकृति का दोहन आरम्भ कर दिया।

अधिक से अधिक विलासिता पूर्ण जीवन की इच्छा ने उसे हिंसक बना दिया। उसने घर, वस्त्र, वाहन इत्यादि के लिए जंगलों, पर्वतों, भूगर्भ-स्थित खनिजों, जल इत्यादि का दुरुपयोग इतना अधिक कर दिया कि संसार के पेड़ों की संख्या आधी गुना कम हो गयी। फैक्ट्रियों कोर्ट द्वारा, भूगर्भ-स्थित खनिजों का इतना दोहन किया कि आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा। जनसंख्या विस्फोट, औद्योगीकरण, शहरीकरण, वनविनाश, आधुनिक दवाएं, यूम कृषि तथा खनन गतिविधियाँ भूमि संसाधनों के क्षरण के प्रमुख कारण हैं। इसके अतिरिक्त रासायनिक उर्वरकों एवं पेस्टीसाइड्स पर आधारित पारम्परिक कृषि भी भूमि क्षरण का एक प्रमुख कारण है। हरित क्रान्ति के आगमन से कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए रासायनिक खादों, कीटनाशकों तथा शाकनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से न केवल वातावरण प्रदूषित हुआ है, अपितु भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाले सूक्ष्मजीवों की जनसंख्या में भी लगातार गिरावट दर्ज की गयी है जिससे मृदा की पैदावार शक्ति में कमी आयी है। अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों विशिष्टकर यूरिया के प्रयोग से भूमि अम्लीय हो जाती है।

                          

अम्लीय मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे कापर तथा जिंक पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। इसके अतिरिक्त इस प्रकार की मृदा में आन्तरिक से कैल्शियम तथा पोटैशियम तत्त्वों का अभाव होता है। इसलिए इस प्रकार की मृदा में फसलों की पैदावार में गिरावट आ जाती है। खेती के लिए मृदा का नैसर्गिक होना पृथ्वी की सतह भूमि है। हमारे देश में सामान्यतः कृषि भूमि से अमूल्य भूक्षरण की दर लगभग 7.5 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष है, परन्तु पश्चिम दर लगभग 20-30 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष तक पहुँच गयी है, जिसमें अधिकांश योगदान पर्वतीय क्षेत्रों का है।

यह एक चिन्ता का विषय है जिसके लिए तुरन्त मृदा संरक्षण के उपयुक्त उपाय प्रयोग करना आवश्यक है। मृदा पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है जो कि जीवन बनाये रखने में सक्षम होती है। किसानों के लिए मृदा का बहुत अधिक महत्व होता है, क्योंकि किसान इसी मृदा में प्रत्येक वर्ष स्वस्थ व अच्छी फसल पैदावार पर आश्रित होते हैं। बहते हुए जल व वायु के प्रवाह द्वारा मृदा के पृथक्करण तथा एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानान्तरण को ही मृदा अपरदन से प्रभावित लगभग 150 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र रहा है जिसमें से 69 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र मृदा अपरदन की गंभीर स्थिति की श्रेणी में रखा गया है। मृदा की ऊपरी सतह का प्रत्येक वर्ष अपरदन द्वारा लगभग 5334 मिलियन टन से भी अधिक क्षय हो रहा है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 57% भाग मृदा क्षय के विभिन्न प्रकारों से ग्रस्त है। जिसका 45% जल अपरदन से तथा शेष 12% भाग वायु अपरदन से प्रभावित है भारत एक कृषि प्रधान देश है। भोजन हमारी मूलभूत आवश्यकता है।

देश में 'हरित क्रांति' के माध्यम से कृषि उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई, किन्तु "जनसंख्या विस्फोट" के कारण भोजन की समस्या आज भी बनी हुई है। खाद्यान्न पूरी तरह से उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

भूमि एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है जो हमें अच्छा भोजन प्रदान करती है। कुपोषण से निजात के लिए सभी पौष्टिक तत्त्व से युक्त अच्छा आहार बहुत जरूरी है अच्छा आहार अच्छी फसल, तथा सुरक्षित मिट्टी व उपजाऊ भूमि से मिलता है। मिट्टी का कटाव ऊपरी मिट्टी को हटा देता है जो कार्बनिक पदार्थों, पोषक तत्त्वों, सूक्ष्म जीवों के लिए जरूरी होता है, जिनके लिए पौधों को बढ़ने और उगने में मदद करता है। संरक्षण एक ऐसा कदम है जो मिट्टी की शक्ति को नष्ट होने से बचाता है। मृदा प्रदूषण कृषि भूमि पर कीटनाशकों और उर्वरकों की अधिकता के कारण फैलता है। पौधों के विकास और पनपने के लिए स्वस्थ मिट्टी महत्वपूर्ण है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।