
भविष्य की एक ज्वलंत समस्या: 45\% लड़कियों के अविवाहित रहने की आशंका Publish Date : 19/06/2026
भविष्य की एक ज्वलंत समस्या: 45% लड़कियों के अविवाहित रहने की आशंका
प्रो0 आर. एस. सेंगर
- एक हालिया अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार आने वाले छ: वर्षो के दौरान विश्व की लगभग 45% लड़कियां अविवाहित रह जाएंगी।
- यह रिपोर्ट 1 फरवरी 2025 को लोकमत अखबार में प्रकाशित हुई थी, जो मार्गन स्टेनली संस्था द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्धयन पर आधारित हैं।।
सर्वेक्षण में पाये गए प्रमुख कारण:-
1. आज की लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है और वह अपने करियर को प्राथमिकता दे रही हैं।
2. वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है और किसी पर निर्भर रहना नहीं चाहती।
3. उन्हें स्वतंत्रता प्रिय है और वे अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेना चाहती हैं।
4. विवाह, मातृत्व और पारिवारिक बंधनों को वे अक्सर अपनी प्रगति में बाधा मानने लगी हैं।
5. यदि यह प्रवृति बनी रही तो पारंपरिक परिवार प्रणाली और सामाजिक संरचना बिखर सकती हैं।
6. जनसंख्या में गिरावट, कुंवारे लड़को की संख्या में वृद्धि और वृद्धावस्था में अकेलेपन के जैसी विभिन्न प्रकार की समस्याएँ सामने आ सकती हैं।
7. प्रश्न यह भी उठता है कि ऐसी प्रगति, पद और पैसा किस काम आएंगे, जब जीवन के अंत में साथ देने वाला कोई न होगा?
- कई माता पिता लड़कियों के रिश्ते तो ढूंढ रहे हैं, पर स्वयं लड़की को विवाह में रूचि नहीं होती, जिसके कारण हर रिश्ता नकारा जा रहा है।
- समाज के एक बड़े वर्ग को इस बदलाव की गंभीरता का का अन्दाजा अभी तक नहीं है, इसलिए यह आवश्यक है कि हम समय रहते चेत जाएं।
- लड़कियों के विवाह के लिए उपयुक्त आयु 23 से 26 वर्ष के बीच हो यदि हो पाएं तो ओर भी जल्दी, इसके लिए सामूहिक स्तर पर जागरूकता ओर पहल करना बहुत जरूरी है।
यह विषय किसी के विरोध में नहीं, बल्कि भविष्य की स्थरिता और संतुलन की चिंता के तहत उठाया गया है, समाज, परिवार और व्यक्तिगत जीवन तीनों को संतुलित रखना ही सच्ची प्रगति हैं। अतः हम सबको इस समस्या पर समय रहे ही विचार अवश्य ही करना चाहिए।
यह भविष्य की एक ज्वलंत समस्या है, क्योंकि-

1. जब बच्चों का विवाह, 20 वर्ष की आयु में होता था, तो एक सदी में 5 पीढ़ियाँ होती थी।
2. जब बच्चों का विवाह, 25 वर्ष की आयु में होता था, तो एक सदी में 4 पीढ़ियाँ होती थी।
3. अब बच्चों का विवाह 30 25 वर्ष की आयु में होता है, तो एक सदी में केवल 3 पीढ़ियाँ ही होती हैं।
- इस स्थिति में सोचने वाली बात है कि क्या हमारा समाज, अगली सदी तक जीवित रह सकेगा?
- आज एक अजीब सा अंधेरा फैल रहा है, जिसके चलते गली-मोहल्ले वीरान हैं, आस-पास के घर खाली हैं।
- आज घरों में बच्चों की आवाज कम, पति-पत्नी की आवाज ज्यादा सुनाई देती है।
- लड़कियाँ 30-35 वर्ष की आयु तक भी कुंवारी हैं, तो लड़के 35 वर्ष की आयु के बाद भी कुँवारें घूम रहे हैं।
- देर से शादी और शादी के बाद फिर सम्बंध विच्छेद (तलाक), जिसका परिणाम है टूटते परिवार और दुखी माँ-बाप।
- अगर माता-पिता अकेले हैं तो पूरी पीढ़ी खालीपन का अनुभव करती है।
- क्या हम इसे एक "पढ़ा-लिखा समाज" कह सकते हैं या फिर एक "स्वयं को नुकसान पहुँचाने वाला समाज"।
- यह तो जनसंख्या कम करने की एक खामोश साज़िश है।
- क्योंकि अगर 50 जोड़ों में, सिर्फ़ एक बच्चा हो, तो इससे अगली पीढ़ी में तो बच्चे केवल और केवल नाममात्र के ही होंगे।
- ऐसे में यदि ऐसा ही चलता रहा, तो तीसरी पीढ़ी लगभग गायब ही हो जाएगी।
- मोहल्ले और गलियाँ तो खाली पड़ी हैं, सब लोग रोड़ पर हैं और जीवन का आधा समय तो रोड़ पर ही बीत जाता है।
- आज गाँव के गाँव तो खत्म हो रहे हैं, शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें हैं, लेकिन अब संयुक्त परिवार प्रथा समाप्त हो चुकी है।
- आजकल की नई बहुएं भी "सिर्फ़ एक ही बच्चा" चाहती हैं। ऐसे में यह एक अहम सवाल है कि क्या यही समाज है? क्या यही हमारे पुरखों की विरासत है ?
- सच तो यह है, कि बच्चे अब प्यार की निशानी नहीं रहे, बल्कि बच्चे पैदा करना एक मजबूरी सी है।
- सबसे बड़ी गलती तो लड़की के पिता की है, वही पिता जिसने अपनी 20-22 वर्ष की आयु में ही विवाह करके अपना परिवार बनया था। अब वही पिता 30 साल की उम्र तक अपनी बेटी का विवाह न करके बहादुरी दिखा रहे हैं।
- इसके परिणामस्वरूप आज हमारे बच्चे डिप्रेशन में जा रहे हैं। आज बच्चों का सही समय पर विवाह नहीं हो रहा है, और न सही समय पर कोई नौकरी मिल रही है।
- ऐसे में इस समय समाज धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है और इसी कारण आज हमारे बच्चे समाज के साथ नही बल्कि अकेले रहना पसंद करते हैं, यानी एकल परिवार यहाँ तक कि उन्हें अपने बच्चे भी नहीं चाहिए।
- देर से शादी करना, देर से बच्चा पैदा करना और फिर एक बच्चा पैदा करने बाद मेडिकल और लालन-पालन करने का बहाना करना।
- अब यह आम बात हो गई है, हजारों जवान लड़के लड़कियां उम्र के कारण कुंवारे घूम रहे हैं समाज के समझदार लोग चुप्पी साधे हुए हैं।
- विवाह, परिवार, बच्चे की अवधारणा को अब एक बोझ समझा जाने लगा है।
जबकि सच्चाई यह है कि विवाह कोई दुनियावी बंधन नहीं बल्कि यह घर परिवार और समाज का एक प्रमुख आधार स्तम्भ है। यह प्रजाति, सभ्यता और संस्कार के आगे बढ़ाने का एक तरीका है।
- अब हम सब को समझने का समय आ गया है कि बच्चों को ‘हद से ज्यादा' आजादी दे कर हमने उनकी समझ समझ को छीन लिया है।
विवाह टलता रहा, और जब हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी, फिर वही अकेलापन लड़के लड़कियों के लिए विवाह की सही उम्र लड़कों के लिए 25 साल से पहले लड़कियों की 20 साल से पहले, नहीं तो इतिहास लिखेगा- वह हिंदू समाज, जिसने चुपचाप स्वयं को खत्म कर लिया।” इसलिए समय रहते सोचें और समझदारी दिखाएं और अपने बच्चों का विवाह समय पर करें।
- क्योंकि यदि परिवार ही नहीं बचा, तो समाज को भी देर सवेर ध्वस्त होते देर नहीं लगनी है ।
- यही कारण है कि डेविड सेलबॉर्न और बिल वार्नर जैसे लेखक यह कहने पर मजबूर हो जाते हैं, कि अन्य समाजों के मज़बूत फैमिली सिस्टम की वजह से देर सवेर अधिकांश देश समाप्त हो जाएंगे।
- भारत में भी हिन्दू परिवार परम्परा का पतन होना प्रारम्भ हो चुका है, रक्त के 5 रिश्ते समाप्त होने की कगार पर हैं ताऊ, चाचा, बुआ, मामा, मौसी जैसे रिश्ते आने वाले समय में देखने-सुनने को नहीं मिलने वाले हैं।
- इसे इस तरह समझा जा सकता है- सिंगल चाइल्ड फैमिली को उनका निर्णय तीसरी पीढ़ी यानी जिनके आप दादा-दादी होंगे बुरी तरह प्रभावित करेगा, जिस दादा को मूल से अधिक ब्याज प्यारा होता है उसका तो मूलधन भी समाप्त हो जाएगा, इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। इसलिए दम्पत्ति को सिंगल चाइल्ड के निर्णय गंभीरता से विचार करना होगा।

- यह घटती आबादी के आँकड़े बोल रहे हैं यह विश्लेषण सरकारी आँकड़ों के अध्ययन से आ रहा है।
- आपका पौत्र या प्रपौत्र इस संसार में अकेला खड़ा होगा, उसे अपने रक्त के रिश्ते आवश्यकता होगी तो इस पूरे ब्रह्मांड में उसका अपना कोई नहीं होगा।
- यह अत्यंत सोचनीय विषय है, ये न केवल हमारे बच्चों को एकाकी जीवन जीने को मजबूर करेगा बल्कि हमारी हिंदू परिवार सभ्यता को ही नष्ट कर देगा।
- हम जो हिन्दू एकता की बात करते हैं जब यह सभ्यता ही समाप्त हो जाएगी, और इन सबके लिए हमारी वर्तमान पीढ़ी उत्तरदायी होगी।
- अगर आप इस विषय की गंभीरता को समझते हैं तो इस समस्या पर विचार करें, घर परिवार में, पति पत्नी के बीच, रिश्तेदारों में, दोस्तो में एवं विभिन्न बैठकों एवं आयोजनों में इस विषय पर मंत्रणा करें और अपनी सभ्यता, संस्कार और पीढ़ियों को बचाएं।
- हो सकता है कुछ बुद्धिजीवी लोग मेरे विचार से सहमत न हों तो उन सबसे में अनुरोध करना चाहूंगा कि एक बार निश्छल एवं निःस्वार्थ भाव से अपने समाज एवं हिन्दुस्तानी परम्परा, विचार, व्यवहार, संस्कृति, सभ्यता, सदाचार, शिष्टाचार एवं संस्कारों की परिकल्पना के बारे में विचार अवश्य कर लेना, उसके बाद आपकी आत्मा जो भी निर्णय ले मुझे अवश्य बताएं।
- सभी भाई-बन्धुओं को इस लेख को पढ़ने के लिए दिल से धन्यवाद।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
