यूरिया से हो रहा है हमारी खेती का विनाश      Publish Date : 09/06/2026

   यूरिया से हो रहा है हमारी खेती का विनाश

                                                                                      प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 निधि सिंह

अविवेकपूण तरीके से रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों का प्रयोग करने के चलते आज हमारी खेती का पूरा गणित बिगड़ता जा रहा है। थोड़े ज्यादा पैसे और जल्दी हरियाली के लालच में हम फसल को यूरिया का जैसे “डोज नहीं, नशा” लगा रहे हैं। सिर्फ सस्ता मिलने के कारण हम बोरी पर बोरी यूरिया खेत में डालते जा रहे हैं, लेकिन क्या कभी सोचा है कि इसका हमारी खेत की मिट्टी पर क्या प्रभाव छोड़ रहा है?

1. यूरिया का अधिक उपयोग अर्थात मिट्टी का नुकसान

                              

यूरिया डालते ही फसल 2-3 दिन में गहरी हरी दिखने लगती है, यह सही है। लेकिन यह हरियाली केवल कुछ समय की होती है। अधिक यूरिया से मिट्टी की संरचना खराब होती है, मिट्टी सख्त होने लगती है और उसकी प्राकृतिक उर्वरता धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। ऐसे में अगर मिट्टी का ऑर्गेनिक कार्बन (Organic Compound) कम होने लगे, तो समझ लीजिए खेती की जमीन बंजर होने की राह पर है।

2. मिट्टी के मित्र जीवाणुओं का विनाश

प्रकृति ने हमारी मिट्टी में ऐसे लाभकारी जीवाणु दिए हैं जो हवा से नाइट्रोजन लेकर फसल को देते हैं।

अज़ोटोबैक्टर, अज़ोस्पिरिलम और राइजोबियम जैसे सूक्ष्मजीव यह काम मुफ्त में करते हैं। लेकिन रासायनिक खादों और दवाओं का अत्यधिक उपयोग करने से हमारे यह मित्र जीवाणु नष्ट हो रहे हैं। यही कारण है कि मिट्टी अपनी खुद की पोषण शक्ति को खो देती है।

3. नाइट्रोजन के टिकाऊ और जैविक विकल्प

फसलों की पैदावार को बढ़ाने के लिए रासायनिक यूरिया ही सब कुछ नहीं है, बल्कि इसके कुछ आर्गेनिक विकल्प भी उपलब्ध हैं जिनका उपयोग कर आप अपने खेत की उर्वरता को बढ़ा सकते हैं और यह हमारे पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित रहते हैं। जैसे-

  • कीटनाशी रसायनों के स्थान पर नीम खली, सरसों खली, अरंडी खली आदि का उपयोग किया जा सकता है।
  • अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद का ही प्रयोग करें।
  • मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा को बढ़ाने का प्रयास निरंतर करते रहें।
  • जैव उर्वरक और लाभकारी जीवाणुओं का अणिक से अधिक उपयोग करें।

जब मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता हैं, तो नाइट्रोजन स्थिर करने वाले जीवाणु भी तेजी से बढ़ते हैं और जमीन खुद खाद बनाने लगती है।

एक कड़वा सच

गेहूं और अन्य फसलों को अधिक नाइट्रोजन की जरूरत होती है। केवल जैव उर्वरक 12-20 किलो तक ही नाइट्रोजन दे पाते हैं, इसलिए गोबर खाद + जैव उर्वरक + जैविक खली का संतुलित उपयोग करना आवश्यक है।

मिट्टी बचेगी तभी तो खेती बचेगी, इसलिए अब समय है रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने का।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।