
प्राकृतिक खेती के पर्यावरण के लिए लाभ Publish Date : 08/06/2026
प्राकृतिक खेती के पर्यावरण के लिए लाभ
प्रो0 आ. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
कृषि’के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की चीजें शामिल होती हैं; चावल, गेहूं, मक्का, बाजरा, दालें, फल और सब्जियों के जैसी खाद्य फसलों की खेती; मधुमक्खी पालन; रेशम के कीड़ों का पालन और रेशम का उत्पादन करना; कपास जैसी फाइबर फसलों की खेती; और पशुधन- गोमांस और डेयरी मवेशी, सुअर-पालन, मुर्गी-पालन, भेड़, बकरी और मांस और/या दूध या फाइबर उत्पादन के लिए उपयोग किए जाने वाले अन्य जानवरों का पालन करना। कृषि में इन वस्तुओं को उगाना, कटाई, प्रसंस्करण, भंडारण और विपणन के लिए प्रौद्योगिकी और प्रथाओं पर भी जोर दिया जाता है। कृषि विकास ग्रामीण विकास के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है क्योंकि अधिकांश ग्रामीण आबादी किसी न किसी रूप में खेती में लगी हुई है और अधिकांश कृषि उत्पादन ग्रामीण क्षेत्रों में होता है। ग्रामीण क्षेत्र शहरी क्षेत्रों की तुलना में कम घनी आबादी वाले हैं, और विकासशील देशों की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। बेशक, ग्रामीण और शहरी आबादी का अनुपात एक देश से दूसरे देश में भिन्न होता है। प्राकृतिक कृषि एक समग्र कृषि प्रणाली है जो मिट्टी के पुनर्जनन, पानी और हवा की गुणवत्ता में सुधार करने और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन का उत्पादन करने में मदद करती है। कृषि सखियों को आर्थिक व्यवहार्यता को बनाए रखने और सुधारने के साथ-साथ प्रकिृत के साथ सामंजस्य बनाकर काम करने के लिए संगठित किया जाएगा।
प्राकृतिक कृषि की तकनीकें और प्रथाएँ-
- मिट्टी की भौतिक, जैविक और रासायनिक गड़बड़ी को कम करने में सहायक।
- मिट्टी को वनस्पति या प्राकृतिक सामग्री से ढककर रखा जाना चाहिए।
- जितना सम्भव हो जानवरों को खेत में एकीकृत करना चाहिए।
- कृषि इनपुट/जैव फॉर्मूलेशन का उपयोग करना।
जलवायु परिवर्तन के मुद्दों से निपटने और मिट्टी की उर्वरता बहाल करने में भारत की रणनीतिः
➢ प्राकृतिक कृषि को अपनानाः-
प्राकृतिक खेती एक रसायन मुक्त अथवा पारंपरिक खेती पद्धित है। इसे कृषि परिस्थति पर आधारित विविध कृषि प्रणाली माना जाता है जो फसलों, पेड़ों और पशुधन को कार्यात्मक जैव विविधता के साथ एकीकृत करती है।
➢ प्राकृतिक खेती ही क्यों?
✓ शोधकार्यों के माध्यम से पता चलता है कि पौधों की वृद्वि के लिए आवश्यक सभी प्रमुख पोषक तत्व जड़ क्षेत्र के आसपास उपलब्ध होते हैं और पौधे हवा, पानी और सौर ऊर्जा से लगभग 98 से 98.5 प्रतिशत तक पोषक तत्व और शेष 1.5 प्रतिशत पोषक तत्व मिट्टी के माध्यम से लेने में सक्षम होते हैं।
✓ प्राकृतिक कृषि काफी हद तक ऑन-फार्म-बायोमास रीसाइक्लिंग पर आधारित है, जिसमें बायोमास मल्चिंग पर प्रमुख रूप से जोर दिया जाता है, पोषक तत्वों के कुशल रीसाइक्लिंग के लिए नाइट्रोजन फिक्सिंग फलीदार फसलों के साथ सहजीवन में फसल चक्र में विविधता लाने के बाद खेत में गाय के गोबर-मूत्र फॉर्मूलेशन का उपयोग किया जाता है।
✓ प्राकृतिक कृषि लागत में कमी और फसल विफलता के जोखिम को कम करके किसानों की आय को बढाने में मदद करती है।
✓ प्राकृतिक कृषि कृषि-अपशिष्ट से खेत पर ही तैयार किए गए इनपुट्स के उपयोग को बढावा देती है जिससे किसान आत्मनिर्भर बनता हैं।
✓ प्राकृतिक कृषि सिंथेटिक रासायनिक आदानों के प्रयोग को समाप्त करती है और इस प्रकार सुरक्षित और स्वस्थ भोजन प्रदान करती है जो कि सभी के लिए किफायती हो सकता है।
✓ प्राकृतिक कृषि सूखा, कीट, बीमारी और अन्य जलवायु-सम्बधित जोखिमों और झटकों के प्रति संवेदनशीलता को कम करके इसका लचीलापन बढाती है, और इसलिए छोटे मौसम और अनियममत मौसम पैटर्न जैसे दीर्घकालिक तनावों का सामना करने और बढने की क्षमता में सुधार होता है।
✓ प्राकृतिक कृषि मिट्टी के स्वास्थ्य को बहाल करने में मदद करती है।
✓ यदि प्राकृतिक खेती को पेशेवर तरीके से अपनाया जाए तो यह प्राकृतिक खेती के इनपुट उद्यमों, स्थानीय क्षेत्रों में मूल्य संवर्धन, प्रमाणीकरण और विपणन आदि के कारण रोजगार पैदा कर सकता है।
✓ प्राकृतिक खेती पानी की खपत को कम करने में भी सहायता प्रदान करती है जिसमें वाष्पीकरण के माध्यम से अनावश्यक पानी की हानि को रोकने के लिए गीली घास और विविध फसलों से मिट्टी को ढका जाता हैं, इस प्रकार यह ‘प्रति बूंद पानी, अधिक फसल’ की मात्रा को अनुकलित करता है।.
प्राकृतिक खेती की परिभाषाः कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार प्राकृतिक कृषि की परिभाषा एक रसायन-मुक्त प्राकृतिक कृषि प्रणाली है जिसमें कम लागत वाले इनपुट (गाय के गोबर/मूत्र और पौधों के अवशेषों पर आधारित) का उपयोग करने के साथ-साथ मल्चिंग और इंटर-क्रॉपिंग जैसी अनुशंसित कृषि प्रथाओं को बढ़ावा दिया जाता है। नीति आयोग के अनुसार, प्राकृतिक कृषि को ‘‘रसायन मुक्त और पशुधन आधारित कृषि” के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है। प्राकृतिक कृषि की यह परिभषा प्रचलित प्रथाओं पर आधारित है। कृषि-पारिस्थितिकी पर आधाररत, यह एक ‘‘विविधता पूर्ण कृषि प्रणाली है जो फसलों, पेड़ों और पशुधन को एकीकृत करती है, जिससे कार्यात्मक जैव विविधता का इष्टतम उपयोग होता है।
प्राकृतिक कृषि के सिद्वांतः पंचमहाभूत (मिट्टी, वायु, जल, आकाश और अग्नि/ऊर्जा) की देखभाल और रखरखाव का सिद्वांत जीवित इकाई के रूप में मिट्टी का सिद्वांत, पौधों, जानवरों और मनुष्यों को एकीकृत करने का सिद्वांत, जैव विविधता और सतत कृषि का सिद्वांत, जलवायु के प्रति लचीली प्रथाओं का सिद्वांत है।
प्राकृतिक खेती का महत्व:
✓ प्राकृतिक कृषि के सिद्वांतों के अनुसार, पौधों को पोषक तत्वों की 98 प्रतिशत मात्रा आप ताजी हवा, पानी और सूरज की रोशनी से मिलती है और शेष 2 प्रतिशत की पूर्ति प्रचुर मात्रा में अनुकूल सूक्ष्मजीवों से युक्त अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी से ही की जा सकती है। (बिलकुल जंगलों और प्राकृतिक प्रणालियों की तरह)।
✓ मिट्टी को हमेशा जैविक गीली घास से ढका रहना चाहिए, जो ह्यूमस बनाता है और अनुकूल सूक्ष्मजीवों के विकास को प्रोत्साहित करता है।
✓ मिट्टी की सूक्ष्म वनस्पतियों में सुधार के लिए किसी भी उर्वरक के स्थान पर खेतों में ही निर्मित ‘जीवामतृ और बीजामतृ’ आदि जैवसंस्कृति को मिट्टी में मिलाया जाता है। जीवामतृ और बीजामतृ देशी गाय की नस्ल के बहुत कम गोबर और गोमूत्र से प्राप्त होते हैं।
- इसमें कई अन्य लाभ प्रदान करते हुए किसानों की आय बढाने का वायदा भी किया गया है, जैसे कि ममट्टी की उर्वरता और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की बहाली, और ग्रीनहाउस गैस उर्त्सजन को कम करना आदि।
- इस प्रणाली के लिए केवल भारतीय नस्ल की गाय से प्राप्त गोबर और गोमूत्र (गोमूत्र) की आवश्यकता होती है। गाय के गोबर और मूत्र में माइक्रोबियल सामग्री की दृष्टि से देसी गाय स्पष्ट रूप से सबसे शुद्ध मानी जाती है।
- प्राकृतिक कृषि में मिट्टी में न तो रासायनिक और न ही जैविक खाद डाली जाती है। वास्तव में, मिट्टी में कोई भी बाहरी उर्वरक नहीं डाला जाता है या पौधों को किसी भी प्रकार का पदार्थ नहीं दिया जाता है।
- प्राकृतिक कृषि में, सूक्ष्मजीवों और केंचुओं के द्वारा कार्बनिक पदाथों के अपघटन को मिट्टी की सतह पर ही प्रोत्साहित किया जाता है, जो समय के साथ धीरे-धीरे मिट्टी में पोषक तत्वों को जोड़ता है।
- कीटों और बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए दशपर्णी अर्क और नीमास्त्र जैसे प्राकृतिक, खेत-निर्मित कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है।
- एकल फसल पद्धित के स्थान पर बहुफसली खेती को प्रोत्साहित किया जाता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
