वायुमंडलीय नत्रजन का जैविक स्थिरीकरण लाभ ही लाभ      Publish Date : 04/06/2026

       वायुमंडलीय नत्रजन का जैविक           स्थिरीकरण लाभ ही लाभ

                                                                प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

दलहनी फसल (मूंगफली एवं सोयाबीन) और कुछ चारे वाली फसलें (लोबिया, ग्वार, बरसीम और लूसर्न), आदि में वायुमण्डल से नत्रजन स्थिरीकरण की एक विलक्षण शक्ति पायी जाती है। इस नत्रजन का संचय इन फसलों की जड़ों में विकसित गाँठों (नोड्यूल्स) में उपस्थित एक विशेष जीवाणु जिसे रायजोबियम कहते हैं, के द्वारा सम्पन्न होता है।

नत्रजन की स्थिरीकरण की क्रिया इन फसलों के लिए बहुत लाभकारी होती है जिससे इनको नत्रजन की कमी वाली भूमियों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है और भूमि की उर्वराशक्ति में न केवल टिकाऊपन लाती है बल्कि उसमें वृद्धि भी करती है।  पृथ्वी के वायुमण्डल में 78 प्रतिशत प्राकृतिक नत्रजन पायी जाती है जो सामान्य ताप और दाब पर निष्क्रिय होती है। लेकिन जीवमण्डल (बायोस्फियर) की संचित नत्रजन की आवश्यकता इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सभी जीव और अधिकांश पेड़-पौधे गैसीय नत्रजन को समाहित या अवशोषित नहीं कर पाते हैं।

                      

इसके विपरीत हवा में विद्यमान (0.03) प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड सभी हरे पौधों द्वारा भोजन के रूप में ग्रहण की जाती है। ऐसा आंकलन किया गया है कि समुद्र तल की ऊँचाई पर एक हेक्टर क्षेत्र के ऊपर लगभग 78,000 टन गैसीय नत्रजन पाई जाती है। इसके विपरीत विश्वस्तर पर वार्षिक जैविक नत्रजन स्थिरीकरण 1750 लाख टन होता है जिसमें सहजीवी (सिम्बियोसिस) विधि से स्थिरीकरण लगभग 700 लाख टन होता है।

मूल ग्रन्थिका का निर्माण

दलहनी फसलों की जड़ों (मूल) की गांठों में एक विशेष संरचना होती है जो कि अतिथेय पादप (होस्ट प्लाण्ट) और संक्रमण करने वाले राइजोबियम के बीच पारस्परिक क्रियाओं के फलस्वरूप बनती है। मूल गांठों के निर्माण का पहला चरण राइजोबियम का दलहनों के मूल मंडल (रायजोस्फीयर) में प्रचुरोद्भावन (प्रोलीफरेशन) का होना है। जैसे ही राइजोबियम मूलमंडल में प्रवेश करते हैं उनकी वृद्धि दलहनी पौधों में अन्य पौधों की तुलना में अच्छी होती है। मूल गांठों के निर्माण आरम्भ होने में पौधे और राइजोबियम में जो परिवर्तन होता है वह यह दर्शाता है कि कोषकीय संरचना सिम्बियोसिस स्थापित करने में महत्वपूर्ण है। सबसे महत्वपूर्ण परिकल्पना ‘लेक्टिन पहचान’ (लेक्टिन रिकगनीशन) है जो कि संक्रमण क्षेत्र में मौजूद अनेक प्रकार के राइजोबियम विभिन्न दलहन लेक्टिन (लेग्यूमलेक्टिन) कॉर्बोहाइड्रेट बांइडिंग प्रोटीन होती हैं जो राइजोबियम की सतह पर पाये जाने वाले कॉर्बोहाइड्रेट से जुड़ने में मदद करती हैं।

राइजोबियम के संक्रमण से मूलरोमों का मुड़ना अतिथि की सक्रियता दर्शाते हैं। इसके प्रभाव से वाह्यचलीय कोशिकाओं की (जो मूलरोम सृजन करती है) भित्ति मोटी होना आरम्भ कर देती हैं और बढ़कर संक्रमण बिन्दु बनाती हैं। संक्रमण धागा में शाखादार बहुकोशीय संरचना मूलरोम पायी जाती हैं। संक्रमण धागे मूल कोर्टेक्स कोशिका द्रव्य की तरह वृद्धि करते हैं। मूलरोम से अन्तःकोर्टेक्स तक संक्रमण धागे का रास्ता स्पष्ट रूप से चिन्हित रहता है। संक्रमण धागे अन्तःत्वचा में प्रवेश नहीं करते हैं। अतः ग्रन्थिकायें कार्टेक्स में वाहिर्जात (एक्सोजीनस) ढंग से बनती हैं।

मूल कोशिकाओं का प्रचुर मात्रा में बनना संक्रमण घागों से राइजोबियम के छोड़ने पर निर्भर करता है। वृद्धि करती हुई ग्रन्धिकायें मूल की वाह्य त्वचा को भेदकर जड़ की बाह्य सीमा के बाहर निकल जाती है। गांठों में मौजूद राइजोबियम मूल जीवाणु से इस आधार पर भिन्न होता है कि उसमें कोशिका भित्ति नहीं होती। यह सहजीवन का आधारभूत परिवर्तन है।

नत्रजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया

जैविक नत्रजन स्थिरीकरण मूलतः वायुमंडलीय डाईनाट्रोजन को अमोनिया में बदलने की क्रिया है। यह गुण केवल राइजोबियम में ही पाया जाता है जो कि तीन प्रजातियों (राइजोबियम, ब्रैडीरायजोबियम और अजोरायजोबियम) में पाये जाते हैं। प्राकृतिक राइजोबियम मिट्टी में पाये जाते हैं जहाँ दलहनी फसल पिछले कई वर्षों से उगाई जाती रही हों। अधिकांश प्राकृतिक राइजोबियम ग्रन्थिकायें बनाने और नत्रजन स्थिरीकरण में निष्क्रिय होते हैं।

जड़ों की गांठों में नत्रजन स्थिरीकरण एक विशेष एन्जाइम जिसे नाइट्रोजिनेज कहते हैं, के द्वारा सम्पन्न होता है। यह राइजोबियम जीवाणु में पाया जाता है। नाइट्रोजिनेज समूह लोहा और गंधक प्रोटीन का बना होता है जिसको नाइट्रोजन रिडक्टेज या नाइट्रोजिनेज कहते हैं। नत्रजन के एक अणु के विघटन से दो अणु अमोनिया बनती है। हाड्रोजिनेज एन्जाइम जो जीवाणु कोशिका में उपस्थित होते हैं, सम्पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजन का प्रयोग करके ‘एटीपी’ उत्पन्न करते हैं। गांठों में नाइट्रोजिनेज की सबसे अधिक क्रियाशीलता कोशिका में सामान्यतः पायी जाने वाली ऑक्सीजन की सांद्रता के आधे से कम सांद्रता पर होती है क्योंकि यह एन्जाइम ऑक्सीजन के सामान्य स्तर पर निष्क्रिय हो जाता है।

जैविक नत्रजन स्थिरीकरण से दलहन की पैदावार बढ़ने में बाधाएँ

शोध प्रेक्षकों और किसानों के खेत पर राइजोबियम पर किये गये प्रदर्शनों में भली प्रकार राइजोबियम की उपयोगता दर्शायी गयी। तथापि राइजोबियम टीकाकरण किसानों में लोकप्रिय नहीं हुआ। इसके लिए निम्नलिखित बाधायें उत्तरदायी हैः

राइजोबियम का उत्पादन कम होना

(क) एक हेक्टर क्षेत्र के लिए 500 ग्राम राइजोबियम टीका की आवश्यकता होती है। देश में दलहन का क्षेत्रफल 240 लाख हेक्टर है। अतः प्रतिवर्ष 12000 टन रायजोबियम की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत देश में प्रतिवर्ष 10,000 टन रायजोबियम की कमी रहती है जिसके कारण प्रत्येक क्षेत्र में इसका प्रयोग नहीं हो पाता है।

(ख) संवाहक (इनोकुलेन्ट) की गुणवत्ता ठीक न होना यद्यपि राइजोबियम के लिए मानक तैयार कर लिये गये हैं जिसके अनुसार नमूनों में राइजोबियम की संख्या गिनी जाती है जो वास्तविक राइजोबियम नहीं होते।

(ग) अन्य लागत की तुलना में राइजोबियम पर प्रचार-प्रसार कम होता है।

(घ) प्राकृतिक कारक इन कारकों में जैविक व अजैविक दबाव आते हैं जैसे जैविक दबाव में प्राकृतिक राइजोबियम व उन्नतशील राइजोबियम में प्रतिस्पर्धा का होना है जिसमें प्राकृतिक राइजोबियम सफल रहते हैं। अजैविक कारकों में तापक्रम, भूमि का पीएच, नमी आदि आते हैं जिनका राइजोबियम के ऊपर कुप्रभाव पड़ता है।

(ङ) भंडारण और स्थानान्तरण की अच्छी सुविधाओं का न होना जिसके कारण राइजोबियम कम समय तक जीवित रहता है।

राइजोबियम कल्चर से दलहनों की पैदावार बढ़ाने की संभावनाओं के लिए सुझावः

1. अधिक सक्षम राइजोबियम की प्रजातियों का विकास करना।

2. ऐसी प्रजातियों का विकास करना जो भूमि के क्षारीयपन, जलभराव, उच्च तापक्रम, शुष्कावस्था आदि के लिए सहनशील हों।

3. दलहन की इस प्रकार की प्रजातियों का विकास करना जो वायुमंडलीय नत्रजन का अधिक मात्रा में स्थिरीकरण करना।

4 मैदानी क्षेत्रों के लिए राइजोबियम की प्रजातियों का विकास करना।

5. राइजोबियम कल्चर के भंडारण के लिए उपयुक्त परिस्थितियों का पता करना।

6. राइजोबियम के लिए उपयुक्त संवाहक को विकसित करना।

7. राइजोबियम उत्पादन इकाइयों को मदर कल्चर उपलब्ध कराना।

8. वर्तमान में उत्पादन इकाइयों को सुदृढ़ करना जिससे वह अधिक से अधिक राइजोबियम पैदाकर सकें। इसके साथ-साथ उत्पाद को क्रय करने को सुनिश्चित करें।

9 राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की संस्थानों में और गैर सरकारी संस्थानों में नई उत्पादन इकाइयों को स्थापित करना।

10. प्रत्येक उत्पादन इकाई के पास उचित क्षमता का फरमेन्टर उपलब्ध कराना।

11. पॉलीमर आधारित संवाहकों को प्रयोग में लाना चाहिए जिससे अधिक से अधिक राइजोबियम जीवित रह सकें और उनके जीवन का स्तर बढ़ सके।

12. प्रचार एवं प्रसार तथा प्रदर्शन कार्यक्रम।

की बाह्य सीमा के बाहर निकल जाती है। गांठों में मौजूद राइजोबियम मूल जीवाणु से इस आधार पर भिन्न होता है कि उसमें कोशिका भित्ति नहीं होती। यह सहजीवन का आधारभूत परिवर्तन है।

नत्रजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया

जैविक नत्रजन स्थिरीकरण मूलतः वायुमंडलीय डाईनाट्रोजन को अमोनिया में बदलने की क्रिया है। यह गुण केवल राइजोबियम में ही पाया जाता है जो कि तीन प्रजातियों (राइजोबियम, ब्रैडीरायजोबियम और अजोरायजोबियम) में पाये जाते हैं। प्राकृतिक राइजोबियम मिट्टी में पाये जाते हैं जहाँ दलहनी फसल पिछले वर्षों उगाई जाती रही हों। अधिकांश प्राकृतिक राइजोबियम ग्रन्थिकायें बनाने और नत्रजन स्थिरीकरण में निष्क्रिय होते हैं।

जड़ों की गांठों में नत्रजन स्थिरीकरण एक विशेष एन्जाइम जिसे साइट्रोजिनेज कहते हैं, के द्वारा सम्पन्न होता है। यह राइजोबियम जीवाणु में पाया जाता है। नाइट्रोजिनेज समूह लोहा और गंधक प्रोटीन का बना होता है जिसको नाइट्रोजन रिडक्टेज या नाइट्रोजिनेज कहते हैं। नत्रजन के एक अणु के विघटन से दो अणु अमोनिया बनती है। हाड्रोजिनेज एन्जाइम जो जीवाणु कोशिका में उपस्थित होते हैं, सम्पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजन का प्रयोग करके ‘एटीपी’ उत्पन्न करते हैं। गांठों में नाइट्रोजिनेज की सबसे अधिक क्रियाशीलता कोशिका में सामान्यतः पायी जाने वाली ऑक्सीजन की सांद्रता के आधे से कम सांद्रता पर होती है क्योंकि यह एन्जाइम ऑक्सीजन के सामान्य स्तर पर निष्क्रिय हो जाता है।

जैविक नत्रजन स्थिरीकरण को प्रभावित करने वाले कारक

1. नमी दलहनी सहजीवन शुष्कावस्था और अधिक नमी की अवस्था के लिए अधिक संवेदनशील है। अल्पकाल के लिए इन अवस्थाओं के प्रभाव के बाद सहजीवन की क्रिया पुनः कार्य करने लगती है। इसके विपरीत दीर्घावस्था तक इन परिस्थितियों में रहने पर स्थायी क्षति हो जाती है और अंत में गांठें गिर भी जाती है। शुष्क भूमि में मूलरोम के बनने में बाधा पड़ती है और इसके फलस्वरूप राइजोबियम का संक्रमण नहीं हो पाता।

2. तापक्रम अधिक तापक्रम पर प्रकाश संश्लेषण की क्रिया धीमी पड़ जाती है। अतः भोजन की पर्याप्त पूर्ति न होने पर नत्रजन के स्थिरीकरण पर कुप्रभाव पड़ता है।

3. पोषक तत्व पौयों की सामान्य वृद्धि के अतिरिक्त दलहन राइजोबियम सहजीवन क्रिया के लिए अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता पड़ती है। लवण तत्व जो सहजीवन क्रिया को संचालित करने के लिए आवश्यक होते हैं, जैसे- मॉलिब्डिनम, कोबाल्ट और लोहा। भूमि में अम्लीयपन के साथ-साथ अल्यूमिनियम और मैगेनीज की अधिकता और फॉस्फोरस, गंधक, कैल्शियम और मौलिब्डिनम की कमी से शुष्क जलवायु में उगाई जाने वाली फसलों में पैदावार कम हो जाती है क्योंकि सहजीवन सुचारू रूप से सम्पन्न नहीं हो पाता है। उसी प्रकार नत्रजन उर्वरकों के प्रयोग से गांठों के विकास पर कुप्रभाव पड़ता है।

4. लवणता (सैलेनिटी) राइजोबियम लवणता के ऊँचे स्तर को सहन कर सकता है। शीघ्र बढ़ने वाली राइजोबियम की प्रजातियों धीमी गति से बढ़ने वाली प्रजातियों लवण को अधिक सहन कर सकती हैं। यद्यपि राइजोबियम लवणीय और सामान्य भूमियों में विकसित होने वाली प्रजातियों में विशेष अन्तर पाया जाता है।

5. कर्षण क्रियायें अरहर की मूंग के साथ अन्तः फसल गांठों को बनने की क्षमता को बढ़ा देता है। इसके विपरीत अरहर की ज्वार के साथ अन्तः फसल का गांठों के बनने पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता है।

6. कीटों से क्षति दो कीट (सिटोना और रिवोलिया) दलहन गांठों ग्रन्थिकाओं पर आक्रमण करते हैं। रिचोलिया ग्रन्थिकाओं पर छेद करके उनको क्षति पहुँचाती है।

7. उत्तम राइजोबियम प्रजातियाँ प्राकृतिक राइजोबियम जो मिट्टी में पाये जाते है, नत्रजन स्थिरीकरण में अधिक सक्षम नहीं होते हैं। अधिक संख्या में गांठों का बनना और उनका आकार बड़ा होना अधिक मात्रा में नत्रजन के स्थिरीकरण का सूचक नहीं है। राइजोबियम की उन्नतशील प्रजातियों न केवल प्रत्येक दलहनी फसल के लिए अलग-अलग होता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।