बीज-जनित एवं मृदा-जनित रोगों तथा कीटों से बचाव हेतु बीजोपचारः आवश्यकता एवं उपचार विधियाँ      Publish Date : 03/06/2026

बीज-जनित एवं मृदा-जनित रोगों तथा कीटों से बचाव हेतु बीजोपचारः आवश्यकता एवं उपचार विधियाँ

                                                                प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 निधि सिंह

बीज समस्त कृषि का एक आधार है। फसल उत्पादन में बीज एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवयव होता है। स्वस्थ फसल उत्पादन की प्रथम आवश्यकता तथा बुनियाद स्वस्थ बीज ही है। तकनीकी हस्तांतरण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी भी बीज ही है जिसके द्वारा सरकारी, गैर सरकारी तथा विभिन्न कृषक समुदायों की आवश्यकता को सुगमता से पूरा किया जा सकता है। बीज की सुरक्षा द्वारा ही खाद्य एवं पोषक सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकता है। उत्पादन की कुल लागत का लगभग 20-30 प्रतिशत भाग अकेले बीज पर ही खर्च हो जाता है। गुणवत्तापूर्ण बीज होने की दशा में अन्य आदानों का भी फसल पर बेहतर प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। बीज विभिन्न प्रकार की व्याधियों का वाहक भी होता हैं जो भण्डारण के समय अथवा खेत में फसल को क्षति पहुँचाती है।

बीज-जनित एवं मृदा-जनित रोगों से बीज के अंकुरण तथा पौधों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के कारण फसल की उत्पादकता में कमी आ जाती है एवं बीज की भी गुणवत्ता प्रभावित होने से अगली फसल भी प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। बहुत से रोगों के कारक बीज की सतह पर अथवा बीज के अन्दर या बीज के साथ रहकर बीमारी फैलाते हैं। अतः किसी भी फसल से अधिकाधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए बीज का स्वस्थ एवं निरोग होना अत्यंत आवश्यक है। अतः बीजों को विभिन्न प्रकार की व्याधियों तथा कीटों से सुरक्षित रखने के लिए बीज का उपचार करना नितांत जरूरी, अत्यंत सस्ता, बहुत ही सरल एवं प्रभावी तरीका है। बीजोपचार में लागत तथा मेहनत कम लगती है तथा परिणाम अत्यंत अच्छे प्राप्त होते हैं। इस तकनीक से पर्यावरण भी दूषित नहीं होता है। बीजोपचार की प्रक्रिया में बीज को बोने से पहले फफूंदनाशी, जीवाणुनाशी अथवा परजीवी से उपचारित किया जाता हैं।

बीजोपचार से लाभ

बीजोपचार पौधों को स्वस्थ एवं रोगों एवं कीटों से सुरक्षित रखने की एक अत्यंत सुगम तथा प्रभावी तकनीक है। बीजोपचार से प्राथमिक संक्रमण को रोकने में सहायता मिलती है तथा बीज के अंकुर तथा नवीन पौधों का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। पौधों के स्वस्थ्य एवं रोगमुक्त रहने से फसल का विकास अच्छा होता है तथा उत्पादकता भी अच्छी प्राप्त होती है। बीजोपचार करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • पौधों की वृद्धि की आरंभिक स्थिति में बीज-जनित एवं मृदा-जनित रोगों एवं कीटों पर सुगमता से नियंत्रण पाए जा सकने के कारण फसल स्वस्थ एवं बेहतर होती है।
  • फसल का अंकुरण अच्छा एवं समान होता है।
  • बीजों को उपचारित करने से भंडार में बीज अधिक दिनों तक सुरक्षित बना रहता है। उच्च मूल्य के बीज को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखने के लिए बीजोपचार अत्यंत आवश्यक होता है।
  • पौधों के पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि होती है।
  • मृदा में उपस्थित हानिकारक कीटों एवं कवकों पर आसानी से नियंत्रण किया जा सकता है।
  • बीजोपचार में कवकनाशी रसायनों का प्रयोग अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में किया जाता है जो पर्यावरण की दृष्टि से कम हानिकारक होता है।
  • खड़ी फसल में मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रसायनों का प्रयोग कम से कम करना पड़ता हैं।
  • कृषकों के लिए बीजोपचार करना बहुत सस्ती तकनीक होने के साथ-साथ अत्यंत सुविधाजनक रहता है।
  • दलहनी फसलों के बीजों को उनके उपयुक्त राइजोबियम कल्चर से उपचरित करने से उनकी जड़ों में गाँठे अधिक बनती हैं। इन गांठों में सहजीवी राइजोबियम जीवाणु निवास करते हैं जो वायुमंडल से नाइट्रोजन अवशोषित करके जड़ों में उसका स्थिरीकरण करते हैं। इससे इन फसलों की नाइट्रोजन आवश्यकता और भी कम हो जाती है। इतना ही नहीं, अपितु दलहनी फसलों की कटाई के पश्चात बोई गई अगली फसल की नाइट्रोजन आवश्यकता भी कुछ हद तक कम हो जाती है।
  • बीजोपचार से अधिक नमी जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी फसल से अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
  • किसानों को फसल की उत्पादकता में भी 20 प्रतिशत तक मुनाफा मिलता है।

बीजोपचार की विधियाँ

                                                                                                                                 

सूर्यताप के द्वारा बीजोपचार

यह विधि मई एवं जून जैसे बहुत अधिक गर्मी वाले महीनों के लिए उपयुक्त होती है। कुछ रोगों के जीवाणु जो बीज के अन्दर निवास करते हैं, ऐसे रोगों के रोगाणुजनकों की उचित रोकथाम के लिए बीजों को मई एवं जून के महीने में जब तापमान 40 से 50 डिग्री सेल्सियस के मध्य होता है, बीजों को 7 घंटे तक पक्के फर्श पर धूप में फैला दिया जाता है। इस प्रकार बीजों को उपचारित करने से गेहूँ, जौ तथा जई में होने वाले अनावृत कंडुवा रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। बीज के आंतरिक भाग में उपस्थित रोगाणुजनकों को नष्ट करने के लिए रोगजनक की सुषुप्तावस्था को तोड़ना अनिवार्य होता है जिसके बाद ही सूर्य की गर्मी द्वारा उनको नष्ट किया जा सकता है।

नमक के घोल से बीजोपचार

नमक के घोल से बीजों को उपचारित करने हेतु सर्वप्रथम पानी में नमक का 2 प्रतिशत का घोल तैयार कर लिया जाता है। इसके लिए 20 ग्राम नमक को 1 लीटर पानी में अच्छी तरह मिला लेना चाहिए। बुवाई से पहले बीज को इसमें डाल कर हिलायें। हल्के एवं रोगी बीज इस घोल में तैरने लगेंगे। इन्हें निथार कर फेंक दें और पेंदी में बैठने वाले बीज को साफ पानी से अच्छी तरह धोकर सूर्य के प्रकाश में सुखा लेना चाहिए। इस प्रकार के नमक के घोल के उपचार से बाजरे का अर्गट जैसे रोग को सुगमता से नियंत्रित किया जा सकता है।

गर्म जल द्वारा बीजोपचार

बीजोपचार करने की इस विधि में बीज या बीज के रूप में प्रयोग होने वाले कंद को 52-54 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 15 मिनट तक रखते हैं। इस विधि से विभिन्न रोगजनक नष्ट हो जाते हैं तथा बीज के अंकुरण पर भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। गर्म जल द्वारा बीजोपचार की इस विधि का प्रयोग अधिकांश जीवाणुओं तथा विषाणुओं की रोकथाम के लिए किया जाता है।

गर्म वायु द्वारा बीजोपचार

पौधों में विषाणु द्वारा होने वाले रोगों के उपचार के लिए गर्म वायु द्वारा उपचार किया जाना अत्यंत प्रभावी पाया गया है। गन्ने में मोजेक विषाणु का नियंत्रण करने हेतु गन्ने के बीज टुकड़े को एक आर्द्र इक्यूबेटर अथवा गन्ने के बीजोपचार के लिए विशेष रूप से अभिकल्पित एमएचएटी मशीन में आठ घंटे तक 54° सेल्सियस गर्म वायु से उपचारित करते है। आलू के कंद को विषाणु से मुक्त करने हेतु अधिक आर्द्र दशा 37° से 39° सेल्सियस तापमान पर गर्म बक्से में रखना अत्यंत प्रभावी रहता है।

कवकनाशी द्वारा बीजोपचार

कवकजनित रोग से मुक्त करने के लिए कवकनाशी रसायन से निम्नलिखित पद्धति से बीजोपचार किया जाता है:

(अ) स्लरी बीजोपचार

इस विधि के अंतर्गत कवकनाशी रसायन की अनुशंसित मात्रा को थोड़े से पानी के साथ मिलाकर पेस्ट की तरह बना कर बीजों में मिला दिया जाता है तथा छाया में सुखाकर यथाशीघ्र बुवाई करते हैं। इस विधि से बीज जल्दी बुवाई के लिए तैयार हो जाते हैं। अतः समय की बचत होती है।

(ब) शुष्क बीजोपचार

कवकनाशी रसायन की अनुशंसित मात्रा के साथ बीजों को सीड ड्रेसिंग ड्रम में डालकर अच्छी तरह से हिलाते हैं जिससे रसायन के कुछ कण प्रत्येक बीज पर चिपक जाएँ। यदि बीज की मात्रा कम हो तो सीड ड्रेसिंग ड्रम के स्थान पर मिट्टी के घड़े का प्रयोग भी किया जा सकता है। सीड ड्रेसिंग ड्रम या मिट्टी के घड़े में बीज की मात्रा दो तिहाई भाग से ज्यादा नहीं भरना चाहिए।

(स) भीगा बीजोपचार

कवकनाशी रसायन की अनुशंसित मात्रा को पानी में घोल लेते हैं। तदुपरान्त इस घोल में बीज को कुछ समय के लिए छोड देते हैं। कुछ समय पश्चात इन बीजों को घोल से निकालकर छाएदार स्थान में 6-8 घंटे तक सुखा लिया जाता है। सूखने के पश्चात् यथाशीघ्र बुवाई करते हैं। सब्जियों के लिए यह विधि काफी लाभदायक सिद्ध हुई है।

कीटनाशक द्वारा बीजोपचार

मृदा में दीमक तथा अन्य कीट, पौधों को अंकुरण की अवस्था से ही क्षति पहुँचाना आरंभ कर देते हैं। बीज को कीटनाशकों से उपचारित कर बुवाई करने से बीज तथा पौधों को कीटों से मुक्त रखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त उपचारित बीज को भण्डारण के दौरान भी सुरक्षित रखा जासकता हैं। दीमक के उपचार के लिए क्लोरपाईरिफास 20 ई. सी. का पानी में घोल बनाकर बीज पर छिड़काव किया जा सकता हैं।

जीवाणु कल्चर से बीजोपचार

विभिन्न जीवाणु कल्चर से बीजोपचार करने से पौधों के लिए मृदा में पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता है। सामान्यतः उपयोग में आने वाले कुछ प्रमुख जीवाणु निम्नलिखित हैं:

(अ) राइजोबियम जीवाणु कल्चर

इस जीवाणु का दलहनी फसल के साथ प्राकृतिक सहजीविता का संबंध होता है। दलहनी फसलों की जड़ों में उपस्थित राइजोबियम जीवाणुओं में वायमंडल में उपस्थित नाइट्रोजन को मृदा में स्थिरीकरण कराने की अद्भुत क्षमता होती है। दलहन सहजीविता से 40-100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष नाइट्रोजन मृदा में स्थिर होती है। विश्व में नाइट्रोजन के कारखानों में उत्पादित होने वाली नाइट्रोजन की मात्रा से भी अधिक राइजोबियम जीवाणु मृदा में स्थिर कर देते हैं जो पौधों के उपयोग में कार्य आती है।

(ब) एजोटोबैक्टर जीवाणु

ये जीवाणु गैर दलहनी फसल जैसे धान, गेहूं, जौ, ज्वार, मक्का तथा बाजरा आदि के लिए उपयुक्त है। एजोटोबैक्टर जीवाणु 20-40 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर तक नाइट्रोजन को मृदा में स्थिर करते हैं।

(स) फास्फोरस विलेयकारी जीवाणु

फास्फोरस विलेयकारी जीवाणु मृदा में उपस्थित अविलेय, स्थिर तथा अप्राप्त फास्फोरस की विलेयता बढ़ाकर उसे पौधों को उपलब्ध कराने में सहायक होते हैं। इनका उपयोग लगभग सभी फसलों में किया जा सकता है।

जीवाणु कल्चर से बीजोपचार की विधिः जीवाणु कल्चर से बीजोपचार से अच्छे परिणाम के लिए सही विधि से बीजों को उपचारित करने का अत्यंत महत्व है। जीवाणु कल्चर (200 ग्राम) को गुड़ के 10 प्रतिशत घोल (1 लीटर पानी में 100 ग्राम गुड़ में) मिलाया जाता है। यह मात्रा एक एकड़ जमीन में बोये जाने वाले बीजों को उपचारित करने के लिए पर्याप्त होती है। इस कल्चर वाले घोल को बीजों के साथ इस प्रकार मिलाना चाहिए कि प्रत्येक बीज के ऊपर कल्चर की एक हल्की सी परत बन जाए। उपचारित बीजों को छाया में सुखाकर तुरंत खेत में बुआई कर देना चाहिए।

बीजोपचार करते समय अपनाई जाने वाली कुछ प्रमुख सावधानियाँ

  • यदि बीज को कवकनाशी, कीटनाशी तथा जीवाणु कल्चर तीनों से ही उपचारित करना हो तो बुवाई करने वाले बीजों को सबसे पहले फफूंदनाशी अथवा कवकनाशी से उपचार करें। उसके 2 घंटे के बाद कीटनाशी, फिर उसके चार घंटे बाद अंत में जीवाणु कल्चर से उपचार करना चाहिए।
  • कवकनाशी अथवा कीटनाशी की निर्धारित मात्रा से ही बीज उपचार करें। मात्रा कम रहने पर उसका लाभ कम प्राप्त होगा तथा अधिक मात्रा होने पर नुकसान होने की भी संभावना बनी रहती है।
  • रसायनों के प्रयोग से पहले उनको प्रयोग करने की अंतिम (एक्सपायरी) तिथि अवश्य देख लेना चाहिए।
  • रसायनों को बच्चों एवं मवेशियों से दूर रखें।
  • जिस व्यक्ति के हाथ में घाव या खरोंच हो उससे किसी भी रसायन का उपयोग नहीं करवाना चाहिए।
  • बीज को उपचारित करते समय हाथों में दस्ताने तथा चेहरे पर कपड़ा बांध लेना चाहिए।
  • बीजोपचार के बाद बीज को छायादार स्थान पर ही सुखाएं। कभी भी उपचारित बीजों को धूप में नहीं सुखाना चाहिए। जीवाणु कल्चर से उपचारित बीज को धूप में सुखाने पर जीवित जीवाणु मर सकते हैं, जिससे इस प्रकार के उपचार का कोई लाभ प्राप्त नहीं हो सकेगा।
  • बीजोपचार के बाद हाथ-पाँव तथा चेहरे को साबुन से भली-भांति धो लेना चाहिए।
  • उपचारित बीजों को रासायनिक उर्वरकों तथा कृषि रसायनों के सीधे सम्पर्क से बचाना चाहिए।
  • रसायनों के घोल, पैकेट या डिब्बे को प्रयोग करने के बाद नष्ट कर देना चाहिए।
  • बचे हुए उपचारित बीज को खाने के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार इस उपचारित बीज को पशुओं को भी नहीं खिलाना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।