
वर्मी कम्पोस्ट बनाने का वैज्ञानिक तरीका Publish Date : 02/06/2026
वर्मी कम्पोस्ट बनाने का वैज्ञानिक तरीका
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
वर्मी कम्पोस्ट एक बहुत अच्छी जैविक खाद है, जो केंचुओं की सहायता से तैयार की जाती है और यह मिट्टी को उपजाऊ बनाती है।
वर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिए आवश्यक सामग्रीः
- गोबर (सड़ा हुआ) 50-100 कि.ग्रा.।
- सूखी पत्तियां/फसलों के अवशेष।
- केंचुएं (Eisenia Fetida)।
- और पानी।
वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि:
केंचुआ कहाँ से लें?

कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विभाग, वर्मी कम्पोस्ट यूनिट, नजदीकी किसान जो वर्मी कम्पोस्ट बनाते हैं आदि से आप केंचुएं प्राप्त कर सकते हैं।
छायादार स्थान पर गड्डा/बेड बनाएं:
वर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिए गड्ढ़ा तैयार करने के बाद सबसे नीचे सूखी पत्तियां बिछाएं तथा इसके ऊपर गोबर की एक परत डालें। इस परत के ऊपर केंचुए डालें हल्का पानी छिड़कें ऊपर से बोरी/गुनी ढंक दें।
आकारः लंबाई 10 फीट चौड़ाई 3 फीट परत की मोटाई 4-6 इंच परत की मोटाई 4-6 इंच केंचुओं की मात्रा 1 किलोग्राम केंचुए प्रति 100 किलो गोबर नमी बनाए रखें, ताकि गड्ढे में नमी बरकरार रहें और पूरी सामग्री गीली रहे, लंकिन ध्यान रहे कि उसमें पानी न भरने पाए और उचित तापमान बना रहे।
गड्ढे की गहराई:- 1-1.5 फीट।
तैयार होने में लगने वाला समय:-

- वर्मी कम्पोस्ट लगभग 40-50 दिन में वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो जाता है।
- 15-20 दिन में एक बार धीरे से पलट सकते हैं (यदि आवश्यक हो तो)।
उपयोग करने का तरीका
- 1-2 टन/एकड़ खेत में डालें। गमले या पौधों की जड़ों में भी इसका उपयोग किया जा सकता हैं।
अपेक्षित सावधानियाँ:
- गड्ढे अथवा बेड को सीधी धूप और बारिश आदि से बचाकर रखें।
- आवश्यकता से अधिक पानी का प्रयोग न करें।
- केमिकल/रासायनिक दवाओं से यथासम्भव दूर रखें।
- गड्ढ़े अथवा बेड में नमी का स्तर 60-70 प्रतिशत बनाकर रखें तथा तापमान 15-30°C तक बनाए रखें।
विशेषः वर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिए सड़े हुए गोबर ही उपयोग करें, क्योंकि ताजा गोबर से गर्मी अधिक बनती है और केंचुओं को इससे नुकसान होता है।
वर्मी कम्पोस्ट उपयोग करने के लाभः
वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है, पौधों की बढ़वार को तेज करता है, रोगों से बचाव में मदद करता है, मिट्टी की जलधारण क्षमता को बढ़ाता है तथा फसल की पैदावार और उसकी गुणवत्ता बढ़ाता है। अतः आप सभी किसान भाईयों से अपील है कि जैविक खेती अपनाएं और कम लागत में मिट्टी को उपजाऊ बनाएं तथा स्वस्थ और गुणवत्तायुक्त फसल उत्पाद प्राप्त करें तथा अपना मुनाफा बढ़ाएं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
