
बना गांवों में बदलाव का जरिया Publish Date : 01/06/2026
बना गांवों में बदलाव का जरिया
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
साठ के दशक के उत्तरार्ध से बायफ ने ग्रामीण लोगों के बीच, खासकर डेयरी और महिला सशक्तीकरण में जो काम किया है उसने हजारों लोगों की गरीबी दूर करने में मदद की।
पुणे से करीब 30 किमी दूर उरुली कंचन गांव पहली बार वर्ष 1946 में चर्चा में आया, जब महात्मा गांधी यहां प्राकृतिक चिकित्सा आश्रम शुरू करने आए थे। उन्होंने इसका कामकाज देखने के लिए 20 वर्षीय मणिभाई देसाई को चुना। देसाई बाद में कई ग्रामीण पहल कदमियों से जुड़े, जैसे 1960 के दशक में भारत की पहली सहकारी लिफ्ट सिंचाई योजना और चीनी सहकारिता। फिर उन्होंने वर्ष 1967 में बीएआइएफ (भारतीय एग्रो इंडस्ट्रीज फाउंडेशन या बायफ) शुरू किया। वर्ष 1970 में बायफ ने डेयरी किसानों के लिए कृत्रिम गर्भाधान (एआइ) सेवाओं को घर-घर पहुंचाने की शुरुआत की।

बायफ डेवलपमेंट रिसर्च फाउंडेशन के मौजूदा अध्यक्ष और मैनेजिंग ट्रस्टी भरत काकडे ने भारत की 'श्वेत क्रांति' में इसकी भूमिका बताते हुए कहा, "इससे दूध की पैदावार बढ़ाने में मदद मिली, जो उस समय प्रति जानवर दो लीटर था। अगर मवेशियों की नस्लों में सुधार नहीं होता तो भारत में दूध की पैदावार नहीं बढ़ पाती।" बायफ ने कृत्रिम गर्भाधान प्रक्रियाओं और जानवरों के स्वास्थ्य की देखभाल में मदद के लिए टेक्नीशियनों का एक समूह बनाया है। इस मॉडल को राज्य सरकारों और डेयरियों ने अपनाया है और इसके तहत कई तरह के चारे विकसित किए गए हैं। बायफ एक ऐसे समूह का भी हिस्सा है जिसने गायों और भैंसों के लिए स्निप (सिंगल न्यूक्लियोटाइड पॉलीमॉर्फिज्म) चिप विकसित की हैं, ये डीएनए मार्कर हैं जो उम्दा किस्म के जानवरोंकी पहचान में मदद करते हैं। कुछ जगहों पर बायफ के केंद्रों में अब अनोखे 'मिल्क एटीएम' भी हैं जिनमें अच्छी क्वालिटी का होमोजेनाइज्ड दूध मिलता है।
बायफ ने वर्ष 1982 में महाराष्ट्र और गुजरात के आदिवासी इलाकों में परिवारों की आय बढ़ाने में मदद के लिए 'वाडी' कार्यक्रम शुरू किया। वाडी में खेती, बागवानी और वानिकी का काम शामिल है। इसमें गांव के तालाबों को फिर से जलयुक्त करना और नर्सरियों का विकास शामिल है। काकडे के मुताबिक, सर्वे से पता चला कि इससे गुजरात के आदिवासी जिलों में हरियाली बढ़ाने और गरीबी घटाने में मदद मिली है। अब इसे महाराष्ट्र के गढ़ चिरौली में भी लागू किया जा रहा है। बायफ ने उद्यमिता बढ़ाने और आजीविका के लिए कई स्वयं सहायता समूह भी शुरू किए हैं। इनमें से कुछ की मौजूदगी अब राष्ट्रीय स्तर पर है। प्रशिक्षण और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की मुखिया लता शर्मा बताती हैं कि अकेले उरुली कंचन के आस-पास उनके 132 स्वयं सहायता समूह हैं जिनमें 2,000 महिला सदस्य हैं। संकल्प इन समूहों की 70 महिलाओं का एक फेडरेशन है, जो इन समूहों के बनाए उत्पाद बेचता है।

इससे उरुली कंचन की सुमन शंकर मोरे जैसी महिलाओं को अतिरिक्त कमाई करने में मदद मिली है। उनके पास डिहाइड्रेटेड प्याज और नींबू जैसे उत्पाद बनाने के लिए एक सोलर कंडक्शन ड्रायर है, और ये उत्पाद संकल्प के आउटलेट पर बिकते हैं।
काकडे कहते हैं कि बायफ जलवायु परिवर्तन के अनुकूल खेती पर भी काम कर रहा है, खासकर पानी के सक्षम इस्तेमाल के साथ-साथ मिट्टी और जमीन के व्यापक प्रबंधन पर। उरुली कंचन में बायफ रूरल इनोवेशन सेंटर (ब्रिक) का 65 एकड़ का परिसर है जहां कई तरह के इनोवेशन हैं, इनमें एक कृषि-सौर बिजली परियोजना भी शामिल है, जहां मिर्च, बीन्स और केले जैसी फसलें उगाई जाती हैं और सौर बिजली भी पैदा की जाती है। अब फ्लोटिंग पैनल, पवन चक्कियां और एक हाइड्रोजन प्लांट की भी योजना है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
