क्या गन्ना किसानों को गन्ने की मुकम्मल कीमत दे रही सरकार? एक विचार      Publish Date : 16/05/2026

क्या गन्ना किसानों को गन्ने की मुकम्मल कीमत दे रही सरकार? एक विचार

                                                                                                                               प्रो0 आर. एस. सेंगर

देश के गन्ना किसानों के लिए केंद्र सरकार के द्वारा 2026-27 सीजन का 365 रुपये प्रति क्विंटल फ़ेयर एंड रेम्युनरेटिव प्राइस (एफआरपी) घोषित कर दिया गया है। सरकार इसे एक संतुलित और किसान हितैषी निर्णय बता कर किसानों को राहत देने की बात कह रही है। पीएम मोदी की अध्यक्षता में लिया गया यह फैसला दिल्ली के वातानुकूलित दफ्तरों में चाय की महँगी कुकीज़ के साथ फ़ाइलों के पन्नो पर भले ही आकर्षक दिखता हो, परन्तु उत्पादन लागत से 100 फ़ीसदी अधिक, रिकवरी आधारित प्रोत्साहन और न्यूनतम सुरक्षा का कोरे आश्वासन के अलावा और कुछ भी नहीं है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह निर्णय वास्तव में गन्ना किसानों की बदहाल आर्थिक स्थिति को बदलने की क्षमता रखता है, या यह केवल एकमात्र सांकेतिक बढ़ोतरी है जो किसानों के गहरे संकट को ढकने और आगामी यूपी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर किसानों को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है?

दरअसल सच्चाई यह है कि गन्ने की खेती आज पहले से कहीं अधिक महंगी हो चुकी है। बीज, खाद, डीज़ल, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी हर एक इनपुट की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में 182 रुपये प्रति क्विंटल की जो लागत आती है बहरहाल, जरूरत अब केवल एफआरपी बढ़ाने की नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था को सुधारने की है। पहला, लागत निर्धारण को वास्तविक और पारदर्शी बनाया जाए, जिसमें बाजार की मौजूदा परिस्थितियों का सही तरीके से आकलन किया गया हो। दूसरा, गन्ना भुगतान के लिए सख्त समय सीमा और कानूनी दंड सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि मिलों की मनमानी खत्म हो सके। तीसरा, किसानों को सीधे भुगतान (डायरेक्ट पेमेंट मैकेनिज्म) की व्यवस्था को अधिक मजबूत किया जाना चाहिए, जिससे कि बिचौलियों और देरी की समस्या कम हो और चौथा, गन्ना आधारित उद्योगों में किसानों की भागीदारी और लाभ साझेदारी को भी बढ़ाया जाना चाहिए।

                                    

जब तक यह संरचनात्मक बदलाव नहीं होते, तब तक एफआरपी में मामूली बढ़ोतरी किसानों के घाव पर मरहम नहीं, बल्कि नमक छिड़कने जैसा ही प्रतीत होती है। गन्ने की मिठास देश की अर्थव्यवस्था को ताकत देती है, लेकिन उसी गन्ने को उगाने वाला किसान अगर कर्ज, देरी और अनिश्चितता में फंसा रहे, तो यह सिर्फ आर्थिक नहीं, नैतिक विफलता भी है। अब समय है कि नीतियां कागजी संतुलन से आगे बढ़कर किसानों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाएं अन्यथा ‘मीठी-मीठी’ घोषणाएं भी कड़वी सच्चाई से हारती ही रहेंगी।

बताया जा रहा है, कि यह कहीं भी जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती है। आज गन्ना किसान, जिस वास्तविक लागत का सामना कर रहा है, वह इस आंकड़े से कहीं अधिक है। इस पर केवल 2.81 फीसदी की वृद्धि देना, वह भी तब जबकि महँगाई दर इससे कहीं अधिक है, दरअसल किसानों की वास्तविक आय को दोगुना नहीं बल्कि उसकी लगात का भी आधा करने जैसा नज़र आ रहा है।

यह उन किसानों की हकीकत है जो अपनी अगली फसल के लिए बीज और खाद खरीदने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं। यह उन परिवारों की कहानी है जिनके घरों में आय का मुख्य स्रोत महीनों तक अटका रहता है। गन्ना मिलों द्वारा भुगतान में देरी अब एक अपवाद नहीं, बल्कि एक ‘सिस्टम’ बन चुका है जिस पर सरकार अपनी आंखें बन्द किए है।

समस्या की असली जड़ यह है कि गन्ना गन्ना क्षेत्र की सबसे बड़ी विडंबना मूल्य निर्धारण और भुगतान प्रणाली में केवल कम कीमत को लेकर ही नहीं, बल्कि किसान के बकाया के लिए जवाबदेही की भी कमी है। कृषि लागत भुगतान का पुराना और गंभीर संकट और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की कहानी है। सरकार भले ही पिछले सीजन में सिफारिशों के बावजूद न तो लागत का 99.5 फीसदी भुगतान का दावा करे, यथार्थवादी आकलन हो पाता है और लेकिन मौजूदा 2025-26 सीजन में न ही मिलों को समय पर भुगतान सिर्फ़ क़रीब 88.6 फीसदी भुगतान ही करने के लिए प्रभावी रूप से बाध्य हो पाया है। इसका सीधा अर्थ है कि किया जाता है। कई बार राज्य सरकारें किसानों के हजारों करोड़ रुपये अब राज्य और केंद्र एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते हैं, और इस खींचतान में यह आंकड़ा सिर्फ प्रतिशत नहीं है किसान सबसे कमजोर कड़ी बन भी उनके पास नहीं पहुँचे हैं।

हलांकि, सरकार ने यह जरूर कहा है कि 9.5 फीसदी से कम रिकवरी वाले गन्ने पर भी 338.3 रुपये प्रति क्विंटल का भुगतान ही सुनिश्चित किया जाएगा। लेकिन यह राहत भी सीमित है। छोटे और सीमांत किसान, जो मौसम और तकनीकी संसाधनों पर निर्भर हैं, उनके लिए रिकवरी रेट बढ़ाना आसान नहीं होता। यानी जो किसान पहले से ही कमजोर स्थिति में हैं, उन्हें इस ‘सुरक्षा कवच’ से बहुत बड़ा लाभ नहीं मिलने वाला है। गन्ना क्षेत्र लगभग 5 करोड़ किसानों और उनके परिवारों की आजीविका से जुड़ा है, साथ ही लाखों श्रमिकों को भी यह क्षेत्र रोजगार प्रदान करता है।

इसके बावजूद यह क्षेत्र लगातार असंतुलन और अनिश्चितता से जूझ रहा है। एक तरफ सरकार एथेनॉल ब्लेंडिंग और चीनी निर्यात जैसे बड़े लक्ष्यों की बात करती है, दूसरी तरफ किसान अपनी मूल आय और समय पर भुगतान के लिए संघर्ष कर रहा है। यह स्थिति एक बड़े सवाल को जन्म देती है कि क्या हम गन्ना किसानों को सिर्फ उत्पादन का साधन मान रहे हैं, या उन्हें एक सम्मानजनक आर्थिक इकाई के रूप में देख रहे हैं?

बहरहाल, जरूरत अब केवल एफआरपी बढ़ाने की नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था को सुधारने की है। पहला, लागत निर्धारण को वास्तविक और पारदर्शी बनाया जाए, जिसमें बाजार की मौजूदा परिस्थितियों का सही आकलन हो। दूसरा, गन्ना भुगतान के लिए सख्त समय सीमा और कानूनी दंड सुनिश्चित किए जाएं, ताकि मिलों की मनमानी खत्म हो। तीसरा, किसानों को सीधे भुगतान (डायरेक्ट पेमेंट मैकेनिज्म) की व्यवस्था को मजबूत किया जाए, जिससे बिचौलियों और देरी की समस्या कम हो और चौथा, गन्ना आधारित उद्योगों में किसानों की भागीदारी और लाभ साझेदारी को बढ़ाया जाए।

जब तक ये संरचनात्मक बदलाव नहीं होते, तब तक एफआरपी में मामूली बढ़ोतरी किसानों के घाव पर मरहम नहीं, बल्कि नमक छिड़कने जैसा ही लगेगी। गन्ने की मिठास देश की अर्थव्यवस्था को ताकत देती है, लेकिन उसी गन्ने को उगाने वाला किसान अगर कर्ज, देरी और अनिश्चितता में फंसा रहे, तो यह सिर्फ आर्थिक नहीं, नैतिक विफलता भी है। अब समय है कि नीतियां कागज़ी संतुलन से आगे बढ़कर किसानों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाएं वरना ‘मीठी-मीठी’घोषणाएं भी कड़वी सच्चाई से हारती रहेंगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।