जनहित के लिए नवाचार कृषि क्रांति की पुनर्कल्पना      Publish Date : 12/05/2026

जनहित के लिए नवाचार कृषि क्रांति की पुनर्कल्पना

                                                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

हरित क्रांति में जहां कैलोरी पूर्ति पर ध्यान केन्द्रित किया गया था वहीं अब 'पोषाहार और समृद्धि की पक्की व्यवस्था' पर बल दिया जा रहा है जो भारत के कृषि परिवेश में अहम बुनियादी बदलाव है। जैसे-जैसे हम विकसित भारत@2047 का लक्ष्य पाने की ओर बढ़ रहे हैं, कृषि भी केवल निर्वाह का साधन मात्र न रहकर जय अनुसंधान की भावना पर आधारित टेक्नोलॉजी-चालित गतिविधि का रूप लेती जा रही है।कृषि क्षेत्र 21वीं शताब्दी की नई वैश्विक चुनौतियों के जाल में न में घिरा है। एक ओर तो दुनिया की आबादी 2050 तक 10 अरब तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है जिससे खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की सीमित मात्रा के दबाव में मौजूदा कृषि प्रणालियों पर जोर पड़ रहा है जिसे देखते हुए खेती के बेहतर और अधिक लचीले तौर-तरीके अपनाना जरूरी होता जा रहा है। ऐसे में खेती से जुड़े कार्यों में नवाचार अपनाना नितांत आवश्यक होता जा रहा है ताकि उत्पादकता बढ़ाने के साथ ही जलवायु के दबावों को झेला जा सके और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। इसके लिए जीपीएस, ड्रोन, सेंसर और डेटा विश्लेषण आदि की मदद से फसल उगाने पर ध्यान देना तथा एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता), जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल सेवाओं के जरिये नवाचारों का उपयोग बढ़ाना होगातथा ये सभी क्रियाएं उपज के वितरण के लिए भी अपनानी होंगी। इसे ही "चौथी कृषि क्रांति" का नाम दिया जाने लगा है। इन नवाचारों से सिर्फ मुनाफा या आय नहीं बढ़ेगी बल्कि इससे खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय स्थिरता और किसानों की आजीविका में सुधार जैसे जनहित से जुड़े नतीजे भी मिलेंगे।

भारतीय कृषि संदर्भ

देश में कृषि-टेक नवाचार से कहीं ज़्यादा जरूरी हो गए हैं क्योंकि हमारे सामाजिक-आर्थिक ढांचे में खेती का गहरा प्रभाव है। भारत में दुनिया की कुल आबादी का 18 प्रतिशत भाग रहता है लेकिन हमारे पास दुनिया की कुल जमीन का क़रीब 2.4 प्रतिशत हिस्सा ही है। यही कारण है कि कृषि उपज बढ़ाना और नवाचारों की खोज करते रहना बेहद जरूरी है। देश के लगभग 50 प्रतिशत कामगार कृषि क्षेत्र पर निर्भर हैं जबकि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इनका योगदान महज 18 प्रतिशत ही है। इस विषमता की वजह से उत्पादकता बढ़ाना हमेशा बड़ी चुनौती बना रहता है। देश में छोटी जोत वाले किसानों की बहुत बड़ी संख्या है (औसत जोत क़रीब 1 हेक्टेयर की है) और उन्हें सीमित पूंजी, बिखरे हुए छोटे-छोटे वाजारों, कटाई के बाद होने वाले नुकसान तथा जलवायु परिवर्तन से जुड़ी कठिनाइयों जैसी अनेक मुसीबतें सहनी पड़ती हैं। इसलिए भारत में कृषि नवाचारों का विकास करना बहुत जरूरी है तथा ऐसे समाधान खोजकर अपनाना भी आवश्यक है जिनसे लाखों किसानों की कृषि पैदावार बढ़ाकर उनकी आमदनी बढ़ाई जाए जिससे वे हिम्मत के साथ डटकर काम करते रहें। तभी समूचे ग्रामीण समुदाय की स्थिति भी सुधारी जा सकती है।

खाद्य सुरक्षा से समृद्धि की ओर

भारतीय कृषि के लिए सबसे बड़ा उदाहरण हरित क्रांति का ही है जिसके सहारे अनाज के भंडार भरने में कामयाबी मिली और खाद्यान्नों का कुल उत्पादन 1970-71 के 108.42 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 357.73 मिलियन टन के रिकॉर्ड उत्पादन तक बढ़ गया है। लेकिन, यह खाद-बीज जैसे कृषि निविष्टियों के प्रभावी इस्तेमाल पर आधारित प्रक्रिया है जिसकी मदद से अकाल से निपटने की और अनाज तथा पर्याप्त कैलोरी (भोजन) की व्यवस्था संभव हो गई। परन्तु इन निविष्टियों के बेहिसाब इस्तेमाल के कारण जमीन की उत्पादकता कम होती गई, अत्यधिक दोहन तथा बढ़ती आबादी के दवाव की वजह से भूजल स्तर घटता चला गया तथा खाद्यान्न में रासायनिक कणों के रह जाने के असर से स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत गंभीर नतीजे सामने आए।

अव हम 'खाद्य सुरक्षा' की बजाय 'समृद्धि की सुरक्षा' का दृष्टिकोण अपनाने लगे हैं जिसके तहत समुचित पोषाहार, आमदनी बढ़ाने की गुंजाइश और पर्यावरण को सुरक्षित रखने जैसे कारकों पर ख़ास ध्यान दिया जा रहा है। इसमें अनाज की मात्रा बढ़ाने पर ही नहीं बल्कि उसकी गुणवत्ता सुधारने पर जोर रहेगा। देश अब प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने को ही पैमाना न रखते हुए जमीन की उर्वरकता, पानी का पूरी किफायत और कुशलता के साथ इस्तेमाल तथा खेतिहर परिवार की असल आमदनी जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान दे रहा है। इस क्रांतिकारी बदलाव का संकेत प्रधानमंत्री ने जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान के साथ ही जय अनुसंधान जोड़कर स्पष्ट रूप से संकेत दिया है तथा नवाचार को केवल केंद्रित मुद्दा न रखकर सब के फायदे के लिए अपनाने की दिशा में बड़ी पहल की है। इस संदर्भ में यह माना गया है कि खेतीबाड़ी में लगे श्रमिक प्रौद्योगिकी का अप्रत्यक्ष लाभपाने वाले नहीं माने जा सकते बल्कि ये तो इस जानकारी को सामने लाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं तथा उनके अनुभवों से मिलने वाले निष्कर्षों के आधार पर ही ऐसे समाधान खोजे और अपनाए जा सकते हैं जो भारत के विविधतापूर्ण कृषि आधारित परिवेश के सर्वथा अनुरूप और अनुकूल होंगे।

भारतीय कृषि में जनहित के लिए नवाचार की नई परिभाषा

परंपरागत आर्थिक सिद्धांत के अनुसार 'सार्वजनिक लाभ' से तात्पर्य यही है कि वह सीमित लोगों या वर्ग के हित के लिए सीमित न हो और सभी लोग बेहिचक इसका इस्तेमाल या उपभोग कर सकते हैं। परंतु भारत जैसी तेजी से विकसित होती और मुख्य रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में, जहां 86 प्रतिशत कृषि जोत दो हेक्टेयर से भी कम वाली है, नवाचार की अवधारणा अलग ही आकार ले लेती है क्योंकि इसमें पहुंच, अनुकूलता और जवाबदेही भी शामिल रहती है। 'पहुंच' से तात्पर्य ऐसी प्रौद्योगिकियों से है जिनमें लागत, जटिलता और सांस्कृतिक दृष्टि से स्वीकार्यता जैसी बाधाएं न हों तथा कम से कम संसाधनों वाले किसान भी इनको इस्तेमाल कर पाएं। 'अनुकूलता' से तात्पर्य ऐसे समाधानों से है जिनमें विविध कृषि जलवायु क्षेत्रों, कृषि प्रणालियों और सामाजिक-आर्थिक हालात के हिसाब से सुधार या बदलाव किए जा सकें और इनके बुनियादी ढांचे की लागत बेहद ज़्यादा न हो। 'जवाबदेही' में वे व्यवस्थाएं आती हैं जिनमें किसानों की स्वायत्तता और उनकी परंपरागत जानकारी को उचित महत्व दिया जाए।

कृषि-प्रौद्योगिकी नवाचार का वैश्विक परिदृश्य

निरंतर बढ़ती जनसंख्या को भोजन उपलब्ध कराने के लिए कृषि टेक नवाचारों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। वैश्विक कृषि टेक बाजार का तेज गति से विस्तार हो रहा है तथा अनुमान है कि यह कारोबार 2024 में जहां 24.4 अरब अमेरिकी डॉलर का था वहीं 2030 तक बढ़कर 49 अरव अमेरिकी डॉलर का हो जाएगा। इस वृद्धि का असल कारण है कि कृषि क्षेत्र को सशक्त तथा स्थिर वनाने की मांग बढ़ती जा रही है तथा तेजी से विकसित हो रही प्रौद्योगिकियों के प्रभाव से कृषि क्षेत्र अधिक सक्षम और लाभकारी होता जा रहा है।विभिन्न देशों में प्रमुख नवाचारों को अपनाया जा रहा है। उदाहरण के लिए देखें तो प्रीसिजन (सटीक) कृषि के अंतर्गत जीपीएस, रिमोट सेसिंग तथा इंटरनेट ऑफ विंग्स (आईओटी) आधारित सेंसरों के इस्तेमाल से किसान अधिक सूझबूझ के साथ और सही तरीके से पानी, उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग करके अपनी उपज बढ़ा सकते हैं और उनके संसाधनों का संरक्षण होता रहा है। पौध रोपण, खरपतवार हटाने और हवाई छिड़काव करने की प्रक्रियाओं में ड्रोन का उपयोग बहुत प्रभावी रहता है। भारत में 'किसान ड्रोन' खेती के अंतरराष्ट्रीय संसाधनों में शामिल हो चुका है। जैव प्रौद्योगिकी और ब्रीडिंग नवाचारों में शामिल सूखे को सह सकने वाली या कीटनाशकों से प्रभावित न होने वाली फसलों की किस्में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में बेहद असरदार साबित हो सकती हैं।

भारत की नीतिगत प्राथमिकताएं

भारत की कृषि क्रांति मुख्य रूप से पोषाहार से भरपूर परंपरागत फसलों को अपनाने पर फिर से ध्यान देने, कृषि से जुड़ी वस्तुओं और सामग्रियों में आत्मनिर्भर बनने तथा खेती से जुड़ी स्वदेशी जानकारी का महत्व फिर से उजागर करने पर निर्भर करती है। आय के सीधे हस्तांतरण की पीएम-किसान योजना और किसान क्रेडिट कार्ड के जरिये किसानों को जरूरत पड़ने पर वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में 'ई-नाम' (इलेक्ट्रोनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार) प्लेटफॉर्म बाज़ार के पुराने अवरोध समाप्त करके दूरदराज के इलाकों के किसानों तक तथा विभिन्न राज्यों के खरीदारों तक फसलों और खाद-बीज की कीमतों की जानकारी पहुंचाने में मदद कर रहा है।पौष्टिक मोटे अनाज के बारे में भारत के मिशन के तहत मोटे अनाजों को 'श्री अन्न' माना गया है क्योंकि ये हर प्रकार की जलवायु को सह सकते हैं, इनकी उपज के लिए कम पानी चाहिए और खाद-बीज वगैरह भी कम ही लगते हैं तथा कई प्रमुख अनाजों के मुकाबले ये अधिक पौष्टिक भी होते हैं। भारत में 2024-25 में 180.15 लाख टन मोटे अनाजों का उत्पादन हुआ था और इस तरह वह विश्व में मोटे अनाज का सबसे बड़ा उत्पादक बनकर उभरा था। इस मिशन के तहत अधिक उपज देने वाले बीज वितरित किए जाते है, आधुनिक मशीनरी उपलब्ध कराई जाती है तथा ग्रामीण बुनियादी ढांचा विकास कोष (आरआईडीएफ) भी उपलब्ध कराया जाता है ताकि ऐसी पक्की व्यवस्था हो सके कि प्रोसेसिंग की समूची प्रक्रिया किसान समुदायों में ही पूरी की जाती रहे।

राष्ट्रीय तिलहन (खाद्य तेल) मिशन का लक्ष्य 40 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में तिलहन की खेती करने का है जबकि दाल (दलहन) उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भरता मिशन का लक्ष्य 2025-31 की अवधि में 35 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में दालों की खेती करने का है ताकि चला आ रहा आयात घाटा कम किया जा सके। भारत ने 2023-24 में 47.38 लाख टन दालों का आयात किया था जबकि 2013-14 में देश में दालों का उत्पादन 192.6 लाख टन से 2024-25 में बढ़कर 252.80 लाख टन हो चुका था। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन देसी गायों पर आधारित पशुधन समन्वयन, विविध फसलों की खेती, ऑन फार्म बायोमास मल्चिंग के तहत घासफूस और पत्तों की परत बनाकर मिट्टी की नमी बनाए रखने की विधि, गोबर तथा गोमूत्र से तैयार होने वाले जीवामृत और बीजामृत जैसे पदार्थों के उत्पादन तथा वनस्पतियों पर कीटनाशकों के छिड़काव पर नियंत्रण रखने पर जोर देता है।2026-27 के केन्द्रीय बजट में छोटे और बहुत छोटे किसानों के विकास पर जोर देकर कृषि को उत्पादकता वृद्धि और उद्यमिता से जोड़कर तीन कर्त्तव्यों का प्रारूप तैयार किया गया है। बजट में 'भारत-विस्तार' (वर्चुअली इंटीग्रेटेड सिस्टम टू एक्सेस एग्रीकल्चर रिसोर्सेज) को बहुभाषी एआई उपकरण के तौर पर इस्तेमाल करने का प्रस्ताव है और यह उपकरण एग्री-टेक पोर्टलों, कृषि निर्णयों, उत्पादकता और जोखिम प्रबंधन में सुधार की दृष्टि से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (आईसीएआर) के कृषि पद्धतियों के पैकेजों में समन्वय स्थापित करेगा। यह एआई उपकरण मत्स्यपालन के लिए 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों का समेकित विकास भी करेगा और ऐसे ही अन्य उपायों से नारियल, चंदन, कोको, काजू जैसी ज़्यादा मूल्य वाली फसलें उगाकर 2030 तक उनके विशिष्ट वैश्विक ब्रांड विकसित किए जाएंगे।

कृषि-प्रौद्योगिकी नवाचार : परम्परा और प्रौद्योगिकी को जोड़ना

ग्रामीण क्षेत्रों और गांवों में नवाचारों के विकास में लगे भारतीय भी अनेक विविध उद्देश्यों के लिए विभिन्न प्रकार की अहम कृषि प्रौद्योगिकियां विकसित करके वैश्विक कृषि-टेक विकास से जुड़ रहे हैं। राष्ट्रीय नवाचार फाउंडेशन (एनआईएफ) के प्रश्रय में हो रहे ये नवाचार किफायती और उपयुक्त समाधान देने वाले हैं और औपचारिक शोध संस्थानों से काफ़ी भिन्न हैं। इन नवाचारों को अपनाने पर किसानों और ख़ासकर महिला किसानों को ज़्यादा शारीरिक श्रम करने की जरूरत नहीं पड़ती जबकि लागत कम हो जाती है और कार्यकुशलता काफ़ी बढ़ जाती है। धान रोपण की चुनौती को देखते हुए तो यह नवाचार अत्यंत आवश्यक लगता है। कार्य परिवेश और उपकरणों के अनुकूल प्रयोग से जुड़े अध्ययनों से पता चलता है कि पौध रोपण के लिए अधिकतर महिलाएं ही काम करती हैं और उन्हें काफ़ी लम्बे समय तक आगे की ओर नीचे झुककर काम करना पड़ता है और इसके लिए उन्हें वहां एकत्र पानी में खड़े रहना होता है जिससे शारीरिक थकान और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम का शिकार होने की आशंका बनी रहती है। इस समस्या से निपटने के लिए स्थानीय नवाचार खोजने वालों ने कम खर्चीले विकल्प निकाल लिए हैं। उड़ीसा में सम्बलपुर के रणजीत मिरिग ने हाथ से चलनेवाला ऐसा ट्रांसप्लांटर (धान रोपक यंत्र) विकसित किया है जिसमें दो ऑपरेटरों की जरूरत होती है और इससे एक घंटे में क़रीब 0.3 एकड़ क्षेत्र में रोपाई हो जाती है। एनआईएफ की ओर से कराए परीक्षणों से पता चलता है कि इस तरीके को अपनाने से हाथ से की जाने वाली परंपरागत रोपाई के मुकाबले सात गुणा कम समय लगता है। इसी तरह उड़ीसा के कोरापट के सदासिव माझी ने साधनों की कमी से जूझ रहे जनजातीय क्षेत्र के धान रोपने वालों के लिए ऐसा उपकरण तैयार किया है जो एक घंटे में ही क़रीब 0.6 एकड़ क्षेत्र में एक साथ छह पंक्तियों में धान की रोपाई कर सकता है।

धरमबीर कम्बोज ने भी मल्टीपर्पज फूड प्रोसेसिंग मशीन विकसित की है जिसमें कटाई के बाद की टेक्नोलॉजी को ग्रामीण उद्यमिता के अनुरूप बनाना संभव हो गया है। धरमवीर की यह खाद्य प्रसंस्करण मशीन पोर्टेबल है और यह लम्बाई में खड़ी की जा सकने वाली सिलेंडरनुमा मशीन है तथा इसकी मदद से 100 से भी ज़्यादा विभिन्न प्रकार के फलों, जड़ी-बूटियों और बीजों की प्रोसेसिंग की जा सकती है। इसमें एक घंटे में ही 200 लीटर एलो वेरा प्रोसेस किया जा सकता है और यह बड़े प्रेशर कुकर की तरह नियंत्रित तापमान पर काम कर सकती है तथा इसमें ऑटोमेटिक कटऑफ सुविधा भी है।इस मशीन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें कंडनसेशन मेकेनिज्म भी लगाया गया है जिसकी मदद से फूलों, बीजों, चिकित्सीय पौधों का अर्क निकाला जा सकता है; पल्वराइजिंग, मिक्सिंग, स्टीमिंग, प्रेशर कुकिंग हो सकती है; तथा जूस, तेल ओर जैल भी निकाला जा सकता है। ये सभी सुविधाएं इस अकेली मशीन से प्राप्त होती हैं। इस नवाचार को विभिन्न राज्यों में महिलाओं के स्वसहायता संस्थाओं ने अपनाया है जिससे उन्हें आजीविका के अच्छे अवसर मिल रहे हैं। अभी तो यह मशीन 15 देशों को निर्यात की जा रही है।ये तो ऐसे हजारों स्थानीय नवाचारों में से गिने-चुने नवाचार हैं जो वहां के लोगों के लिए कम लागत में प्रभावी समाधान उपलब्ध करा रहे हैं।

जमीनी स्तर के कृषि नवाचारों से आत्मनिर्भरता

एग्रीटेक मशीनरी नवाचारों पर इस चर्चा से कृषि में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने का संदर्भ भी सामने आता है जिसे आमतौर पर योजनाओं और सरकारी सब्सिडी (सहायता) के रूप में ही देखा जाता रहा है।ग्राम स्तर की गतिविधियों को ध्यान से देखने पर नवाचार के अनेक नए आयाम उभरकर आते हैं। मशीनरी और उपकरणों के साथ ही किसान पौध की किस्मों की ब्रीडिंग, चयन और सुधार करके उपज बढ़ाने, उनकी क्वालिटी सुधारने, भंडारण की व्यवस्था और उन्हें मौसम के बदलाव में सुरक्षित रखने (सीजनिंग करने) में कामयाबी पा रहे हैं। नवाचार पर आधारित इन कृषि गतिविधियों में समन्वय रखने के लिए एनआईएफ आकलन, परीक्षण और संरक्षण के कड़े मानकों के तहत पौध किस्मों के संरक्षण और किसानों के अधिकारों से जुड़े प्राधिकरण (पीपीवी और एफआरए) का प्रारूप तैयार करने तथा बाजार में पहुंच उपलब्ध कराने में सहयोग करता है जिससे नवाचार खोजने वाले किसानों को पहचान और मान्यता मिल सके तथा उनकी सूझबूझ और जानकारी का महत्व भी लोगों को पता चले। ग्रामीण नवाचारों की इस व्यापक व्यवस्था में बीसियों किसानों और अनेकों कृषि समुदायों का योगदान मिल रहा है और सभी को उनके प्रयासों का सुफल मिल रहा है।

ग्राम स्तर के इन नवाचारों से एक़दम पक्के तौर पर दिखता है कि किसान किस प्रकार लगातार सुधारों की मदद से और संस्थागत सहायता के सहारे स्थानीय जानकारी से ही समुचित समाधान खोज रहे हैं जिनके परिणाम दूर-दूर तक पहुंच रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के विलासपुर के हरिमन शर्मा खेत में किए प्रयोगों के जरिये आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और बागवानी के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर उपयोगी बदलाव लाने में सफल हुए हैं। उन्होंने अंकुरण, कलम बांधने और सुधार के वारे में अध्ययनों की सहायता से सेब की एचआरएमएन-99 किस्म का विकास करने में कामयाबी हासिल की जो परंपरागत खेती को बदलने की चुनौती देती है। जहां पहले 5000 से 8500 फुट की ऊंचाई पर सेब की खेती की जाती थी और जिसमें शीतन प्रक्रिया में 1000 से 1500 घंटे का समय लगता था वहीं एचआरएमएन-99 को मैदानी इलाकों में, शीतोष्ण जलवायु में या उप-ट्रॉपिकल क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता है जहां तापमान 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। फिर फूल आने और फल लगने के लिए शीतन प्रक्रिया पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। एनआईएफ ने अनेक जगहों पर फार्म परीक्षणों के लिए सहायता उपलब्ध कराई तथा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर के सात राज्यों में दो साल में 3,572 पौध लगाकर उनकी अनुकूलता और उनके फलने के बारे में परीक्षण किए। ख़ास बात यह दिखी कि एक साल वाले पौधों में भी फलन हो रहा था जिससे पता चला कि इस किस्म को अपनाने से उत्पादन तेजी से कम समय में हो सकता है। इस एचआरएमएन-99 को पीपीवी और एफआरए ने विधिवत संरक्षण प्रदान किया है तथा हरिमन शर्मा को कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए 2025 में पदमश्री से सम्मानित किया गया था।

इसी प्रकार मध्यप्रदेश के रियावान में ईश्वरलाल धाकड़ ने लहसुन की स्थानीय किस्म पर लगातार पूरी एकाग्रता और लगन के साथ चयन प्रक्रिया अपनाकर लहसुन की सुधरी किस्म 'रियावान सिल्वर' तैयार कर ली। इस लहसुन के गुच्छे काफ़ी बड़े-बड़े होते हैं और कलियां भी ज़्यादा सफेद तथा बड़े साइज की होती है; एक गुच्छे में क़रीब 20 कलियां होती हैं और एक हेक्टेयर में 120 क्विंटल तक का उत्पादन लिया जा सकता है तथा इन्हें 10 महीने तक स्टोर करके रखा जा सकता है।हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और गुजरात में इसकी लगभग 100 क्विंटल पौध रोपण सामग्री वितरित की जा चुकी है। उधर, राजस्थान में कोटा के किसान श्रीकिशन सुमन ने आम की नई किस्म 'सदाबहार' विकसित की है जिसकी खेती वर्ष भर में कभी भी की जा सकती है। उन्होंने 15 वर्ष मेहनत करके आम की कलमों के संरक्षण और सुधार के परीक्षणों के बाद यह बौनी किस्म तैयार करने में सफलता पाई है। 'सदाबहार' में आम की अक्सर होने वाली बीमारियां नहीं लगतीं और आमतौर पर होने वाली गड़बड़ भी नहीं होती। इसका रंग गहरा संतरी होता है और इसमें लंगड़े आम जैसी मिठास होती है।

'सदाबहार' वौनी किस्म है और इसे किचन गार्डन में भी उगाया जा सकता है और सघन बगीचों में भी यह पूरी तरह कामयाब रहती है। एनआईएफ ने इस किस्म का ऑन-साइट आकलन और खेत में परीक्षण करने के लिए आईसीएआर तथा बंगलौर के भारतीय वागवानी अनुसंधान संस्थान और राजस्थान में जयपुर के एसकेएन कृषि विश्वविद्यालय के सहयोग से सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं।इस प्रकार स्वदेशी किस्मों में सुधार, संस्थागत प्रमाणीकरण, अधिकार संरक्षण से उद्यमशीलता तक के सभी चरणों में किसानों ने क्रांतिकारी बदलाव लाकर दिखा दिया है कि कोई अकेला उत्पादक कैसे वैल्यू-चैन में भागीदार बन सकता है।

आगे का मार्ग

हरित क्रांति में कैलोरी-पूर्ति पर ध्यान केंद्रित था पर अब 'पोषाहार और सुनिश्चित समृद्धि' पर बल दिया जा रहा है। देश के कृषि परिवेश में यह बहुत बड़ा और अहम बुनियादी बदलाव है। विकसित भारत@2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ने के साथ ही खेती मात्र गुजर-बसर का साधन न रहकर टेक्नोलॉजी आधारित गतिविधि बनती जा रही है जिसमें 'जय अनुसंधान' की भावना शामिल हो जाने से नया उत्साह आता जा रहा है। स्वदेशी जानकारी की प्रणाली और उन्नत डिजिटल व्यवस्था का अंतराल खत्म करके भारत विकेन्द्रित नवाचारों के आधुनिक युग में प्रवेश कर चुका है। इस नीति को बनाये रखने के लिए हमें प्रीसिजन अर्थात् सटीक उपायों पर ध्यान देना होगा ताकि 11 करोड़ किसानों के कासाथ कामाय बनाकर रोजगार के अवसर भी बढाए जा सकें। एग्री-स्टैक आंकड़ों का जलवायु के अनुरूप स्थानीय तौर-तरीकों के कारण फसल की कटाई के बाद होने वाले नुकसान को 20 से 30 प्रतिशत तक कम किया जा सके। कृषि को उत्पादन की परोक्ष गतिविधि मानने की जगह उसे स्वायत्त उद्यम का स्वरूप देकर ही 'कर्त्तव्य से कीर्तिमान' की यात्रा का मार्ग प्रशस्त होगा जिससे आत्मनिर्भरता और टिकाऊ प्रगति के लक्ष्य पाने में भी निश्चित साथ ही, उत्पादन के बेहतर तरीके अपनाकर सप्लाई चेन व्यवस्था मदद मिलेगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।