
गिरे आलू के भाव, लागत निकालना हुआ मुश्किल Publish Date : 09/05/2026
गिरे आलू के भाव, लागत निकालना हुआ मुश्किल
प्रोफेसर आर. एस. सेगर
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उत्पादन में गिरावट और कम बाजार भाव के कारण आर्थिक संकट का सामना कर रहे जिले के किसान-
आलू के उत्पादन में गिरावट और कम बाजार भाव के कारण मेरठ के किसान आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही है। 250 से 350 रुपये में 50 किलो का बैग बिक रहा है। मेरठ में लगभग आठ हजार हेक्टेयर भूमि पर आलू की खेती की जाती है। इस वर्ष आलू की फसल अच्छी नहीं हुई है। पिछले वर्ष प्रति बीघा 25 क्विंटल आलू की पैदावार हुई थी। इस बार फसल कमजोर होने के कारण यह पैदावार घटकर 15 क्विंटल प्रति बीघा रह गई है।
बाजार में आलू का भाव 500 से 700 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा है। यह भाव किसानों की लागत से काफी कम है। अमर उजाला की पड़ताल में पता चला कि आलू किसान घाटे की खेती कर रहे हैं। किसान शीतगृह में आलू रखने से भी डर रहे हैं। उन्हें आशंका है कि यदि 1300-1400 रुपये प्रति क्विंटल भाव नहीं मिला तो भारी नुकसान होगा। पांच बीघा खेत में आलू की बुवाई से लेकर खुदाई तक का कुल खर्च 51150 रुपये आता है। इसमें बुवाई से पहले खेतों की जुताई पर 4700 रुपये और मशीन से बुवाई पर 2000 रुपये खर्च होते हैं। 10 क्विंटल आलू के बीज की कीमत 18000 रुपये है।

पांच बोरे डीएपी पर 6750 रुपये, एक बोरा पोटाश पर 1850 रुपये और कैल्शियम व रीजेंट पर 2000 रुपये लगते हैं। पांच बोरे यूरिया पर 1350 रुपये और पलेवा से लेकर फसल की सिंचाई पर 3500 रुपये का खर्च आता है। आलू की खुदाई पर 11000 रुपये खर्च होते हैं।
उत्पादन और आय का गणित
पांच बीघा खेत में इस बार कुल 75 क्विंटल आलू का उत्पादन हुआ है। मंडी में किसान के आलू का वर्तमान भाव 500 से 700 रुपये प्रति क्विंटल है। इस हिसाब से किसान की कुल आय 37,500 रुपये से 52,500 रुपये के बीच रहती है। यह आय कुल लागत 51,150 रुपये से कम या उसके बराबर है। इस प्रकार किसान को अपनी मेहनत और पूंजी का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
किसानों की मजबूरी और चिंता

अतराडा के किसान दिनेश त्यागी प्रतिवर्ष 100- बीघा से अधिक आलू की खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि इस बार उत्पादन कम है। बाजार में भाव भी बहुत कम हैं। व्यापारी खेत से ही 500 से 700 रुपये प्रति क्विंटल आलू खरीद रहे हैं। किसान मजबूरी में सस्ते दामों पर आलू बेच रहे हैं। इसका कारण यह है कि शीतगृह में रखने पर किराया और भाड़ा भी लगेगा। यदि फिर भी अच्छे रेट नहीं मिले तो किसानों की कमर टूट जाएगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
