
हरी खादः मृदा स्वास्थ्य के लिए एक कुंजी Publish Date : 02/05/2026
हरी खादः मृदा स्वास्थ्य के लिए एक कुंजी
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 निधि सिंह
वर्तमान समय में फसलों में रासायनिक उर्वरकों का लगातार बढ़ता उपयोग एक गंभीर संकट बन चुका है। रासायनिक उर्वरकों पर जरूरत से अधिक निर्भरता के कारण हमारा पर्यावरण भी लगातार प्रदूषित होता जा रहा है। इसके अलावा मृदा की उर्वरा शक्ति भी लगातार कम होती जा रही है और इस प्रकार से आने वाले समय में यह समस्या और भी अधिक गंभीर होती जाएगी। जैसा कि पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग के कारण मृदा में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ में लगातार कमी आ रही है तथा हमारी कृषि योग्य भूमि भी अब निरंतर बंजर होती जा रही है।
ऐसी स्थिति में खेती में रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग एवं इनकी सीमित उपलब्धता को देखते हुये अन्य पर्याय भी उपयोग में लाना आवश्यक हो गया है। तभी हम खेती की लागत को कम कर फसलों की प्रति एकड़ उपज को भी बढ़ा सकते हैं, साथ ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी अगली पीढी के लिए बनाए रख सकेंगे और इससे हमारे किसान भाईयों को भी अच्छी आय प्राप्त हो सकेगी। रासायनिक उर्वरकों के विकल्प के रुप में हम विभिन्न प्रकार की जैविक खादों जैसे गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद आदि का उपयोग कर सकते हैं। इनमें हरी खाद का प्रयोग करना आज के परिवेश में सबसे सरल व अच्छा है।

इसमें पशुधन में आई कमी के कारण गोबर की उपलब्धता पर भी हमें निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होती है। अतः हमें हरी खाद के यथासंभव उपयोग पर गंभीरता से विचार कर उसका क्रियान्वयन करना चाहिए।
हरी खाद, मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढाने के लिये एवं फसल उत्पादन हेतु जैविक माध्यम से तत्वों की पूर्ति करने का एक वह साधन है जिसमें हरी वानस्पतिक सामग्री को उसी खेत में उगाकर या कहीं से लाकर खेत की मृदा में मिला दिया जाता है। इस प्रक्रिया को ही हरी खाद देना कहते हैं। भारत में हरी खाद देने की प्रक्रिया पर लम्बे समय से चल रहे प्रयोगों व शोध कार्यों से सिद्ध हो चुका है कि हरी खाद का प्रयोग अच्छे फसल उत्पादन के लिये बहुत लाभकारी रहता है। यदि हम अपने खेतों में हरी खाद का प्रयोग करते हैं तो फसल उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण का भी संरक्षण होता है तथा उत्पादन लागत भी कम आती है।
रासायनिक उर्वरकों द्वारा मृदा को सिर्फ आवश्यक पोषक तत्व जैसे- नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश तथा सूक्ष्म तत्वों इत्यादि की पूर्ति तो हो जाती है लेकिन मृदा संरचना उसकी जल धारण क्षमता एवं उसमें उपस्थित सूक्ष्मजीवों की क्रियाशीलता बढ़ाने में रासायनिक उर्वरकों का कोई योगदान नहीं होता है।
अतः इन सबकी पूर्ति करने हेतु हरी खाद का प्रयोग खेत के लिए एक संजीवनी बूटी की तरह से ही काम करता है। हरी खाद की फसल उस फसल को कहते हैं जिसकी खेती मुख्यतः भूमि में पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाने के साथ-साथ उसमें जैविक पदार्थों की पूर्ति करने के उद्देश्य से की जाती है। इसके लिए प्रायः दलहनी एवं अदलहनी फसलों को उनकी हरी अवस्था में मिट्टी में मिला दिया जाता है। इस प्रक्रिया को ही हम हरी खाद देना कहते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ने के साथ-साथ जीवाणुओं की मात्रा एवं क्रियाशीलता में भी बढ़ोत्तरी होती है क्योंकि बहुत सी रासायनिक क्रियाएं जो सूक्ष्मजीवों के लिए आवश्यक होती हैं, हरी खाद में उनकी बढ़ोत्तरी होती है।
हरी खाद की प्रमुख विशेषताएँ
- कम समय में अधिक जैवभार प्राप्त होता है।
- रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते हुए खर्च को लगभग ₹2,000/- प्रति हेक्टेयर तक कम कर सकती है।
- हरी खादें खेत में खरपतवारों को पनपने नहीं देती है।
- यह कीट-व्याधियों के प्रति भी संवेदनशील नहीं होती हैं।
- ऊसर भूमि में 4-5 साल लगातार लगाने पर वह भूमि फसल लगाने योग्य हो जाती है।
- मिट्टी में उपस्थित लाभदायक सूक्ष्मजीवों के लिए खाद्य पदार्थ का काम करती है।
हरी खाद के लिए फसल का चयन
हरी खाद के लिए मुख्यतया दलहनी फसलें ही अधिक लाभदायक होती हैं तथा इसके लिए निम्नलिखित गुणों वाली फसलों का चयन करना चाहिए:-
1. कम समय में फसल की अधिक वृद्धि होनी चाहिए।
2. फसल की जल मांग बहुत कम होनी चाहिए।
3. जलवायु की विभिन्न परिस्थितियों जैसे अधिक तापमान, कम तापमान, कम या अधिक वर्षा को सहन करने की क्षमता से युक्त होनी चाहिए।
4. फसल कीटों व रोगों से प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
5. विभिन्न प्रकार की मृदाओं (क्षारीय, लवणीय) में भी अच्छी बढ़वार लेने वाली होनी चाहिए।
6. फसल की जड़ें अधिक गहराई तक पहुँचें तथा वानस्पतिक वृद्धि, शाखायें व पत्तियां मुलायम होनी चाहिए।
7. कम समय में मृदा में विघटित वाली हों।
8. इन फसलों की पोषक तत्वों की मांग कम होनी चाहिए।
हरी खाद के लाभ
1. हरी खाद नत्रजन व कार्बनिक पदार्थों के साथ-साथ मिट्टी में कई पोषक तत्व भी उपलब्ध कराती है।
2. हरी खाद के प्रयोग से मृदा में वायु संचार, जल धारण क्षमता में वृद्धि, सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता में वृद्धि के साथ-साथ उसकी उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन क्षमता में भी बढ़ोत्तरी होती है।
3. क्षारीय व लवणीय मृदाओं में भी सुधार होता है क्योंकि हरी खाद अपघटन के बाद मृदा के पी.एच. मान को कम करती हैं।
4. मृदा में पोषक तत्वों का संरक्षण एवं एकत्रीकरण कर मृदा की अधोसतह में सुधार होता है।
5. नत्रजन का स्थिरीकरण में बढ़ोत्तरी एवं मृदा क्षरण में कमी होती है।
6. खरपतवार नियंत्रण होता है।
7. फसलों के उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करके धन की बचत कर टिकाऊ खेती कर सकते हैं।
8. मिट्टी की भौतिक एवं रसायनिक संरचना में सुधर होता है।
9. हरी खाद मिट्टी में गहरी जड़ें विकसित करती है जिसके कारण मिट्टी में वायु संचार बेहतर होता है।
10. मिट्टी में उपस्थित लाभदायक सूक्ष्मजीवों के लिए यह खाद्य पदार्थ का काम करता है जो इन्हें खाकर बहुत तेजी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं जिससे अपघटन तेजी से होता है इसी किया के दौरान जो पोषक तत्व निकलते हैं उससे मृदा के जैविक गुणों में वृद्धि होती है।
11. हल्की तथा भारी दोनों प्रकार की मिट्टियों में कार्बनिक पदार्थ वृद्धि से उपज में वृद्धि के साथ-साथ मिट्टी में हयूमस की मात्रा बढ़ने के कारण जलधारण क्षमता में भी अपेक्षित वृद्धि होती है।
12. हरी खाद के उपयोग करने से रासायनिक उर्वरक के बढ़ते होने वाले खर्च को भी कम किया जा सकता है।
13. मुख्य फसल के सहयोगी के रूप में यह अन्य साधनों के लिए मुख्य फसल से प्रतियोगिता नहीं करती है।
हरी खाद उगाने की विधि
सिंचित अवस्थाओं में मानसून आने के 35-45 दिन पूर्व या असिंचित अवस्था में मानसून आने के तुरंत बाद खेत की हल्की जुताई करके हरी खाद की फसल बो देना चाहिए। हरी खाद बोने के समय 15-20 कि.ग्रा./हे. नत्रजन तथा 40-50 कि.ग्रा./हे. फास्फोरस देना चाहिए। हरी खाद के लिए फसल की बुवाई करते समय खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है। यदि बरसात न हो तो 15 दिन के अन्तराल पर एक या दो सिंचाई कर देनी चाहिए जिससे फसल की बढ़वार अच्छी हो तथा फसल के वानस्पतिक भाग मुलायम बने रहें।
फसल को खेत में मिलाते समय यह ध्यान रखें कि फसल कुछ अपरिपक्व अवस्था में हो तथा फूल निकलना प्रारम्भ हो गये हों। इस अवस्था में वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है तथा पौधों की शाखायें व पत्तियां मुलायम होती हैं व फसल का कार्बन नाइट्रोजन अनुपात भी कम होता है। सनई की फसल में 50-55 दिन बाद एवं ढैंचा की फसल में 45 दिन बाद यह अवस्था आती है। फसल को पलटने के लिए मिट्टी पलटने वाले हल या रोटावेटर से पलटकर फसल को मृदा में अच्छी प्रकार मिला देना चाहिए। इसके बाद खेत में 5-10 दिन तक 4-5 सें.मी. पानी भरा रहना चाहिए जिससे पौधों का अपघटन तेजी से हो सकें।
प्रमुख हरी खाद फसलें, बुवाई का समय, उनकी उत्पादन क्षमता तथा उनमें उपलब्ध जैविक पदार्थों की मात्राः
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फसल |
बुवाई का समय |
बीजदर (कि.ग्रा./हे.) |
हरे पदार्थ की मात्रा (टन/हे.) |
पोषक तत्वों की मात्रा (कि.ग्रा./हे. में) |
प्राप्त नाइट्रोजन (कि.ग्रा./हे) |
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नत्रजन |
फास्फोरस |
पोटाश |
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ढँचा |
अप्रैल-मई |
70-80 |
20-25 |
90-120 |
12-12 |
8-10 |
80-100 |
|
सनई |
अप्रैल-मई |
80-100 |
20-30 |
75-100 |
12-15 |
5-8 |
80-120 |
|
लोबिया |
अप्रैल-जुलाई |
45-50 |
10-15 |
75-90 |
15-18 |
5-8 |
70-80 |
|
ग्वार |
अप्रैल-जुलाई |
30-35 |
8-10 |
60-70 |
60-80 |
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|
मूंग |
जून-जुलाई |
20-25 |
8-10 |
40-50 |
18-20 |
5-10 |
40-50 |
हरी खाद की गुणवत्ता बढ़ाने के उपाय
1. उपयुक्त फसल का चयन: जलवायु एवं मृदा की दशा के अनुसार फसल का चयन करना आवश्यक है। जलमग्न तथा क्षारीय एवं लवणीय मृदाओं में ऊँचा तथा सामान्य मृदाओं में सनई व ढँचा दोनों फसलों से अच्छी हरी खाद प्राप्त की जा सकती है।
2. समुचित उर्वरक प्रबन्धनरूकम उर्वरता वाली मृदाओं में नत्रजन उर्वरकों का 15-20 कि.ग्रा. एवं फास्फोरस 40-50 कि.ग्रा./हे. प्रयोग कर अच्छी हरी खाद प्राप्त की जा सकती है।3. हरी खाद को खेत में पलटने का उपयुक्त समयः अधिक व गुणवत्तायुक्त हरी खाद प्राप्त करने के लिए फसल की पलटाई या जुताई, बुवाई के 40-50 दिन के भीतर कर देनी चाहिए इससे अधिक अवस्था पर पौधों की शाखाओं में रेशे की मात्रा बढ़ जाती है। इसके फलस्वरूप जैविक पदार्थों के अपघटन में अधिक समय लगता है।
4. हरी खाद के प्रयोग के बाद अगली फसल की बुवाई या रोपाई का समयः हरी खाद को खेत में पलटने के 15-20 दिन बाद खेत में अगली फसल की बुवाई करनी चाहिए। जिन क्षेत्रों में धान की फसल बोई या रोपी जाती है, वहां जलवायु नम तथा तापमान अधिक होने से अपघटन क्रिया तेज होती है। अतः खेत में हरी खाद की फसल 40-45 दिन से अधिक की नहीं होनी चाहिए।
हरी खाद के रूप में ढैंचा
- ढैंचा जल जमाव वाले क्षेत्रों, लवणीय, ऊसर, एवं क्षारीय भूमि के लिए सर्वोत्तम हरी खाद है। एक बार उगने के बाद सूखा को भी लम्बे समय तक सहन करने की इसमें क्षमता है।
- ऊसर भूमि में ढैंचा को 4-5 साल लगातार लगाया जाए तो सारा लवण घुलकर मिट्टी के नीचे चले जाते है और वह मिट्टी फसल लगाने योग्य हो जाती है।
- अन्य हरी खाद की तुलना में ढैंचा की फसल अधिक कार्बनिक अम्ल पैदा करती है, जिसके कारण ऊसर, लवणीय एवं क्षारीय भूमि को सुधार कर उपजाऊ बनाती है।
- धान की खेती से पहले ढैंचा की हरी खाद के रूप में प्रयोग अति उत्तम पाया गया है।
- ढैंचा बुआई की 55 दिनों के बाद अच्छी बढ़वार होने पर लगभग 25-30 टन हरी खाद प्रति हेक्टेयर पैदा करती है, जो अन्य हरी खादों से बहुत अधिक है।
- गेहूँ की कटाई के तुरंत बाद खेत की जुताई कर ढैंचा की बुवाई की जाती है।
- बुवाई मई के पहले पखवाड़े में कर लेनी चाहिए, जिससे इसे जून के अंत तक जमींन में मिलाने के बाद धान की रोपाई की जा सके।
- ढैंचा को जमीन में मिलाने के बाद पर्याप्त पानी मिलने पर यह लगभग 15 दिनों में सड़ जाता है और खेत रोपाई के लिए तैयार हो जाता है।
हरी खाद को मिट्टी में मिलाने की विधिः
हरी खाद की फसल को मिटटी पलट हल या रोटावेटर की सहायता से मिटटी में काटकर मिला देना चाहिए।
मिट्टी में हरी खाद पलटने का समय
- हरी खाद का इस्तेमाल तभी सफल हो पाता है जब उसे सही समय पर मिट्टी में पलटा जाए एवं उसके बाद भूमि में लगने वाली फसल की बुवाई एवं हरी खाद की पलटाई के बीच का अंतर पर्याप्त हो। फसल को सही समय पर मिटटी में मिलाना चाहिए जिससे अगली फसल की बुवाई के पहले हरी खाद पूरी तरह अपघटित हो जाए।
- मिट्टी में पलटने के बाद उसके अपघटन के लिए पर्याप्त समय देने की जरूरत है। यह समय फसलों के प्रकार एवं सस्य कियाओं के अनुसार बदलता है।
मिट्टी में पलटने की दशा
- दलहनी फसलों की जड़ों में जब ग्रंथियों का निर्माण पूर्णरूपेण हो जाता है, इस दशा में फसल को पलट कर मिट्टी में मिला देना चाहिए।
- उड़द तथा मूँग में फलियों की तुड़ाई के पश्चात् फसलों की जुताई कर मिट्टी में मिलाया जा सकता है वैसे सामान्यतः 40 से 50 दिनों की अवस्था हो जाने पर मिट्टी पलट हल से मिट्टी में मिलाकर खेत को पानी से भर देना चाहिए।
- अधिक दिनों की फसल हो जाने पर इसका रेशा कड़ा हो जाने से इनके अपघटन की क्रिया सुचारू रूप से नहीं हो पाती। इसलिए जब रेशा मुलायम हो, उसी अवस्था में फसल की जुताई कर पलटना उचित रहता है।
- बहुत छोटी अवस्था में भी फसल को मिटटी में नही मिलाना चाहिए। इससे पर्याप्त कार्बनिक पदार्थ नही मिलता, साथ ही साथ पोषक तत्व भी अगली फसल को प्राप्त नही होते।
- फसल को मिट्टी में पलटने के पश्चात् उसमें चाहे तो धान की रोपाई भी की जा सकती है। ऐसे करने से खेत में अलग से पानी भरने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। हमें ऐसा करने से दोहरा लाभ भी मिल जाता है तथा जब धान में नत्रजन की पूर्ति करने हेतु यूरिया का छिड़काव किया जा सकता है, उस क्रिया से हरी खाद की फसल के अपघटन में सहयोग मिलता है।
इस प्रकार हरी खाद वर्तमान समय में एक संजीवनी से कम नहीं है जिसको उगाने के लिए बहुत अधिक श्रम नही लगता तथा फसलोत्पादन को बढाया जा सकता है। साथ ही साथ भूमि की उर्वरा शक्ति में भी सुधार होता है तथा कृषि में अधिक मुनाफा होता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
