
नदियों की रक्षा करने का कार्य अभी भी पूर्ण नहीं Publish Date : 15/03/2026
नदियों की रक्षा करने का कार्य अभी भी पूर्ण नहीं
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं अन्य
14 मार्च को प्रतिवर्ष नदियों के हित के लिए अन्तरराष्ट्रीय कार्यवाई दिवस के रूप में मनाया जाता है। हम सभी जानते हैं कि नदियाँ केवल एक जलधारा मात्र ही नहीं होती हैं, बल्कि यह मानव सभ्यता की आवश्यक जीवन रेखा भी हैं। दुनिया की समस्त प्रचान सभ्यताएं नदियों के किनारों पर ही विकसित हुई हैं।

भारत में गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियाँ केवल एक जल का स्रोत ही नहीं, अपितु यह नदियाँ हिमारी संस्कृति, आस्था, कृषि एवं अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार भी हैं।
वर्तमान समय में निरंतर बढ़ते प्रदूषण, अनियंत्रित औद्योगीकरण, अवैध खनन, अतिक्रमण और सबसे महत्वपूर्ण जलवायु परिवर्तन के चलते नदियों का अस्तित्व भी गम्भीर संकट के दौर से गुजर रहा है। नदियों की इसी अवस्था को वैश्विक स्तर पर सामने लाने और नदियों के संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता को बढ़ाने के लिए ही प्रतिवर्ष 14 मार्च को अन्तरराष्ट्रीय कार्यवाई दिवस के रूप में मनाया जाता है।
वर्ष 2026 के लिए इस दिन की थीम ‘नदियों की सुरक्षा, लोगों की सुरक्षा’ निर्धारित की गई है, जो कि यह स्पष्ट करती है कि हमारी नदियों का स्वास्थ्य स्पष्ट रूप से मानव जीवन, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण के संतुलन और अर्थव्यवस्था के साथ अभिन्न रूप से सम्बन्धित होता है।
वर्तमान समय में नदियों के सामने सबसे बड़ा संकट प्रदूषण का है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की लगभग 80 प्रतिशत नदियाँ किसी न किसी रूप में प्रदूषित हो चुकी हैं और भारत में तो यह स्थिति कहीं अधिक चिंताजनक है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के बनुसार, देश में 300 से अधिक नदियों के विभिन्न भागों में जल की गुणवत्ता मानकों से काफी नीचे तक गिर चुकी है। शहरी क्षेत्रों का असंशोधित सीवेज, औद्योगिक इकाईयों से निकलने वाने रसायन, प्लास्टिक का कचरा और कृषि में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक आदि नदियों को निरंतर प्रदूषित कर रहें हैं।
भारत में लगभग 60 प्रतिशत सिंचाई और लोगों के पेयजल आदि कार्यों की पूर्ती नदियों के जल से ही पूरी होती हैं, इसलिए नदियों का संरक्षण करना केवल एक पर्यावरण से सम्बन्धित मुद्दा ही नहीं है, बल्कि यह विकास एवं अस्तित्व का प्रश्न भी बन चुका है।
इस प्रकार से अब समय आ चुका है कि नहदयों को पुनर्जीवित करने के सामुहिक प्रयासों को हमें अपने जीवन में स्थान प्रदान करना चाहिए। इसके लिएनदियों के आस-पास होने वाले अतिक्रमण को हटाया जाना चाहिए, औैद्योगिक एवं घरेलू अपशिष्टों को बिना शोधन किए नदियों में प्रवाहित करने पर कठोर दंड़ कर व्यवस्था की जानी चाहिए और समाज में जल संरक्षण की संस्कृति को मजबूती प्रदान की जानी चाहिए।
यह अपने आप में एक स्थापित सत्य है कि जब तक नदियों को एक जीवित इकाई मानकर उनका सम्मान नहीं किया जाएगा तब तक उनका संरक्षण भी सम्भव नहीं हो पाएगा। नदियों के हित में मनाया जाने वाला ‘नदियों के लिए अन्तरराष्ट्रीय कार्यवाई दिवस’ संदेश देता है कि यदि मानव जाति को एक सुरक्षित भविष्य चाहिए तो नदियों की सुरक्षा करना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है, क्योंकि नदियों की सुरक्षा ही मानवता की सुरक्षा है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
