सतत कृषि विकास की दिशा में पहल      Publish Date : 01/03/2026

      सतत कृषि विकास की दिशा में पहल

                                                                                    प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

कृषि को 'पर्यावरण अनुकूल' बनाने के लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा लगातार कोशिशें की जा रही हैं। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और कृषि पर बदलती जलवायु के प्रभावों को कम करने के लिए तकनीकी विकसित कर किसानों को सतत खेती से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन अभी भी बहुत से किसानों को सतत खेती के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। ऐसे में किसानों को पर्यावरण अनुकूल नई कृषि तकनीक और खेती के नए तरीके अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

रत में कृषि क्षेत्र आज बदलाव की राह पर है। हरितक्रांति के दौर में कृषि क्षेत्र में हम आधुनिक कृषि तकनीक, उच्च उत्पादकता वाले बीजों तथा उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के साक्षी रहे हैं। परंतु अब खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि की ओर बढ़ती वैश्विक जागरूकता के दौर में भारतीय कृषि क्षेत्र के भविष्य को पुनः परिभाषित करने की आवष्यकता है।

ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद के एक अध्ययन के अनुसार भारत में 5 प्रतिशत से भी कम किसान सतत कृषि पद्धतियों का उपयोग कर रहे है। भारत में जलवायु से प्रभावित कृषि तथा नागरिकों हेतु खाद्य व पोषण के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सतत कृषि को बढ़ावा देना अवश्यंभावी हो गया है। जिस प्रकार वैश्विक जनसंख्या बढ़ती जा रही है और प्राकृतिक संसाधनों में निरंतर कमी आती जा रही है, धरती की सुरक्षा के लिए सतत कृषि का महत्व एक मजबूत विकल्प के रूप में सामने आ रहा है।

कृषि के बेहतर और सतत मॉडल से जुड़ी मौजूदा चुनौतियों का जमीनी स्तर पर समाधान करने के लिए, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और तकनीक की मदद से खेती को बेहतर बनाने की दिशा में काम करने की जरूरत है। पर्यावरण संरक्षण और समावेशी विकास को प्राप्त करने के लिए कृषि से संबंधित गतिविधियों को निकटता से सतत विकास लक्ष्यों के साथ जोड़ना होगा। कृषि में समग्र, सतत व समावेशी विकास प्राप्त करने के लिए किसानोंजैसे सेवाओं और विनिर्माण में विकास हुआ है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय का अनुमान है कि कृषि और संबंधित क्षेत्रों का जीवीए 2020-21 में 20.2% था जो 2021-22 में घटकर 19.8% हुआ और 2022-23 में फिर से घटकर 18.3% हो गया।

हाल के वर्षों में आर्थिक शक्ति के समीकरणों में बदलाव आया है और 'ब्रिक' देशों ब्राजील, रूस भारत और चीन की बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं केंद्र में आ गई है। 'ब्रिक' देशों की जीडीपी विकास दर संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी जैसी पारंपरिक रूप से मजबूत अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक है। संयुक्त राज्य अमेरिका की अर्थव्यवस्था किसी भी मापदंड से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में चीन की दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। तीसरे स्थान के लिए भारत जापान से होड़ में है। 2008 और 2009 में वैश्विक मंदी के बावजूद भारत सकल घरेलू उत्पाद की प्रभावशाली विकास दर को बनाए रखने में कामयाब रहा विशेष रूप से यह देखते हुए कि दुनिया के अधिकांश देश कम से कम एक वर्ष नकारात्मक वृद्धि के दौर से गुजरे।

हालांकि भारत के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान समय के साथ कम हुआ है, यह फिर भी अर्थव्यवस्था का एक अनिवार्य क्षेत्र बना हुआ है विशेष रूप से रोजगार और आजीविका को मद्देनजर रखते हुए। कृषि क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-एनएएम) प्लेटफॉर्म सहित कई पहले शुरू की गई है। इन पहलों का उद्देश्य भारत में किसान की उत्पादकता में वृद्धि लाना, जोखिम को कम करना और आय में वृद्धि करना है। सर्वेक्षण के अनुसार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) एक ऐतिहासिक पहल है जो किसानों को देश भर में न्यूनतम एक समान किस्त पर व्यापक जोखिम समाधान प्रदान करती है। साल-दर-साल पीएमएफबीवाई में किसानों से लगभग 5.5 करोड़ आवेदन प्राप्त होते हैंएक विकासशील देश के रूप में वैश्विक स्तर पर सतत कृषि के लिए भारत महत्वपूर्ण है। कृषि भारत की 58% से अधिक आबादी के लिए जीवनयापन का जरिया प्रदान करती है। देश ने कृषि उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण प्रगति की है लेकिन सतत कृषि पद्धतियों को अमल में लाने के लिए और अधिक प्रयत्न करना बाकी है। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और गहन कृषि पद्धतियों के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी की उर्वरता मे गिरावट भारतीय किसानों के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है।

भारत में सतत कृषि पद्धतियों को अपनाना कृषि क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। भारत सरकार और विभिन्न संगठनों ने सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए कई पहले शुरू की है। उदाहरण के लिए सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना को कृषि पद्धतियों में सुधार करने और किसानों को वित्तीय सहायता देने के लिए शुरू किया।

सतत कृषि विकास को अपनाने में आने वाली बाधाएं

भारत में कृषि क्षेत्र की दीर्घकालिक लाभप्रदता के लिए सतत कृषि विकास पद्धतियों को अपनाना महत्वपूर्ण है। देश में सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने में आने वाली कई कमियों को चिह्नित किया गया है। कुछ अहम बाधाएं निम्नलिखित है।

1. जागरूकता और जानकारी का अभाव सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने में आने वाली मुख्य बाधाओं में से एक है किसानों में जागरूकता और जानकारी का अभाव। किसानों को सतत कृषि पद्धतियों के लाभों या उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने के तरीके की जानकारी होनी चाहिए।

2. वित्त तक सीमित पहुँच सतत कृषि पद्धतियों के लिए अक्सर महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी निवेश की आवश्यकता होती है लेकिन कई छोटे और सीमांत किसानों को इन निवेशों के लिए वित्त तक अधिक पहुँच की आवश्यकता है।

3. अपर्याप्त नीति और नियामक ढांचा सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने में भारत की नीति हमेशा मददगार नहीं होती है और नियामक व्यवस्था हमेशा सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने की पक्षधर नहीं होती है। उदाहरण के लिए किसानों को सतत पद्धतियों को अपनाने के लिए अधिक प्रोत्साहन की आवश्यकता हो सकती है या विनियम कुछ सतत पद्धतियों को प्रतिबंधित कर सकते हैं। सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन को कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के बजट का केवल 0.8% प्राप्त होता है जो सतत कृषि को और अधिक प्रोत्साहन देने के महत्वपूर्ण मिशन में लगा हुआ है।

4. सीमित अनुसंधान और विकास सतत कृषि पद्धतियों में और अधिक अनुसंधान एवं विकास की आवश्यकता है जो भारतीय परिवेश के लिए उपयुक्त हों। किसानों को इन पद्धतियों को अपनाने में मदद करने के लिए अनुसंधान परिणामों के प्रसारऔर विस्तार सेवाओं को विकसित करने में अधिक निवेश की भी आवश्यकता है।

5. बुनियादी ढांचे और तकनीकी सहायता का अभाव सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए अक्सर विशेष बुनियादी ढांचे और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होती है। खासकर दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में अनेक किसानों को इन संसाधनों तक पहुँच की जरूरत है।

6. कम उत्पादकता भारत में कृषि कम उत्पादकता से जानी जाती है जो इसकी वृद्धि और विकास में एक बड़ी बाधा है। भारत में अधिकांश फसलों के लिए प्रति हेक्टेयर उपज वैश्विक औसत से काफी कम है और इसके कई कारण है जैसे मशीनीकरण का निम्न स्तर, अपर्याप्त सिंचाई सुविधाएं और मिट्टी की खराब स्थिति।

7. खंडित भूमि जोत भारत में औसत जोत का आकार छोटा है जिसके कारण किसानों के लिए आधुनिक कृषि तकनीकों और प्रौद्योगिकियों को अपनाना मुश्किल हो जाता है। खंडित भूमि जोत भी किसानों के लिए ऋण और अन्य सहायता सेवाओं तक पहुँच को कठिन बनाते हैं।

8. बाजार तक पहुँच की कमी भारत में छोटे और सीमांत किसानों के लिए बाजारों तक पहुँच की कमी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। कई किसानों को अपनी उपज बिचौलियों को कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर किया जाता है, क्योंकि वे सीधे बाजारों तक नहीं पहुँच पाते हैं। परिणामस्वरूप किसानों की आय कम होती है और उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों की अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।

9. अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा जैसे कि ग्रामीण सड़कें, भंडारण सुविधाएं और कोल्डचेन भारत में कृषि क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है। इनमें कमियों के कारण किसानों के लिए अपनी उपज को बाजारों तक ले जाना, सुरक्षित ढंग से भंडारण करना और बाद में बेचना मुश्किल हो जाता है।

10. जलवायु परिवर्तन जलवायु परिवर्तन भारत में कृषि क्षेत्र के लिए विशेष रूप से जल की उपलब्धता, कीट और रोग प्रबंधन और फसल की पैदावार के परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण चुनौतियां उत्पन्न करता है। मौसम के बदलते स्वरूप जैसे अनियमित वर्षा और बढ़ता तापमान फसल की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं और किसानों में असुरक्षा का भाव पैदा करते हैं।

महिलाए विशेष रूप से संवेदनशील होती है। स्थिरता और अनुकूलन के लिए वैश्विक खाद्य सुरक्षा सूचकांक (जीएफएसआई) की गणना लैंगिक असमानता बढ़ने पर घटती है। जीएफएसआई दर्शाता है कि ताजा, स्वच्छ जल और भूमि संसाधनों तक पहुँच की कमी और अनुकूलन और सतत कृषि पद्धतियों के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता की कमी आदि सभी लैंगिक असमानता से संबद्ध कारक है। भारत के कृषि क्षेत्र में अन्य अनेक कमियांसक्षम और स्थिर कृषि क्षेत्र विकसित करने के मार्ग में गम्भीर बाधाएं हैं। इन कमियों के निवारण के लिए एक बहुमुखी दृष्टिकोण आवश्यक है जिसके अंतर्गत अनुसंधान एवं विकास, विनियामक और नीतिगत सुधारों में निवेश की आवश्यकता होगी और सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने को बढ़ावा देने के लिए बुनियादी ढांचे और विस्तार सेवाओं का सृजन करना होगा। भारत सरकार ने परम्परागत कृषि विकास योजना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-एनएएम) प्लेटफॉर्म सहित कई कार्यक्रम सतत कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहन देने के लिए शुरू किए हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।