
वेस्ट यूपी को शुगर बाउल बनाने के लिये करनी होगी और कड़ी मेहनत Publish Date : 01/02/2026
वेस्ट यूपी को शुगर बाउल बनाने के लिये करनी होगी और कड़ी मेहनत
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
वेस्ट यूपी में गन्ने की मिठास को और बढ़ाने के लिए कृषि वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। लक्ष्य सिर्फ गन्ने की मिठास बढ़ाना ही नहीं ऐसी प्रजाति भी विकसित करना है कि जिनमें रोग कम से कम लगे और प्रतिकूल मौसम का प्रजाति पर कोई असर नहीं पड़े। सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय ने टिशू कल्चर लैब में गन्ने की प्रजातियों को विकसित करने का काम शुरू कर दिया है।
शोध के लिए वैज्ञानिकों ने वेस्ट यूपी में प्रचलित गन्ने की प्रजारियों के अलावा कुछ बाहरी प्रजातियों का भी चयन किया है। जो बिंदु शामिल किए गए हैं. एक गन्ने की मिठास बढ़ाने के अलावा विभिन्न कारणों से लगी वाले रोगों की रोकथाम भी शामिल है।
वैज्ञानिकों का मानना है यदि प्रयोग सफल रहा तो किसानों तक जो प्रजाति पहुंचेगी यह रोग रहित होगी। छोटे मोटे रोग, प्रजाति के आसपास भी नहीं भटकेंगे। बायोटेक कॉलेज में बनी टिशू कल्चर लैब प्रभारी और शोध में जुटे डा० आर०एस० सेंगर ने बताया कि तमिलनाडु की तरह यदि हम गन्ना उत्पादन करें तो काफी लाभ हो सकता है। तमिलनाडु में प्रति हेक्टेयर गन्ना उत्पादक 104.2 टन है, जो यू०पी० औसतन 61.9 टन है। जबकि पश्चिमी यू०पी० में 65 टन प्रति हेक्टेयर है। कोयम्बटूर क्षेत्र में पूरे वर्ष गन्ने की फसल होती है और चीनी मिलें चलती हैं। देखने में यह आया है कि वहां पर गन्ने की लम्बाई तो पश्चिमी यू०पी० से कम है लेकिन मोटाई लगभग दो गुना होती है। यह प्रजाति पर निर्भर करता है कि उसकी मोटाई कितनी हो। यहाँ के 90 प्रतिशत किसान वैज्ञानिक पद्धति से गन्ने की खेती करते हैं और संख्या के हिसाब से प्लांटेशन में होने वाले गैप को पूरा करते हैं। पश्चिमी 3.5 में गैप को पूरा करने पर ध्यान नहीं दिया जाता है इसके लिये किसानों को चाहिये कि वे पॉलीबैग में गन्ने की पौध उगाकर रख लें जहाँ पर गैप रहा जाता है वहाँ पर तुरन्त रोपाई करें जिससे उत्पादन अच्छा होगा।
यू०पी० में अक्सर पेडी प्रबंधन का अभाव देखा गया है यहाँ पर गन्ने के पौधों में 60-75 सेंमी. का अन्तर होता है लेकिन नमिलनाडु में यह अंतर 90 सेंमी. होता है वहाँ का तापमान हमेशा 21 से 35 डिग्री सेल्सियस होता है जो गन्ने की फसल से लिये अनुकूल है। वहाँ पर किसान बीज बंधन पोषक तत्व प्रबंधन, सिंचाई एवं कीडों एवं बीमारियों पर विशेष ध्यान देता है लेकिन यहाँ पर बिना मुद्रा परीक्षण के ही लगातार खेती करता रहता है।
क्या है टिशू कल्चर
इस विधि में पौधे के भाग से उत्तक लेकर प्रयोगशाला में संर्वधन किया जाता है जिससे नये पौधे बनते हैं गही विधि टिशू कल्चर विधि कहलाती है। इस तकनीक से उन पौधों को बनाने में फायदा होता है जिनके बीज आसानी से नहीं मिलते हैं। इसके लिये एक स्वस्थ सीधे को लेकर इससे रोग रहित कई पौधे एक ही वर्ष में बनाये जा सकते हैं। महाराष्ट्र तथा गुजरात में टिशू कल्चर विधि से पौधों के विकास का कार्य काफी तेजी से हो रहा है। अभी तक वैज्ञानिकों ने अनेक फसलों एवं उधानकीय एवं वानकीय क्षेत्र में काफी सफलता हासिल की है।
टिशू कल्चर के फायदे
- टिशू कल्चर के पौधे पैतृक गुणों के होते हैं।
- इसके छोटे भाग से लाखों पौधे तैयार हो जाते हैं।
- प्रजातियों विभिन्न बीज को तुरन्त गति से काफी मात्रा में बनाया जा सकता है।
- एक समान प्रकार के गन्ने पैदा होते हैं।
- शुरू से ही अंकुरण और बढ़वार अच्छी होती है।
- विकसित पौधों में रोग की सम्भावना कम होती है।
- इनको लगाना कारगर होता है तथा रोग भी कम लगता है।
- उत्पादन प्रति हेक्टेयर अच्छा होता है।
कुल क्षेत्रफल – 2.16 मिलियन हेक्टेयर
कुल उत्पादन – 173.7 मिलियन टन
प्रति हेक्टेयर उत्पादकता – 61.92 टन/हेक्टेयर
कुल चीनी उत्पादन – 4.95 मिलियन टन (70.39 लाख टन)
कुल उत्पादन मूल्य – 348.6 मिलियन

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
