
गन्ना किसान और उसकी समस्याएं Publish Date : 25/01/2026
गन्ना किसान और उसकी समस्याएं
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
गन्ना देश की उन प्रमुख फसलों में से एक है, जिसे केवल एक कृषि उत्पाद मानना उसकी वास्तविकता के साथ अन्याय होगा। यह फसल किसान की साल-भर चलने वाली मेहनत, पूँजी निवेश, श्रम प्रबंधन और धैर्य आदि की परीक्षा होती है। विडंबना यह है कि जिस गन्ने से चीनी उद्योग, मिलें और सरकारी खजाना चलता है, वही गन्ना, आज किसान के लिए घाटे और निराशा का प्रतीक बनता जा रहा है।
गन्ने की खेती किसी एक मौसम तक सीमित नहीं रहने वाली नहीं है। इसकी बुवाई से लेकर कटाई और मिल तक आपूर्ति तक किसान को ट्रैक्टर, डीज़ल, बीज, खाद, दवाइयाँ, स्प्रे मशीनें, सिंचाई के साधन और सबसे महत्वपूर्ण शारीरिक रूप से स्वस्थ मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है। छिलाई और लोडिंग जैसे कार्य केवल वही मजदूर कर सकते हैं जो शारीरिक रूप से इस कार्य के लिए सक्षम हों। ऐसे में यह स्पष्ट है कि गन्ने की खेती में लागत और श्रम दोनों ही निरंतर बढ़ते रहते हैं।
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। सरकार, गन्ना मिलें, गन्ना सोसायटियाँ, गन्ना अनुसन्धान केंद्र और स्वयं गन्ना मंत्री भी इस वास्तविकता से भली-भांति परिचित हैं। इसके बावजूद नीति और व्यवहार के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

प्राकृतिक आपदाएँ और जंगली जानवरों का नुकसान गन्ना किसान की समस्या को और गहरा करता है। आंधी, बारिश, पाला, सूखा और छुट्टा पशुओं व वन्य जीवों से होने वाली क्षति का सीधा और पूरा बोझ किसान ही उठाना पड़ता है। इन नुकसानों की भरपाई के लिए किसान को न तो समय पर मुआवज़ा मिल पाता है और न ही कोई प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था दिखाई देती है।
सबसे गंभीर प्रश्न गन्ने के मूल्य निर्धारण का है। गन्ने का समर्थन मूल्य सरकार तय करती है, लेकिन किसान को गन्ने का मूल्य उसकी लागत के अनुरूप नहीं मिल पाता है। खाद, बीज, डीज़ल, मजदूरी और दवाइयों की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं, जबकि गन्ने का मूल्य उसके अनुपात में नहीं बढ़ता है। परिणामस्वरूप किसान के लिए आय और खर्च के बीच का अंतर असहनीय हो गया है।
इस संकट को और भयावह बनाता है गन्ने का समय पर भुगतान न होना। मिलें गन्ना तो ले लेती हैं, लेकिन भुगतान महीनों तक अटका रहता है। किसान को मजदूरी, उधारी, पारिवारिक खर्च और अगली फसल की तैयारी के लिए तत्काल धन चाहिए होता है, लेकिन भुगतान में देरी उसकी आर्थिक रीढ़ को तोड़कर रख देती है। आज स्थिति यह है कि किसान के पास न पर्याप्त मजदूर बचे हैं, न पूँजी और न ही संसाधन।

गन्ना अनुसन्धान संस्थानों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जिन संस्थानों से उन्नत, रोग-रोधी और अधिक उत्पादन देने वाले बीजों की उम्मीद थी, वे अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। बार-बार असफल किस्मों का प्रयोग किसान को और अधिक नुकसान में धकेल रहा है।
इन सभी कारणों से गन्ना किसान का गन्ने की खेती से मोहभंग होना स्वाभाविक ही है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में किसान अब गन्ने से हटकर सरसों, गेहूं, धान, पॉपुलर और यूकेलिप्टस जैसी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ लागत कम है, जोखिम भी अपेक्षाकृत कम ही होता है और इनका भुगतान भी किसान को समय पर मिल जाता है।
उपरोक्त को देखते हुए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि नीतिगत असंतुलन, भुगतान व्यवस्था की विफलता और अनुसन्धान की कमजोरी ने मिलकर आज गन्ना किसान को गहरे संकट में डाल दिया है। जिस फसल को कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता था, वही आज किसान के लिए बोझ बनती जा रही है। अब ऐसे में गन्ना किसान करे भी तो क्या करें।
यदि समय रहते सरकार, मिलें और अनुसन्धान संस्थान मिलकर कोई ठोस कदम नहीं उठाते, तो गन्ने का रकबा और किसान दोनों ही लगातार कम होते चले जाएंगे। तब प्रश्न केवल गन्ना उत्पादन का नहीं रहेगा, बल्कि उस किसान के अस्तित्व का होगा, जो वर्षों से देश की मिठास का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है।
आज गन्ना किसान इस निष्कर्ष पर पहुँच चुका है कि व्यवस्था से उसे बहुत कम उम्मीद है। ऐसे में सच यही है कि गन्ना किसान को अब केवल भगवान के सहारे छोड़ दिया गया है और यह किसी भी सभ्य समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। अतः हमारे नीति निर्माताओं को चाहिए कि वह इस ओर शीघ्र अति शीघ्र ध्यान दें जिससे कि गन्ना एवं उसके किसनों के अस्तित्व को बचाए रखा जा सके।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
