गेहूं खरीद का गोरखधंधा      Publish Date : 07/01/2026

                          गेहूं खरीद का गोरखधंधा

                                                                                                                                                           प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

बहुत जल्द गेहूं खरीद में गड़बड़ी उजागर होने के आसार हैं। केंद्र ने एक टीम बनाई है, जिसमें खाद्य मंत्रालय, गृह मंत्रालय और भारतीय खाद्य निगम के अधिकारी शामिल हैं। यह टीम पता लगाएगी कि आखिर क्या वजह हुई कि गेहूं की जबरदस्त पैदावार के बावजूद केंद्रीय भंडार में गेहूं नहीं आया और यह कहां चला गया? राज्य सरकारों को जो मंडी शुल्क या बिक्री कर मिलना था वह क्यों नहीं मिला? इस गेहूं को मंडियों में लाए बिना चोरी से बाहर ही बाहर प्राइवेट कंपनियों को बिकवा दिया गया।

इस खेल में शामिल लोगों ने प्राइवेट कंपनियों के जरिए सैकड़ों करोड़ रुपए डकार लिए और इसकी वजह से पूरे देश में गेहूं महंगा हो गया। भारत सरकार की इस टीम का नेतृत्व केंद्र सरकार के कृषि एवं खाद्य मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव विवेक मल्होत्रा कर रहे हैं।

शरद पवार पिछले एक साल से बार-बार महंगाई पर जवाब देते वक्त संसद में यह कहते रहे हैं कि गेहूं और आटे के दामों में बढ़ोतरी की वजह प्रदेश सरकारें है। उनके मुताबिक अकेले उत्तर प्रदेश से पिछले 57 साल से सबसे ज्यादा गेहूं केंद्रीय भंडार में आता था, लेकिन पिछले तीन साल के अंदर प्रदेश से न के बराबर गेहूं आया। चूंकि उत्तर प्रदेश केंद्रीय भंडार में गेहूं भेजने में अव्वल था इसलिए इस भारी कमी केंद्र सरकार पूरा न कर सका और गेहूं का संकट पैदा हो गया, जिसकी वजह से गेहूं और आटों के दामों में भारी तेजी आ गई।

                                                

पता चला है कि निजी कंपनियों को राज्य से गेहूं ले जाने का अधिकार दे दिया गया और उन्होंने यह सारा गेहूं ऊंचे दामों पर बेच दिया अथवा बिस्कुट आदि बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों के हिस्से में चला गया। दरअसल, अभी तक प्रदेश के सरकारी अधिकारी बिक्री केंद्रों, मंडियों और मंडी परिषदों के जरिए गेहूं की खरीद किसानों से करते थे। इस पर मंडी शुल्क और बिक्री कर निजी कंपनियों को देना पड़ता था जो साठ से अस्सी रुपए प्रति क्विंटल होता था।

पिछली सरकार ने इन प्राइवेट कंपनियों को सीधे किसानों से या किसानों के एजेंटों से खरीदने की इजाजत दे दी। निजी कंपनियों को मंडी शुल्क और बिक्रीकर बचाने में साठ रुपए प्रति क्विंटल का जो फायदा हुआ उसे भ्रष्ट तत्वों और कंपनियों ने बांट लिया। इस तरह हजारों करोड़ रुपए के गेहूं की खरीद उत्तर प्रदेश से करके उसे बाहर भेज दिया गया। इससे न तो राज्य को मंडी शुल्क मिला, न बिक्री कर मिला और किसान को भी ज्यादा फायदा नहीं मिला। उलटे गेहूं के दाम में बढ़ोतरी हो जाने से आम जनता को महंगा गेहूं और आटा खरीदना पड़ा।

असली फायदा हुआ इन प्राइवेट कंपनियों और बिचौलियों को हुआ। अब जब केंद्र सरकार ने इसकी जांच के लिए टीम भेजी है तो इस पूरे घोटाले का खुलासा होने की उम्मीद बढ़ गयी है। मायावती सरकार को चाहिए कि वह राज्य के अफसरों पर हुआ। सख्ती रखें ताकिं वे इस घोटाले को खोलने में केंद्र सरकार की मदद करें।

इसी तरह मायावती सरकार को इस बात की भी जांच करानी चाहिए कि गरीब गर्भवती महिलाओं और बच्चों को पौष्टिक आहार देने के लिए, पिछले तीन साल में केंद्र सरकार ने जो चौदह सौ चालीस करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश सरकार को भेजे थे उसमें से कितने का पौष्टिक आहार गरीब लोगों तक पहुंचा?

एक खबर के मुताबिक इस आंहार की आपूर्ति करने वाली प्राइवेट कंपनियों से बिचौलियों ने काफी मोटी रकम ली, जो तकरीबन छह सौ करोड़ के करीब थी। चूंकि इन कंपनियों को इतनी बड़ी रकम बिचौलियों को देनी पड़ी इसलिए बहुत कम मात्रा में आहार गरीब महिलाओं और बच्चों को दिया गया। अन्य राज्यों से इस तरह की शिकायतआंने पर सर्वाेच्च्च न्यायालय ने वहां इस योजना पर रोक लगा दी थी, मगर उत्तर प्रदेश में इस योजना पर रोक न लग सकी।

अब केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने घोषणा की है कि इस योजना की समीक्षा की जाएगी और आगे से यह बंदोबस्त किया जाएगा कि राज्य सरकारों को पैसा न दिया जाए, बल्कि सीधे गैर-सरकारी संगठनों के जरिए इस योजना को लागू किया जाए। रेणुका चौधरी यह कदम तो उठा लेंगी, लेकिन इस योजना का जो दुरुपयोग हुआ उसका क्या होगा? जिस तरह से सैकड़ों करोड़ रुपया तो राज्य सरकार को करानी चाहिए याफिर राज्य सरकार केंद्रीय जांच ब्यूरो के लिए लिख सकती है।

पौष्टिक आहार सप्लाई करने वाली कंपनियों से जबरदस्ती यह पैसा वसूला गया और जो कंपनी पैसा नहीं देती थी उसको आर्डर नहीं मिलता था। मजबूरी में इन कंपनियों को आहार की मात्रा कम करनी पड़ती थी अथवा खराब किस्म का माल भिजवाना

पड़ता था। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने तो बहुत चुस्ती से काम लेकर गेहूं घोटाले का पता लगने के लिए केंद्रीय टीम भेजदी है, अब रेणुका चौधरी को भी उसी फुर्ती से काम लेना होगा।

उत्तर प्रदेश में इस बार रिकार्ड 225 लाख टन गेहूं की पैदावार हुई है और अभी तक राज्य के मंडियों में सिर्फ साढ़े सात लाख टन गेहूं आया है, जो कि पिछले साल से भी कम है। पता चला है कि प्राइवेट कंपनियां पिछले चार महीने में तेजी से गेहूं की खरीददारी कर रही थीं, क्योंकि उन्हें सरकार बदलने की आशंका थी। पिछले साल इस अवधि में सिर्फ आठ लाख टन गेहूं मंडियों में आया था। मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद स्पष्ट शब्दों में घोषणा की है कि पिछली सरकार के दौरान जो-जो घोटाले और भ्रष्टाचार हुए थे उन सबकी जांच कराई जाएगी।

जमीन घोटालों के बारे में बच्चे-बच्च्चे को पता है कि कैसे नोएडा, ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास परिषद आदि की जमीनों को औने-पौने दामों पर बेचकर घोटाला किया गया। इन घोटालों से सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी का हुआ।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।