किसानों की नई पीढ़ी को पढ़ लिखकर, खेती किसानी में जुटी      Publish Date : 02/12/2025

    किसानों की नई पीढ़ी को पढ़ लिखकर, खेती किसानी में जुटी

                                                                                                                                                                                  प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

जनसंख्या का प्रतिशत कम करके सेवा क्षेत्र में जाना होगा, तो आइए इस विषय को और गहराई से समझते हैं। रोजगार का आदर्श वितरण सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि यह एक स्वस्थ और स्थायी अर्थव्यवस्था का निर्माण करने की एक रणनीति है। यह रणनीति भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

आदर्श वितरण: संख्या से परे का दृष्टिकोण

जब हम 15-20% कृषि, 30-35% उद्योग, और 50-55% सेवा की बात करते हैं, तो हम केवल एक गणितीय अनुपात नहीं देखते हैं। इसके पीछे कई आर्थिक और सामाजिक कारक काम करते हैं:

उत्पादकता में वृद्धि: कम लोगों के साथ भी कृषि क्षेत्र की उत्पादकता बढ़नी चाहिए। यह तभी संभव है जब हम खेती में आधुनिक तकनीक, बेहतर बीजों और मशीनों का उपयोग करें। इसका मतलब यह होगा कि जो लोग पहले कृषि में थे, वे अब अधिक उत्पादक और उच्च आय वाले क्षेत्रों में जा सकेंगे।

विनिर्माण का पुनरुद्धार: उद्योग, खासकर विनिर्माण क्षेत्र

रोजगार सृजन का एक महत्वपूर्ण इंजन होता है। यह सिर्फ उच्च शिक्षा वाले लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि कम कुशल श्रमिकों के लिए भी लाखों नौकरियां पैदा करता है। भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने के लिए इस क्षेत्र को मजबूत करना होगा।

सेवा क्षेत्र का विस्तार: सेवा क्षेत्र में न केवल IT और वित्त जैसी उच्च-कौशल वाली नौकरियां शामिल हैं, बल्कि पर्यटन, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और रिटेल जैसी नौकरियां भी हैं। एक आदर्श वितरण में, यह क्षेत्र न केवल GDP में बल्कि रोजगार में भी अपनी पूरी क्षमता से योगदान देगा।

आदर्श वितरण को प्राप्त करने के लिए व्यावहारिक योजना

यह आदर्श वितरण रातोंरात नहीं हो सकता। इसके लिए एक दीर्घकालिक और बहु-आयामी योजना की आवश्यकता है।

                                                         

1. शिक्षा और कौशल विकास पर जोर

व्यावसायिक शिक्षा: युवाओं को ऐसी शिक्षा देना जो उन्हें सीधे नौकरी के लिए तैयार करे।

पुनः-कौशल (Reskilling): जो लोग कृषि से बाहर निकल रहे हैं, उन्हें विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में काम करने के लिए नए कौशल सिखाना।

2. विनिर्माण और बुनियादी ढाँचे में निवेश

सरकारी नीतियाँ: "मेक इन इंडिया" और "आत्मनिर्भर भारत" जैसी नीतियों को और प्रभावी बनाना।

बुनियादी ढांचा: सड़क, रेल, बंदरगाह और बिजली जैसे बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाना, जिससे उद्योग आसानी से स्थापित हो सकें।

3. कृषि का आधुनिकीकरण और विविधीकरण

खाद्य प्रसंस्करण: किसानों को केवल फसल उगाने के बजाय उसे प्रसंस्कृत करने (जैसे टमाटर से सॉस बनाना) के लिए प्रोत्साहित करना। इससे किसानों की आय बढ़ेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में भी उद्योग विकसित होंगे।

प्रौद्योगिकी का उपयोग: ड्रोन, सेंसर और सटीक खेती (precision farming) जैसी तकनीकों का उपयोग करके कृषि को अधिक कुशल बनाना।

4. उद्यमिता और स्टार्टअप को बढ़ावा

सरल नीतियाँ: नए व्यवसाय शुरू करने के लिए नियमों को सरल बनाना।

वित्तीय सहायता: स्टार्टअप्स और छोटे व्यवसायों को कम ब्याज पर ऋण और अन्य वित्तीय सहायता प्रदान करना।

यह आदर्श वितरण भारत को एक संतुलित और मजबूत अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा, जहाँ हर क्षेत्र अपनी पूरी क्षमता से काम कर सके और हर नागरिक के लिए बेहतर अवसर हों।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।