
गन्ने की फसल वृद्धि के लिए राइजोबैक्टीरिया का उपयोग Publish Date : 30/11/2025
गन्ने की फसल वृद्धि के लिए राइजोबैक्टीरिया का उपयोग
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
गन्ना दुनिया के कई देशों के लिए एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक एवं नकदी फसल है। चीनी उत्पादन के अलावा गन्ना अन्य कई उत्पादन करता है जैसे इथेनाल, खोई, प्रेस मड, गुड़ तथा अन्य आवश्यक वस्तुएं। पीजीपीआर का उपयोग रासायनिक उर्वरकों कीटनाशकों ओर शाकनाशियों के निरंतर उपयोग से होने वाले नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने का एक सम्भावित तरीका है। मिट्टी में लगातार रसायनिक उर्वरकों के उपयोग ने पर्यावरण को प्रदूषित करने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी घटाया है। इन रसायनिक उर्वरकों के प्रभाव से मिट्टी को उर्वरता प्रदान करने वाले सूक्ष्म जीवों की संख्या में अत्यधिक कमी हो जाती है।
मृदा में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणु राइजोबियम, एजेटोबैक्टर, एजोस्पाइरलम, फास्फेट व पोटाश घुलनशील जीवाणु आदि। पौधों की जड़ों की मिट्टी में जीवाणु मुक्त अवस्था में पाए जाने वाले, जो पौधों के विकास पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं, उन्हें पौध विकास को बढ़ावा देने वाले जीवाणु कहते हैं। राइजोबैक्टीरिया स्वाभाविक रूप से मिट्टी में पाये जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु हैं, जो पादप जड़ों में निवास करते हैं। ये सूक्ष्मजीव मिट्टी में बड़े पैमाने पर जैव रासायनिक परिवर्तन करते हैं। जो मिट्टी की उर्वरकता का निर्धारण करते हैं।
राइजोबैक्टीरिया पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं और फास्फेट को घोलने, हार्मोंस का उत्पादन करने और नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने के लिए अपने स्वयं के उपापचय (मेटाबॉलिज्म) का उपयोग कर सकते हैं, और वे सीधे पौधे के उपापचय (मेटाबॉलिज्म) को प्रभावित कर सकते है। पीजीपीआर पौधे में पानी और पोषक तत्वों के अवशोषण को भी बढ़ाते हैं। जड़ विकास में सुधार करते हैं और पौधे की एंजाइमिक गतिविधि को बढ़ाते हैं। ये वृद्धिकारक राइजोबैक्टीरिया विभिन्न तरीके से पौधों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं। इसलिये इन्हें पादप स्वास्थ्यवर्धक राइजोबैक्टीरिया भी कहते हैं।
राइजोबैक्टीरिया के प्रमुख कार्य
1. जैविक नत्रजन स्थिरीकरण
जैव उर्वरक में सूक्ष्म जीव वायुमण्डल में मौजूद नत्रजन को जैविक स्थिरीकरण कर पौधों को उपलब्ध कराते है। ये जैव उर्वरक बहुत सस्ते, प्रयोग करने में बहुत सरल एवं वातावरण अनुरुप होते है। इन जैव उर्वरको का रासायनिक एवं जैविक संसाधनों के साथ उचित रूप से प्रयोग करने से पौधों में वृद्धि होती है। अनेक प्रकार के जैवघटक नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता रखते हैं।
इनमें सूरज की रोशनी का इस्तेमाल करने वाले जीवाणु तथा नील-हरित शैवाल प्रमुख हैं। इन दो समूहों में से खेती में उपयोग की दृष्टि से नील-हरित शैवाल अधिक उपयुक्त हैं। इस समूह के घटकों को मुख्यतः शैवाल कहा जाता है परन्तु वास्तव में यह साइनोबैक्टीरिया समूह के सदस्य होते हैं। नील. हरित शैवालों की कोशिकाओं में क्लोरोफिल के अलावा दो अन्य रंजक फाइकोसाइनीन एवं फाइकोएरिथिन कुछ कम या अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इन रंजकों की उपस्थिति के कारण नील. हरित शैवाल सूर्य के प्रकाश में उपस्थित हरी एवं पीली प्रकाश किरणों का भी प्रकाश संश्लेषण में उपयोग कर सकते हैं।
सहजीवी नत्रजन स्थिरीकारक जीवाणु
इस प्रकार के जीवाणु पादप कोशिका के अन्दर रहकर वायुमंडलीय नत्रजन को स्थापित करते हैं जैसे- राइजोबियम, वायुम मिसो-राइजोबियम, एजो-राइजोबियम तथा सिनो-राइजोबियम।
गैर सहजीवी नत्रजन स्थिरीकारक जीवाणु
ये पादप कोशिका के बाहर रहते हैं और नत्रजन स्थिरीकरण करते हैं एवं जड़ों में ग्रन्थियों का निर्माण नहीं करते हैं जैसे-एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, बैसिलस, स्युडोमोनास प्रजाति।
2. पादप जड़ क्षेत्र में पोषक तत्व की उपलब्धता बढ़ाना
मृदा पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का प्रमुख स्रोत है। वर्तमान कृषि परिदृश्य में मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को महत्व दिए बिना अकार्बनिक पोषक तत्वों के स्रोतों के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता में गिरावट आई है। मृदा में पोषक तत्वों की अनुपलब्धता से पौधों में नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न होते हैं जिसके परिणामस्वरूप उपज में गिरावट आती है।
लौह, मैंगनीज, जस्ता, तांबा, नाइट्रोजन, फास्फोरस और सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे पोषक तत्वों के जियोकेमिकल साइकलिंग में राइजॉस्फेरिक बैक्टीरिया की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। ये सूक्ष्म जीव पौधों के लिए पोषक तत्वों की उपलब्धता निर्धारित करते हैं। ये जीवाणु पौधे की पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाकर विकास हार्मोन का उत्पादन करके फसल की पैदावार बढ़ाने में मदद करते हैं और ये कई पौधों में परजीवी रोगजनकों के नियंत्रण के लिए जैव कारक के रूप में भी काम करते हैं।
3. विभिन्न पादप हार्मोन का उत्पादन कर पादप वृद्धि को बढ़ाना
पौधों के विकास को नियंत्रित करने वाले रसायनों को पादप हार्मोन / फाइटोहार्मोन कहते हैं। इनका उत्पादन पौधों में ही होता है। पादप हार्मोन पौधे को निश्चित आकार देने के साथबीज विकास, पुष्पण का समय, पत्तियों और फलों के पकने के लिए उत्तरदायी होते हैं। पादप हार्मोन पौधों के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इनके अभाव में पादप का विकारा संभव नहीं है।
पौधों में मुख्यतः पाँच प्रकार के वृद्धि हार्मोन पाए जाते हैं। वे हैं ऑविसन, जिब्रेलिक अम्ल, साइटोकाईनिन, इथाइलिन और एब्सिसिक अम्ल।कई अध्ययनों ने गन्ने में पीजीपीआर के उपयोग के कई लाभ बताये हैं। रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक इनपुट को कम करने के लिए ये जीवाणु किसानों के लिए एक उत्कृष्ट विकल्प हैं। प्रस्तुत समीक्षा वर्तमान परिदृश्य में राइजोबैक्टीरिया की अवधारणा और हाल के अध्ययनों के साथ पौधों के विकास को बढ़ावा देने के उनके अंतर्निहित तंत्र को स्पष्ट करने का एक प्रयास है।
आधुनिक कृषि की चुनौती का सामना करने वाले किसानों के लिए गन्ने में पीजीपीआर का उपयोग एक बढ़िया विकल्प है। राइजोबैक्टीरिया पौधे की वृद्धि को बढ़ावा देने के साथ मिट्टी में उपस्थित रोगजनकों से भी पौधे की रक्षा करते हैं। जीवाणु कल्चर को बीज या जैविक खादों के साथ मिट्टी में मिलाने पर खेत में इन जीवाणुओं की संख्या तेजी से बढ़ती है तथा पौधों के लिए जरूरी तत्व जैसे- नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, आदि की उपलब्धता बढ़ती है। नाइट्रोजन के लिए राइजोबियम, एजौटोबैक्टर, एसीटोबैक्टर तथा फास्फोरस के लिए फास्फेट घुलनशील जीवाणु कल्चर का उपयोग किया जाता है।
जैव उर्वरक, मिट्टी में उत्पन्न होने वाले विभिन्न रोगों के नियंत्रण में भी सहायक होते हैं। जैव उर्वरकों का उपयोग करने से वातावरण/ मृदा प्रदूषण को भी रोका जा सकता है तथा रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम किया जा सकता है। राइजोबैक्टीरिया जड़ से जुड़े जीवाणु हैं जो पौधों के साथ सहजीवी संबंध बनाते हैं तथा पौधों को फायदा पहुंचाते हैं। इन राइजोबैक्टीरिया को जैव उर्वरक भी कहा जाता है।पीजीपीआर को पौधों के विकास को बढ़ावा देने वाले जीवाणुओं के रूप में भी जाना जाता है।
मिट्टी में विभिन्न प्रकार के जीवाणु पाये जाते हैं जो कि राइजोरिफयर, राइजाप्लेन एंडोफाइटिक और साइलोरफीगर के रूप में परिभाषित है। राइजोबैक्टीरिया विभिन्न माध्यमों से पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देने में राक्षम है जैरो नाइट्रोजन, फारफोररा तथा फाइटोहार्मोन उत्पादन, साइडरोफोर उत्पादन तथा जैव नियंत्रण। पीजीपीआर विभिन्न जीवाणुओं के समूह को कहा जाता है जैसे-एजोस्पाइरिलग, एजोटोबैक्टर, वैसिलस, स्यूडोगोनारा, राइजोबियम तथा ग्लूकानएसीटोवैक्टर, एजोस्पाइरिलम पौधों में नाइट्रोजन के स्थिरीकरण तथा इंडोल एसिटिक एसिड के उत्पादन में सहायता करता है।
एजोटोबैक्टर किसी भी फसल के लिए एक महत्वपूर्ण जैव उर्वरक है। यह अपनी नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता के लिए जाना जाता है, जो कि किसी भी फसल के लिए महत्वपूर्ण है। एजोटोबैक्टर एसिटिक एसिड के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण जीवाणु है, जो कि गन्ने की फसल के लिए आवश्यक है। ग्लूकोन-एसीटोवैक्टर एक नाइट्रोजन फिक्सिंग और एसिटिक एसिड उत्पादक जीवाणु है।
दुनिया की बढ़ती आबादी के कारण उपभोक्ता बाजार की मांगों को पूरा करने के लिए फसल उत्पादन में वृद्धि के लिए बड़ी मात्रा में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कर फसल उत्पादन लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। हालांकि रासायनिक उर्वरकों का उपयोग मनुष्य तथा मृदा दोनों के लिए घातक है। पीजीपीआर का उपयोग मृदा में होने वाले नुकसान को बचाता है तथा पर्यावरण प्रदूषण को रोकता है।
गत कुछ वर्षों में जैव उर्वरकों की आवश्यकता महसूस की गई है, क्योंकि इनके उपयोग से बढ़ते रासायनिक उर्वरकों की निर्भरता में कमी देखी गयी है। यद्यपि जैव उर्वरकों के प्रयोग से हम अच्छी एवं गुणवत्ता युक्त उपज प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु इसके बावजूद भी आजकल जैव उर्वरक आम किसान तक नहीं पहुंच पाया है। किसान आज भी जैव उर्वरक के प्रयोग एवं इससे होने वाले लाभ से अनभिज्ञ हैं। इस ज्ञान को आम किसान तक पहुंचाने के प्रयास किए जाएँ तो किसानों को उचित लाभ मिल सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
