मानव जीवन में तुलसी का महत्व      Publish Date : 12/11/2025

                      मानव जीवन में तुलसी का महत्व

                                                                                                                                                          प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 सुशील शर्मा

तुलसी एक ऐसी वनस्पति है, जो कि हिन्दु धर्म में पूज्यनीय हाने के साथ ही महत्वपूर्ण औषधि के रूप में भी प्रयोग की जाती है। अतः तुलसी आज हमारी आस्था का एक प्रतीक ही नहीं है, बल्कि इसका औषधीय रूप में प्रयोग करने से मानव जीवन कल्याण का प्रतीक भी है। तुलसी का शब्दिक अर्थ है जिसकी किसी के साथ तुलना नहीं की जा सके अर्थात अतुलनीय।

तुलसी को हिन्दु धर्मग्रन्थों में अमृता, पत्रपुष्पा, पवित्रा, श्रवल्लरी, सुभगा, तीव्रा, पावनी, विष्णुवल्लभा, माधवी, सुरवल्ली, देवदुदंभी, विष्णुपत्नी, मूलश्रेष्ठा, पापध्नी, लक्ष्मी, श्रीकृष्ण वल्लभा आदि विभिन्न नामें से वर्णित किया गया है। अपने गुणों के कारण तुलसी भारत के लगभग प्रत्येक घर में मिलने वाला, सर्वरोग निवारक तथा जीवन शक्ति संवर्धक एक पवित्र पौधा है। तुलसी के पौधे में पाए जाने वाले औषधीय गुणों के चलते आयुर्वेद में भी तुलसी को एक महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है।

तुलसी जुकाम, खाँसी, बुखार, सूखा रोग, पसलियों का चलना, निमोनिया, कब्ज और अतिसार आदि रोगों में चमत्कारी रूप से प्रभाव दिखाती है। तुलसी की पत्ती युक्त पानी का सेवन करने से विभिन्न प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। इस कारण से ही तुलसी के पत्ते को चरणामृत में डाला जाता है।

तुलसी की प्रजातियाँ:

                                                               

श्री तुलसीः (ऑसीमम सैंक्टम) हमारी सुपरिचित तुलसी, जिसके पत्र एवं शाखाएं श्वेताभ हरी होती हैं।

कृष्णा तुलसी या काली तुलसीः गम्भीरा या मामरी (अमेरिकन ऑसीमम) कृष्णा तुलसी के पत्रादि काले रंग की आभा लिए होते हैं। गुण, धर्म की दृष्टि से कृष्णा तुलसी को श्रेष्ठ माना गया है। हालांकि अधिकांश विद्वानों का मत है कि यह दोनों ही गुणों में समान होती हैं।

मरूआ तुलसी मुन्जरिकी या मुरसाः (ऑसीमम वेसिलिकम) स्वीट वेसिल या फ्रेंच बेसिल या इंडियन बेसिल अथरवा मीठी तुलसी के नाम से जाने जानी वाली तुलसी की यह प्रजाति भी बहुत उपयोगी है। इससे तुलसी का मीठा तेल, स्वीटबेसिल ऑयल प्राप्त होता है। ऑसीमम बेसिलिकम लेमिएसी कुल का एक पौधा है। इस पौधे की लम्बाई 30 से 90 सेंटीमीटर तक होती है। पत्तियों की लम्बाई 3.5 से.मी. तक होती है। तुलसी के इस पौधे में बहुत सी तेल कोशिकाएं होती है, जो सुगंधित तेल प्रदान करती हैं।

विभिन्न रोगों में तुलसी के लाभः

मुंह का संक्रमणः अल्सर एवं मुंह के अन्य संक्रमणों में तुलसी की पत्तियां लाभ प्रदान करती हैं। प्रतिदिन तुलसी की कुछ पत्तियों को चबाने से मुंह के संक्रमण दूर हो जाते हैं।

त्वचा एवं बालों के रोग में तुलसीः दाद, खाज-खुजली के अलावा त्वचा की अन्य समस्याओं में तुलसी अर्क को प्रभावित स्थान पर लगाने से कुछ ही दिनों में यह रोग दूर हो जाते हैं। नैचुरोपैथी में ल्यूकोडर्मा नामक रोग का तुलसी के पत्तों के माध्यम से सफलता पूर्वक उपचार किया गया है। तुलसी की ताजा पत्तियों को प्रभावित स्थान पर रगड़ने से रोग का संक्रमण अणिक नहीं फैलता है।

यदि आपके चेहरे पर मुंहासें हैं तो आप अपने चेहरे पर इसका पेस्ट बनाकर लगा सकते हैं, जिससे मुंहासें पैदा करने वाले बैक्टीरिया मर जाते हैं। यदि आपके सिर में रूसी अधिक है इस समस्या के निवारण हेतु भी तुलसी का प्रयोग किया जा सकता है। तुलसी के तेल से सिर की मसाज करने से सिर में रक्त प्रवाह तेज होता है, जिससे बालों की जड़ें मजबूत हो जाती हैं।

दुर्गन्ध युक्त सांसः तुलसी की सूखी पत्तियों को सरसों के तेल में मिलाकर दांत साफ करने से सांसों की दुर्गन्ध दूर होती है और पायरिया की समस्या में भी यह लाभ प्रदान करती है।  

सिरदर्द की समस्याः सिरदर्द की समस्या में तुलसी एक प्रभावी दवा के तौर पर काम करती है। तुलसी का काढ़ा पीने से सिरदर्द में तुरंत लाभ मिलता है।

आँखों की समस्या में तुलसीः आँखों में जलन होने की समस्या में तुलसी का अर्क लाभ प्रदान करता है। प्रतिदिन रात में श्यामा तुलसी के अर्क की दो बूंद आँखें में डालने से आराम मिलता है।

कान के दर्द में तुलसीः तुलसी के पत्तों को सरसों के तुल में भूनकर इसमें लहसुन का रस मिलाकर कान में डालने से कान के दर्द में राहत मिलती है।

लाभकारी है तुलसी का तेलः तुलसी के तेल कें विटामिन सी, कैल्शियम और फॉस्फोरस आदि ततव पाए जाते हैं।

चक्कर आने में तुलसीः तुलसी के पत्तों के रस को शहद में मिलाकर चाटने से चक्कर आने की समस्या समाप्त हो जाती है।

यकृत सम्बन्धी समस्याओं में तुलसीः तुलसी की 10-12 पत्तियों को गर्म पानी से धोकर प्रातः काल सेवन करने से यकृत से सम्बन्धित समस्याओं में आराम मिलता है।

पेट के दर्द में तुलसीः पिसी हुई तुलसी की पत्ती एक चम्मच को पानी में मिलागर गाढ़ा पेस्ट बना लें। इस पेस्ट का नाभी के आसपास लेप करने से पेट दर्द में आराम मिलता है।

पाचन सम्बन्धी समस्याओं में तुलसीः पाचन सम्बन्धी समस्याओं जैसे दस्त लगना, पेट में गैस बनना आदि के होने पर तुलसी की 10 से 15 पत्तियों को एक गिलास पानी में डालकर इसका काढ़ा बना कर एक चुटकी सेंधा नमक मिलाकर पाचन सम्बन्धी समस्याओं में आराम मिलता है।

बुखार आने पर तुलसीः दो कप पानी में एक चम्मच तुलसी की पत्तियों का पाउडर मिलाकर इसका काढ़ा बनाकर दिन में दो से तीन बार सेवन करने से बुखार में राहत मिलती है।

खाँसी और जुकाम में तुलसीः जितने भी कफ सीरप है उनको बनाने के लिए तुलसी का प्रयोग अवश्य किया जाता है। तुलसी की पत्तियाँ कफ को साफ करने में सहायता करती हैं। तुलसी की कोमल पत्तियों को थोड़ी-थोड़ी देर के अंतराल पर अदरक के साथ चबाने से खाँसी-जुकाम में राहत मिलती है।

                                                             

यूजीनॉल का ओवरडोजः यूजीनॉल तुलसी का एक प्राथमिक तत्व है। माना जाता है कि तुलसी का अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर के यूजीनॉल के स्तर को बढ़ा सकता है और यूजीनॉल का बढ़ा हुआ स्तर हमारे शरीर के लिए विषैला सिद्व हो सकता है। यूजीनॉल सिगरेट एवं कुछ फूड फ्लेवरिंग सब्सटेंट्स में पाया जाता है। इससे खाँसी के दौरान रक्त आना, श्वसन क्रिया का तेज होना और पेशाब में खून आना के जैसे कुछ लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।