
वर्तमान में हम सब्जियाँ नहीं बल्कि प्लास्टिक खा रहें हैं Publish Date : 10/11/2025
वर्तमान में हम सब्जियाँ नहीं बल्कि प्लास्टिक खा रहें हैं
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
अब ऐसा समय चल रहा है कि जब खेत से पैदा होने वाले उत्पादों में प्लास्टिक के अंश घुलने लगे हैं, यह संकेत है कि हमें अपने विकास की दिशा और जीवनशैली पर पुनर्विचार करना होगा।
हाल ही में इटली, चीन और भारत के वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में सामने आया है कि गाजर, पालक, सलाद और टमाटर के जैसी दैनिक प्रयोग की जाने वाली सब्जियों के ऊतकों में माइक्रोप्लास्टिक के अंश मौजूद हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह कण पानी, फॉस्फेट बाधारित उर्वरकों और प्रदूषित मृदा के माध्यम से पौधों के अंदर प्रवेश कर रहे हैं। गाँव और देहात में अब हर जगह प्लास्टिक का कचरा मिट्टी में मिश्रित हो रहा है। अशिक्षा, अज्ञानता और जागरूकता की कमी के चलते यह कण पौधों की जड़ों तक पहुँच रहे हैं और पौधों की जड़ों के द्वारा यह अति सूक्ष्म कण अवशोषित कर लिए जाते हैं जो जाइलम और फ्लोएम के माध्यम से पौधों की पत्तियों और उनके फलों तक पहुँच जाते हैं।
मानव के जीवन की पोषण श्रृंखला में सब्जियाँ सबसे बुनियाद और शुद्व समझी जाती रही हैं, परन्तु हाल के इस अध्ययन में इस धारण का खण्ड़ित किया गया है। अध्ययन के अनुसार अब सब्जियों के ऊतकों में भी माइक्रोप्लास्टिक के कण पाए जा रहे हैं। इससे पहले के अध्ययनों में यह कण माँ के दूध, रक्त और समुद्री भोजन में भी पाए जा चुके थे। इस प्रकार यह बिलकुल स्पष्ट है कि प्रदूषण ने पृथ्वी के प्रत्येक स्तर पर अपनी जगह बना ली है- वायु, जल के साथ ही अब यह अन्न तक भी पहुँच चुके हैं। माइक्रोप्लास्टिक कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि यह मिट्टी, भूजल आदि के माध्यम से पौधों की जड़ों तक पहुँच जाते हैं।

यह स्थिति इसलिए भी अधिक गम्भीर है, क्योंकि पूर्व में माइक्रोप्लास्टिक के कण केवल समुद्र और जलचर प्राणियों तक ही सीमित समझे जा रहे थे। वर्ष 2021 में ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने मानव के रक्त में इनकी उपस्थिति दर्ज की, वर्ष 2022 में माँ के दूध में और वर्ष 2023 में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया कि एक व्यक्ति प्रति सप्ताह लगभग 5 ग्राम माइक्रोप्लास्टिक के कणों को निगल रहा है, अर्थात एक क्रेडिट कार्ड के जितना माइक्रोप्लास्टिक।
अब जब कि इनकी उपस्थिति सब्जियों में दर्ज की जा चुकी है, तो स्पष्ट है कि आज प्रदूषण हमारी सम्पूर्ण खाद्य श्रृंखला में व्याप्त हो चुका है।
भारत के सन्दर्भ में तो यह समस्या और भी अधिक गम्भीर है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, भारत में प्रति वर्ष लगभग 41 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से लगभग 60 प्रतिशत पुनर्चक्रित नहीं किया जाता है। अन्ततः यह कचारा मिट्टी और जल स्रोतों में चला जाता है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और वाराणसी के आसपास स्थि कृषि क्षेत्रों की मिट्टी के किए गए विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि लगभग 70 प्रतिशत खेतों की मृदाओं में यह माइक्रो प्लास्टिक के कण मोजूद हैं। भारत के कई नगर निगम सीवेज से निकले कीचड़ को खाद की तरह से खेतों में डाल देते हैं, जबकि इस कीचड़ प्लास्टिक फाइबर्स से भरपूर होता है और यही फाइबर्स पौधों के माध्यम से हमारे भोजन में मिल जाते हैं।
माइक्रो प्लास्टिक के कण हमारे शरीर के अंदर पहुँचकर ऑक्सीडेटिव तनाव, हॉर्मोन असंतुलन और कोशिकीय रूाति उत्पन्न करते हैं। इससे कैंसर, हृदय रोग, प्रजनन की क्षमता में कमी और तंत्रिका तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव होने की आशंका रहती है।
कुछ अन्य अध्ययनों में पाया गया है कि नैनोप्लास्टिक के कण मस्तिष्क और भ्रूण तक भी पहुँच सकते हैं, जिससे गर्भवती महिलाओं और बच्चों पर इसके गम्भीर प्रभाव पड़ सकते हैं। माइक्रो प्लास्टिक के कण मिट्टी की संरचना को बदलने की क्षमता भी रखते हैं और उसकी जलधारण क्षमता में कमी आकर मृदा के अंदर सूक्ष्मजीवों की संख्या में भी कमी आ जाती है। इसके अतिरिक्त यह कण उत्पादित फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता को प्रभावित कर खाद्य सुरक्षा के लिए भी खतरा उत्पन्न करते हैं।

इस संकट से निपटने के लिए हमें नीतिगत, कृषि और व्यक्तिगत स्तर पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। सरकार को सिंगल यूज प्लास्टिक पर सख्त प्रतिबंध कानून लागू करना चाहिए। प्लास्टिक मिश्रित खाद या सीवेज कीचड़ को खेतों में डालने पर रोक लगानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, मिट्टी और जल में उपलब्ध माइक्रो प्लास्टिक कणों की नियमित जांच की जानी चाहिए। इसके साथ ही किसानों को स्वच्छ जल से सिंचाई करने और प्राकृतिक खाद, जैसे वर्मी-कम्पोस्ट आदि के उपयोग हेतु प्रोत्साहित करना आवश्यक है। एक ‘प्लास्टिक-मुक्त खेती को सरकारी योजनाओं के साथ जोड़ा जाना भी समय की माँग है।
इसके सापेक्ष व्यक्तिगत स्तर पर भी व्यापक बदलाव करना बहुत आवश्यक है। हमें बोतलबंद पानी और प्लास्टिक पैकिंग युक्त खाद्य-पदार्थों का प्रयोग नहीं अथवा कम से कम करना चाहिए। सिंथेटिक वस्त्रों की एाुलाई में माइक्रो फाइबर फिल्टर काप्रयोग करना भी उपयोगी हो सकता है। इसके साथ ही सब्जियों को बहते पानी में अच्छी तरह से धोना और स्थानीय जैविक उत्पादों के प्रयोग को प्राथमिकता प्रदान अधिक सुरक्षित रहता है।
माइक्रो प्लास्टिक मात्र एक प्रदूषण का ही विषय नहीं रह गया है, बल्कि आज यह हमारे लिए जीवन और स्वास्थ्य का भी प्रश्न बन चुका है। आज जब हमारे खेतों में उगाए जाने वाले अन्न में भी प्लास्टिक के सूक्ष्म कणा घुलने लगे हैं तो यह संकेत है कि हमें अपने विकास की दिशा और जीवनशैली आदि पर भी एक बार फिर से विचार करना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में पर्यावरण के अस्तित्व को बचाना अनिवार्य है। यदि अब भी हमने इसके प्रति कुछ सचेत कदम नहीं उठाए तो सम्भवतः आने वाली पीढ़ियों को शुद्व भोजन और स्वच्छ मिट्टी आदि के विषय में केवल किताबों में ही पढ़ने को मिलेगा और इनका साक्षात मिलना दूभर हो जाएगा।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
