डिजिटल युग में जैव-विविधता संरक्षण      Publish Date : 05/11/2025

                  डिजिटल युग में जैव-विविधता संरक्षण

                                                                                                                                                         प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

जैव-विविधता के महत्व को समझना और उसके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देना है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण जैव विविधता संकट में है। आधुनिक तकनीक जैसे एआई और ड्रोन जैव-विविधता संरक्षण में सहायक सिद्ध हो रहे हैं. जिससे संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा मिल रही है।

स्व में लोग भोजन, ईंधन, कपड़े, दवाइयां के लिए वन्यजीवों और जैव-विविधता आधारित संसाधनों पर निर्भर रहते हैं। प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में वनस्पतियों के साथ-साथ वन्यजीवों की भूमिका भी अनमोल होती है, जो न केवल जैव-विविधता को बनाए रखने में सहायक होते हैं बल्कि मनुष्यों के जीवन चक्र को भी संतुलित रखते हैं। हालांकि, प्रदूषण, पर्यावरणीय परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण अनेक वनस्पति और जीव प्रजातियां गंभीर संकट का सामना कर रही हैं।

वन्यजीव पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न अंग होते हैं और जैव-विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लेकिन अवैध शिकार, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आवास क्षति के चलते उनकी संख्या में निरंतर गिरावट आ रही है। दुनियाभर में वन्य जीवों की अनेक प्रजातियां तेजी से तुप्त हो रही हैं। इसीलिए दुनिया के जंगली जीवों और वनस्पतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 22 अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए जैव-विविधता के महत्य के बारे में लोगों को जागरूक किया जाना अनिवार्य हो गया है। जैव-विविधता पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (यूएनसीबीडी) 22 मई 1992 को अपनाया गया था और संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2000 में आधिकारिक तौर पर 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस घोषित किया था। 'यूएनसीबीडी' जैव-विविधता के संरक्षण के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है और भारत भी इस संधि का एक पक्षकार है जिसने जैव-विविधता अधिनियम 2002 लागू किया था।

'जैव-विविधता' शब्द पहली बार एक अवधारणा के रूप में वर्ष 1985 में वाल्टर जी. रोसेन द्वारा दिया गया था, जिसमें पौधों, बैक्टीरिया, जानवरों और मनुष्यों सहित सभी जीवों की विविधता शामिल है।

विश्व वन्यजीव कोष (WWF) की 'लिविंग पौनेट रिपोर्ट 2024' के अनुसार 1970 से 2020 के बीच मॉनिटर की गई वन्यजीव आबादी में औसतन 73 प्रतिशत की विनाशकारी गिरावट दर्ज की गई है। लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्रों में यह गिरावट 95 प्रतिशत तक पहुंच गई जबकि अफ्रीका में 76 प्रतिशत और एशिया-प्रशांत में 60 प्रतिशत की कमी देखी गई है। ताजे पानी के पारिस्थितिक तंत्र में यह गिरावट 85 प्रतिशत रही है। इन गिरावटों के प्रमुख कारणों में वनों की कटाई, आवासीय क्षति, अत्यधिक दोहन, प्रदूषण, जलवायु संकट, आक्रामक प्रजातियों का उभार और विभिन्न बीमारियां शामिल हैं।

इन आंकड़ों की देखकर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि मानव गतिविधियों का सीधा प्रभाव वन्यजीवों पर पड़ रहा है। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, शहरीकरण और कृषि विस्तार के कारण वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिकुड़स्व में लोग भोजन, ईंधन, कपड़े, दवाइयां के लिए वन्यजीवों और जैव-विविधता आधारित संसाधनों पर निर्भर रहते हैं।

प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में वनस्पतियों के साथ-साथ वन्यजीवों की भूमिका भी अनमोल होती है, जो न केवल जैव-विविधता को बनाए रखने में सहायक होते हैं बल्कि मनुष्यों के जीवन चक्र को भी संतुलित रखते हैं। हालांकि, प्रदूषण, पर्यावरणीय परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण अनेक वनस्पति और जीव प्रजातियां गंभीर संकट का सामना कर रही हैं। वन्यजीव पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न अंग होते हैं और जैव-विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लेकिन अवैध शिकार, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आवास क्षति के चलते उनकी संख्या में निरंतर गिरावट आ रही है। दुनियाभर में वन्य जीवों की अनेक प्रजातियां तेजी से तुप्त हो रही हैं।

इसीलिए दुनिया के जंगली जीवों और वनस्पतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 22 अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस' के रूप में मनाया जाता है। पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए जैव-विविधता के महत्य के बारे में लोगों को जागरूक किया जाना अनिवार्य हो गया है। जैव-विविधता पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCBD) 22 मई 1992 को अपनाया गया था और संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2000 में आधिकारिक तौर पर 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस घोषित किया था।

'यूएनसीबीडी' जैव-विविधता के संरक्षण के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है और भारत भी इस संधि का एक पक्षकार है जिसने जैव-विविधता अधिनियम 2002 लागू किया था। 'जैव-विविधता' शब्द पहली बार एक अवधारणा के रूप में वर्ष 1985 में वाल्टर जी. रोसेन द्वारा दिया गया था, जिसमें पौधों, बैक्टीरिया, जानवरों और मनुष्यों सहित सभी जीवों की विविधता शामिल है।

विश्व वन्यजीव कोष (WWF) की 'लिविंग पौनेट रिपोर्ट 2024' के अनुसार 1970 से 2020 के बीच मॉनिटर की गई वन्यजीव आबादी में औसतन 73 प्रतिशत की विनाशकारी गिरावट दर्ज की गई है। लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्रों में यह गिरावट 95 प्रतिशत तक पहुंच गई जबकि अफ्रीका में 76 प्रतिशत और एशिया-प्रशांत में 60 प्रतिशत की कमी देखी गई है। ताजे पानी के पारिस्थितिक तंत्र में यह गिरावट 85 प्रतिशत रही है। इन गिरावटों के प्रमुख कारणों में वनों की कटाई, आवासीय क्षति, अत्यधिक दोहन, प्रदूषण, जलवायु संकट, आक्रामक प्रजातियों का उभार और विभिन्न बीमारियां शामिल हैं।

इन आंकड़ों की देखकर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि मानव गतिविधियों का सीधा प्रभाव वन्यजीवों पर पड़ रहा है। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, शहरीकरण और कृषि विस्तार के कारण वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिकुड़रहे हैं। हाल के अध्ययनों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर हर साल लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो रहे हैं, जिससे वन्यजीवों का आवास तेजी से कम हो रहा है।

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर' (आईयूसीएन) की रिपोर्ट में भी बताया गया है कि विश्वभर में हजारों वन्यजीव और वनस्पति प्रजातियां संकट में हैं और आने वाले समय में इनके विलुप्त होने की संभावना बढ़ सकती है। आईयूसीएन के अनुसार, वर्तमान में 40,000 से अधिक वन्यजीव प्रजातियां संकटग्रस्त हैं, जिनमें 8,400 से अधिक वन्यजीव प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं। इनमें से कई प्रजातियां जलवायु परिवर्तन के कारण तेज़ी से प्रभावित हो रही हैं, जिससे उनके अस्तित्व पर बड़ा संकट मंडरा रहा है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, अधिकांश प्रजातियां मानव शिकार के कारण सुप्त हो रही हैं जबकि इनके पीछे और भी कारण जैसे अन्य जानवरों के हमले और बीमारियां भी शामिल हैं। जब किसी पारिस्थितिकी तंत्र से एक प्रजाति विलुप्त हो जाती है तो उसका प्रभाव पूरे पर्यावरण पर पड़ता है। इससे खाद्य-श्रृंखला में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है, जिससे अन्य प्रजातियों का जीवन भी खतरे में आ जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में शेरों की संख्या कम हो जाए तो हिरणों की संख्या अत्यधिक बढ़ जाएगी, जिससे वनस्पतियों की हानि होगी और पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

'वर्ल्ड वाइल्डलाइफ क्राइम रिपोर्ट' के अनुसार, वन्यजीवों की तस्करी विश्व के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। भारत में ही 2022 में 50 से अधिक बार विदेशी वन्यजीवों को तस्करों के कब्जे से मुक्तकराया गया था, जिनमें हुलॉक गिबन, विदेशी कछुए, बड़ी छिपकलियां, बीवर, मूर मकैक, बौने नेवले, पिग्मी मार्मोसेट बंदर, डस्की लीफ मंकी, बॉल पायथन जैसे विदेशी जीव शामिल थे।

वन्यजीव तस्करी केवल भारत तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह एक वैश्विक समस्या बन चुकी है। बाघ की खाल, हाथी दांत, गैंडे के सींग, कछुओं के कवच, दुर्लभ पक्षियों के अंडे और अन्य वन्यजीव उत्पादों की तस्करी बड़े पैमाने पर की जा रही है। इन दुर्लभ प्रजातियों की अवैध तस्करी से न केवल जैव-विविधता को नुकसान पहुंच रहा है बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता भी खतरे में पड़ रही है।

वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न देशों द्वारा सख्त कानून बनाए जा रहे हैं। भारत में 2022 में संशोधित वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू किया गया था, जिसके तहत वन्यजीव तस्करी पर कड़ी सजा और आर्थिक दंड का प्रावधान दिया गया। वन्यजीव संरक्षण के लिए वैश्विक सहयोग भी अब बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश मिलकर ट्रांसबाउंड्री टाइगर कंजर्वेशन प्रोजेक्ट चला रहे हैं, जिससे बाधों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

वहीं, अफ्रीका में ग्रेटर लूवांगवा इकोसिस्टम संरक्षण योजना के तहत हाथियों और गैंडों को बचाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। यदि सभी देश मिलकर वन्यजीव संरक्षण के लिए प्रभावी रणनीतियां अपनाएं तो जैव-विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है। वन्यजीवों की अंतर्राष्ट्रीय तस्करी को रोकने के लिए विभिन्न देशों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसा साझा तंत्र विकसित करने की जरूरत है, जो वन्यजीव तस्करी पर अंकुश लगाने में मदद कर सके।

इस सामूहिक रणनीति के तहत, यह तंत्र वन्यजीवों की बरामदगी के मामलों का विश्लेषण करते हुए तस्करों के नेटवर्क की पहचान कर सकेंगा और इंटरपोल की मदद से तस्करों के वित्तीय प्रयाह तंत्र की तोड़ने का काम भी कर सकेगा। ऐसी पहल वन्यजीव संरक्षण की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। यदि सभी देश मिलकर वन्यजीवों के अवैध व्यापार की रोकने के लिए कड़े कदम उठाएं तो निश्वित रूप से यह संकट कम हो सकता है।

हालांकि वन्यजीव संरक्षण में अब आधुनिक तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है, जिससे जैव विविधता की रक्षा के प्रयासों को नया आयाम मिला है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एजाई), ड्रोन, सैटेलाइट इमेजिंग और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का वन्यजीवों की निगरानी, संरक्षण और अवैध शिकार रोकने के लिए प्रभावी रूप से उपयोग किया जा रहा है। 'वन्यजीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतरर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन' (साइट्स) की महासचिव इयोन हिगुएरो के अनुसार, डिजिटल नवाचार हमारी अमूल्य जैव-विविधता की सुरक्षा के तरीकों को पूरी तरह से बदल रहा है।

नई तकनीकों के उपयोग से वन्यजीवों के संरक्षण को एक नई दिशा मिली है, जिससे न केवल उनकी निगरानी आसान हुई है बल्कि संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने में भी सहायता मिली है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ मिलकर अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग शुरू किया है।

ड्रोन से लेकर इनफ्रारेड कैमरों तक, इनका उपयोग वन्यजीव अपराध से निपटने के लिए किया जा रहा है। इन तकनीकों की मदद से रात के अंधेरे में भी शिकारियोंका पता लगाया जा सकता है, जिससे अवैध शिकार को रोकने में मदद मिलती है। साथ ही, इन तकनीकों का उपयोग बन्यजीवों के व्यवहार को समझने और उनके प्राकृतिक आवासों को संरक्षित करने के लिए भी किया जा रहा है।

WWF और गूगल ने मिलकर एआई संचालित कैमरा टेप विकसित किए हैं, जो जंगलों में वन्यजीवों की निगरानी करने और शिकारियों की पहचान करने में मदद कर रहे हैं। ये कैमरा ट्रैप वन्यजीवों की गतिविधियों पर नज़र रखते हैं और यदि कोई संदिग्ध गतिविधि होती है तो तुरंत अलर्ट भेजते हैं। इससे वन विभाग और संरक्षण से जुड़े संगठनों को तुरंत कार्रवाई करने में सहायता मिलती है। इसके अलावा, इन कैमरों की मदद से विलुप्त प्राय प्रजातियों की संख्या का सटीक अनुमान भी लगाया जा सकता है, जिससे संरक्षण नीतियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

आधुनिक ट्रैकिंग सिस्टम और वास्तविक समय डेटा विश्लेषण ने संरक्षणवादियों की वन्यजीवों की पहचान, निगरानी, ट्रैकिंग और संरक्षण के क्षेत्र में अत्यधिक सहायक बनाया है। विभिन्न सेंसर और जीपीएस ट्रैकिंग डिवाइस का उपयोग कर वन्यजीवों की आवाजाही पर नज़र रखी जासकती है, जिससे उनके व्यवहार और प्रवास के बारे में भी अधिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा, एआई संचालित समाधानों की मदद से वन्यजीवों की तस्वीरों और वीडियो का विश्लेषण किया जा रहा है, जिससे वैज्ञानिकों को उनकी जीवनशैली की बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल रही है।

मोबाइल एप्लीकेशन भी वन्यजीव संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अब ऐसे एप्लीकेशन विकसित किए जा चुके हैं जो सैकड़ों बाघों की विभिन्न प्रजातियों के बीच अंतर बता सकते हैं। इससे संरक्षणकर्ताओं को यह समझने में मदद मिलती है कि कौन से क्षेत्र में कौन सी प्रजाति पाई जाती है और उनके लिए विशेष रूप से क्या कदम उठाने की आवश्यकता है। इसी तरह, ड्रोन तकनीक का उपयोग समुद्री कछुओं के घोंसले के स्थानों का पता लगाने के लिए किया जा रहा है।

समुद्र तटों पर इन घोंसलों की निगरानी से अंडों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है और अवैध गतिविधियों को रोका जा सकता है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर एक मानकीकृत वन्यजीव नीति ढांचा अपनाने का काम किया है। इससे अवैध वन्यजीव उत्पादोंके ऑनलाइन व्यापार को रोका जा सकता है और अपराधियों को पकड़ने में सहायता मिल सकती है। कई देशों की सरकारें अब डिजिटल तकनीकों का उपयोग कर रही हैं ताकि वन्यजीव अपराधों को रोकने और दोषियों को न्याय के कठघरे में लाने में मदद मिल सके। भारत में भी

वन्यजीव संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीकों का तेज़ी से उपयोग हो रहा है। देश में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए विशेष रूप से कैमरा ट्रैप, जीपीएस ट्रैकिंग और एआई आधारित जाँच सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है। 'प्रोजेक्ट टाइगर' के तहत इन तकनीकों की मदद से बायों के प्राकृतिक आवासों की निगरानी की जा रही है। इसके अलावा, भारतीय यन्यजीव संस्थान और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) भी विभिन्न तकनीकी नवाचारों की अपनाकर जैव-विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

बहरहाल, सरकारें, वैज्ञानिक समुदाय, उद्योग और नागरिक समाज यदि मितकर कार्य करें ती वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। डिजिटल तकनीकें इस क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रही हैं और संरक्षण के नए अवसर प्रदान कर रही हैं लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि इन तकनीकों का सही ढंग से उपयोग किया जाए और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखा जाए। वन्यजीव संरक्षण केवल सरकारों और संगठनों की ही ज़िम्मेदारी नहीं है बल्कि आम नागरिकों को भी इसमें भाग लेना चाहिए। कुल मिलाकर, जैव-विविधता संरक्षण में आधुनिक तकनीकों का बढ़ता उपयोग इसे और अधिक प्रभावी बना रहा है।

एआई, ड्रोन, सैटेलाइट इमेजिंग और इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसे उपकरणों की मदद से हम न केवल वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं बल्कि उनकी संख्या बढ़ाने और पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में भी मदद कर सकते हैं। यह आवश्यक है कि सरकारें, वैज्ञानिक और आम नागरिक मिलकर इस दिशा में काम करें ताकि हमारी धरती की अमूल्य जैव-विविधता संरक्षित रह सके।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।