
वर्मीकम्पोस्ट-केचुआ खाद बनाने की विधि एवं उसका उपयोग Publish Date : 17/10/2025
वर्मीकम्पोस्ट-केचुआ खाद बनाने की विधि एवं उसका उपयोग
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
वर्तमान समय की कृषि के अन्तर्गत सामने आने वाली विकराल समस्याओं को देखते हुए जैविक एवं कार्बनिक खेती ही एकमात्र विक्लप है जो सभी समस्याओं का समाधान प्रदान कर सकती हैं। कार्बनिक खादों के द्वारा की जाने वाली खेती का मुख्य सिद्धान्त है कि उसके द्वारा पैदा होने वाली फसलों एवं खाद्य अधिक मात्रा में तथा अच्छे गुण से युक्त होते है। इसके साथ-साथ इनका पर्यावरण के साथ अच्छा संतुलन बना रहता है, जो कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में लाभकारी होगा।
खेती की इस प्रक्रिया में रासायनिक खादों कीटनाशकों और खरपतवार नाशक रासायनों को प्रयोग नहीं किया जाता है। वर्तमान समय में कार्बनिक खेती में वर्मीकम्पोस्ट एक महत्वपूर्ण, प्रभावशाली एवं विश्वासपूर्ण तकनीक है जिससे शीघ्रतिशीघ्र कृषि उत्पादन को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है। केचुओं के द्वारा बनाई गई यह वर्मीकम्पोस्ट खाद इन सभी समस्याओं का एक महत्वपूर्ण समाधान प्रस्तुत करती है।
वर्मीकम्पोस्ट एक जीवित पदार्थ है, इसमें भूमि में पाये जाने वाले लाभदायक जीवाणु विद्यमान होते है। वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग करने से पौधे मजबूत, स्वस्थ तथा बीमारियों के प्रति अधिक सहनशील होते हैं। वर्मीकम्पोस्ट में सर्वोत्तम मात्रा में फास्फोरस, नाईट्रोजन, पौटाशियम, कैलिशयम तथा मैंगनिश्यिम आदि पोषक तत्व पाये जाते है जो कि पौधों को शीघ्रताशीघ्र एवं सरलता से प्राप्त होते है। वर्मीकम्पोस्ट की उत्पत्ति कार्बनिक पदार्थ से होती है जो के पौधें की वृद्वि के लिये अति उत्तम है। इसके साथ ही यह कार्बनिक खाद हमारे पर्यावरण को भी संतुलित बनाकर रखता हैं।

वर्मीकम्पोस्ट के गुणः किसान मित्र केंचुएं पोषक तत्वों के जटिल रूप को सरल रूप से बदल देते है जिससे पोषक तत्व पौधों की जडों से आसानी से शोषित हो पाते है। एक आंकड़े के अनुसार 24 घंटे में किसी जलवायु के अन्य कारकों पर निर्भर करता है। इस प्रकार से इस छोटी यूनिट की प्रक्रिया को ’’एक छोटी उर्वरक फैक्ट्री भी कहा जा सकता है’’।
केंचुए की विशेषताएं: हमारे देश भारत में दो प्रकार के केंचुए पाये जाते है जिनमें ठंडे क्षेत्रों के लिये आईसीनिया फोटिड़ा तथा गर्म क्षेत्र हेतु जाति सर्वोत्तम होती हैं। केंचुओं की यह प्रजाति भूमि की ऊपरी सतह पर रहकर अपना भोजन तथा निर्वाह करती है। नर तथा मादा प्रजननेद्रियां एक ही प्राणी में पाई जाती हैं। इन प्रजातियों में एक ही अण्डे से दो से चार बच्चे पैदा होते है।
वमीकम्पोस्टिंग के काम में आने वाले पदार्थः किसान भाई कम्पोस्टिंग के लिए सभी प्रकार की व्यर्थ चीजे जैसे पौधों के डंठल, पत्तियाँ, भूसा, दाना, फल सब्जियों के छिलके, गोबर, खेत-खलिहान की बेकार चीजे अथवा सभी प्रकार की सूखी अथवा हरी पत्तियों एवं खरपतवारों आदि का उपयोग कर सकते हैं।
केंचुआ खाद बनाने की विधिः-
1. सर्वप्रथम बेकार पड़े पत्थरों, ईटों या बांस के डंडो के साथ 6-8 इंच ऊंची तथा 2-3 फुट चौड़ी एवं 10-12 फुट लम्बी क्यारियां बनायें।
2. क्यारी में सबसे नीचे पालीथीन की एक शीट बिछाएं।
3. इसके बाद 5 से.मी. मोटी कम गली-सड़ी गोबर खाद की तह लगायें।
4. पुनः 5 से.मी. ताजे गोबर की तह विछायें।
5. इसके बाद हरे अथवा सूखे पत्तों एवं खरपतवारों से 10 से.मी. मोटी एक तह बनायें।
6. इसके बाद उसमें केंचुओं का कल्चर डालें।
7. उपरोक्त सभी को जूट के गीले कपड़े/थैले से इसको ढंक दें।
8. अब इसके ऊपर 10 से.मी. की कार्बनिक पदार्थ (अधगली घास पत्तियाँ) की तह बिछायें।
9. क्यारियों में 45-50 प्रतिशत नमी के स्तर को बनाए रखें। गर्मी में 50-60 दिनों में व सर्दियों में 80-90 दिनों में कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाती है।
10. वर्मीकम्पोस्ट को एकत्र करने से पहले पानी का छिड़काव बन्द कर दें एवं इसकी ऊपरी सतह को सूखने दें।
11. इसके मोटे-मोटे घास फूस व कार्बिन तत्वों को बटोर कर अलग कर ले, क्योंकि इनका उपयोग फिर से क्यारियों में कर लेना चाहिए।
12. नीचे से केंचुए अलग करके कम्पोस्ट को छान ले।
13. छानी हुई बारीक खाद को खुले बर्तन में लगभग 10-15 दिनों तक नम स्थान पर रखें ताकि खाद में नमी बनी रहे, जिससे खाद में खरपतवारों के बीज को अंकुरित होने पर निकाला जा सके।
14. इस प्रकार वर्मीकम्पोस्ट खाद तैयार हो जाती है जो कि बारीक चाय की पत्ती के जैसी होती है।
15. इसके बाद वर्मीकम्पोस्ट खाद के अपनी सुविधा के अनुसार पैकेट बना लंे।
अपेक्षित सावधनियाँ:- वर्मीकम्पोस्ट बनाते समय निम्नलिखित सावधानियाँ बरती जानी चाहिएः-
1. वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने हेतु क्यारियां छाया में ही बनानी चाहिए और इन्हें धूप से बचाना चाहियें क्योंकि धूप से केचुंए मर जाते हैं।
2. क्यारियां पक्की नहीं बनानी चाहिए जिससे कि उसमें पानी न रूक सकें, पानी रूकने से केचुंए की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
3. केचुंए व वर्मीकम्पोस्ट क्रिया के लिए 40 प्रतिशत नमी का होना बेहद जरूरी है।
4. बरसात के दिनों में क्यारियों को तिरपाल से ढककर रखना चाहिए।

वर्मीकम्पोस्ट में पोषक तत्वों की मात्राः वर्मीकम्पोस्ट में नाईट्रोजन 1.78-2.50 प्रतिशत, फासफोरस 1.20-2.26 प्रतिशत एव पोटेशियम 1.25-2.0 प्रतिशत उपलब्ध होने के अलावा कैल्श्यिम, मैंगनिशियम, एवं सल्फर गोबर खाद की अपेक्षा अधिक होती है। इसमें आयरन, कॉपर और जिंक लगभग 250-750 पी0पी0एस0 की दर से उपलब्ध होते हैं। इसमें र्प्याप्त मात्रा में वैक्टीरिया उपलब्ध होते हैं जो मिट्टी की भौतिक एवं रासायनिक दशा में सुधार करते हैं।
वर्मीकम्पोस्ट की उपयोगिता:-
वर्मीकम्पोस्ट का प्रयोग अनाज व दल्हनी फसलों के लिये 6-8 टन प्रति हैक्टेयर, फलदार पेड़ों के लिए 9 से 10 किलोग्राम, घरेलु सब्जियों में 500 ग्राम से एक किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर तथा गमलें में 100 ग्राम प्रति गमलें की दर से प्रयोग करना उचित रहता है। अधिक पैदावार लेने के लिए यह कम्पोस्ट रासायनिक खाद के साथ ही डालना चाहिए। कीटनाशक दवाइयां जहर हैं अतः इनका उपयोग कम से कम करें। अधिक उत्पादन के लिए पंजीकृत नाशीजीव प्रबन्धन अपनाएं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
