अधिक लाभ के लिए टमाटर की खेती करें वैज्ञानिक विधि से      Publish Date : 06/11/2026

अधिक लाभ के लिए टमाटर की खेती करें वैज्ञानिक विधि से

                                                                             प्रो0 आर. एस. सेंगर, डॉ0 रेशु चौधरी एवं गरिमा शर्मा

टमाटर की फसल दक्षिण अमेरिका के पेरू इलाके में पहली बार उपजाई गई। यह भारत की महत्वपूर्ण व्यापारिक फसल है। यह फसल दुनिया भर में आलू के बाद दूसरे नंबर की सब से महत्वपूर्ण फसल है। इसे फल की तरह कच्चा और पकाकर भी खाया जा सकता है। यह विटामिन ए, सी, पोटाश्यिम और अन्य खनिजों का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है। इसका प्रयोग जूस,  सूप, पाउडर और कैचअप आदि को बनाने के लिए भी किया जाता है। इस फसल की प्रमुख पैदावार बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, महांराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिमी बंगाल में की जाती है।

इस फसल की खेती  अलग-अलग मिट्टी की किस्मों में की जा सकती है जैसे कि रेतली, चिकनी, दोमट, काली, लाल मिट्टी, जिसमें पानी के निकास का सही प्रबंध हो। इसकी अच्छी पैदावार के लिए इसे अच्छे निकास वाली रेतली मिट्टी में उत्तम जैविक तत्वों से युक्त को अच्छा माला जाता है। अच्छे निकास वाली मिट्टी की पी एच 7-8.5 होनी चाहिए। यह तेजाबी और खारी मिट्टी में भी उगने योग्य फसल है। ज्यादा तेजाबी मिट्टी में खेती ना करें। अगेती फसल के लिए हल्की मिट्टी लाभदायक है, जबकि अच्छी पैदावार के लिए चिकनी, दोमट और बारीक रेत वाली मिट्टी बहुत अच्छी है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Punjab Ratta: इस किस्म की पहली तुड़ाई 125 दिनों में तैयार होती है। इसकी औसतन पैदावार 225 क्विंटल प्रति एकड़ होता है। यह किस्म कईं तरह के उत्पाद तैयार करने के लिए भी प्रयोग की जाती है।

Punjab Chhuhara: यह किस्म बीजों के बिना, नाशपाती के आकार की, लाल और मोटे छिल्के वाली होती है। इसकी क्वालिटी कटाई के बाद 7 दिन तक मंडी में बेचनेयोग्य होती है। इसलिए इसे लंबी दूरी वाली स्थानों पर लेजाकर नए उत्पाद तैयार करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। इसकी औसतन पैदावार 325 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Punjab Tropic: इस किस्म के पौधे की ऊंचाई 100 सैं.मी. होती है। यह कटाई के लिए 141 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म के टमाटर का आकार बड़ा और गोल होता है और यह गुच्छों में लगते हैं। इसकी औसतन पैदावार 90-95 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Punjab Upma: यह किस्म वर्षा वाले मौसम के लिए अनुकूल है। इस किस्म का आकार अंडाकार और दरमियाना होता है। इसका रंग गहरा लाल होता है। इसकी औसतन पैदावार 220 क्ंिवटल प्रति एकड़ होती है।

Punjab NR-7: इस किस्म के पौधे छोटे होते हैं और इसके टमाटर दरमियाने आकार के और रसीले होते हैं। यह सोके और जड़ गलने की रोधक किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 175-180 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Punjab Red Cherry: यह किस्म पंजाब खेतीबाड़ी यूनिवर्सिटी द्वारा तैयार की गई है। इस किस्म को खास सलाद के लिए प्रयोग किया जाता है। इसका रंग गहरा लाल होता है और भविष्य में यह पीले, संतरी और गुलाबी रंग में भी उपलब्ध होगी। इसकी बिजाई अगस्त या सितंबर में की जाती है और फरवरी में यह कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह जुलाई तक पैदावार देती है। इसकी अगेती पैदावार 150 क्विंटल प्रति एकड़ और कुल औसतन पैदावार 430-440 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Punjab Varkha Bahar 2: पौध लगाने के बाद 100 दिनों में यह किस्म कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह पत्ता मरोड़ बीमारी रोधक किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 215 क्ंिवटल प्रति एकड़ है।

Punjab Varkha Bahar 1: पौध लगाने के बाद 90 दिनों में यह किस्म कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म वर्षा के मौसम के लिए अनुकूल है। यह पत्ता मरोड़ बीमारी की रोधक किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 215 क्विंटल प्रति एकड़ है।

HS 101: यह उत्तरी भारत में सर्दियों के समय लगाई जाने वाली किस्म है। इसके पौधे छोटे होते हैं। इस किस्म के टमाटर गोल और दरमियाने आकार के और रसीले होते हैं। यह गुच्छों के रूप में लगते हैं। यह पत्ता मरोड़ बीमारी की रोधक किस्म है।

Punjab Swarna: यह किस्म 2018 में जारी हुई है। इसके पत्ते गहरे हरे रंग के होते हैं। इसके फल अंडाकार, संतरी रंग के और दरमियाने होते हैं। इस किस्म की पहली तुड़ाई पौध लगाने के 120 दिनों के बाद की जाती है। मार्च के अंत तक इस किस्म की औसतन पैदावार 166 क्विंटल प्रति एकड़ और कुल उपज 1087 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म सलाद के तौर पर प्रयोग करने के लिए अनुकूल है।

Punjab Sona Cherry: यह किस्म 2016 में जारी की गई है। इसकी औसतन उपज 425 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके फल पीले रंग के और गुच्छों में निकलते हैं। फल का औसतन भार लगभग 11 ग्राम होता है। इसमें सुक्रॉस की मात्रा 7.5 प्रतिशत होती है।

Punjab Kesari Cherry: यह किस्म 2016 में जारी की गई है। इसकी औसतन उपज 405 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इस किस्म के फल का औसतन भार लगभग 11 ग्राम होता है। इसमें सुक्रॉस की मात्रा 7.6 प्रतिशत होती है।

Punjab Kesar Cherry: यह किस्म 2016 में जारी की गई है। इसकी औसतन उपज 405 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इस किस्म के फल का औसतन भार लगभग 11 ग्राम होता है। इसमें सुक्रॉस की मात्रा 7.6 प्रतिशत होती है।

Punjab Varkha Bahar-4: यह किस्म 2015 में जारी की गई है। इसकी औसतन उपज 245 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसमें सुक्रॉस की मात्रा 3.8 प्रतिशत होती है।

Punjab Gaurav: यह किस्म 2015 में जारी की गई है। इसकी औसतन उपज 934 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।इसमें सुक्रॉस की मात्रा 5.5 प्रतिशत होती है।

Punjab Sartaj: यह किस्म 2009 में जारी की गई है। इस किस्म के फल गोल आकार के, मध्यम और सख्त होते हैं। यह किस्म बारिश के मौसम के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन उपज 898 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

TH-1: यह किस्म 2003 में जारी की गई है। इस किस्म के फल गहरे लाल रंग के, गोल आकार के और भार लगभग 85 ग्राम होता है। इसकी औसतन उपज 245 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Punjab Swarna: यह किस्म 2018 में जारी की गई है। इसके पत्ते गहरे हरे रंग के होते हैं। इस किस्म के फल अंडाकार होते हैं जो संतरी रंग के और मध्यम आकार के होते हैं। इसकी पहली तुड़ाई रोपाई के 120 दिन बाद की जानी चाहिए। अंत मार्च तक इसकी औसतन पैदावार 166 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। और यह 1087 क्विंटल प्रति एकड़ उपज देती है। यह सीधे तौर पर खाने के लिए उपयुक्त किस्म है।

दूसरे राज्यों की किस्में

HS 102: यह किस्म जल्दी पक जाती है। इस किस्म के टमाटर छोटे और दरमियाने आकार के गोल और रसीले होते हैं।

Swarna Baibhav Hybrid:  इस किस्म की सिफारिश पंजाब, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश में की जाती है। इसकी बिजाई सितंबर-अक्तूबर में की जाती है। इसकी क्वालिटी लंबी दूरी वाले स्थानों पर ले जाने और अन्य उत्पाद बनाने के लिए अच्छी मानी जाती है। इसकी औसतन पैदावार 360-400 क्विंटल प्रति एकड़ है।

Swarna Sampada Hybrid: इस किस्म की सिफारिश पंजाब, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश में की जाती है। इसकी बिजाई के लिए अनुकूल समय अगस्त-सितंबर और फरवरी-मई है। यह झुलस रोग और पत्तों के मुरझाने  की रोधक किस्म है। इसकी औसतन पेदावर 400-420 क्विंटल प्रति एकड़ है।

Keekruth: इसके पौधे की ऊंचाई 100 सैं.मी. होती है। यह फसल 136 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इस किस्म के टमाटर दरमियाने से बड़े आकार के, गोल और गहरे लाल रंग के होते हैं।

Keekruth Ageti: इसके पौधे की ऊंचाई 100 सैं.मी. होती है। इस किस्म के टमाटर दरमियाने से बड़े आकार के और गोल होते हैं जो ऊपर से हरे होते हैं। पकने के समय इनका रंग बदल जाता है।

खेत की तैयारी

टमाटर के पौधे लगाने के लिए अच्छी जोताई और समतल मिट्टी की जरूरत होती है। मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए 4-5 बार जोताई करें। फिर मिट्टी को समतल करने के लिए सुहागा लगाएं। आखिरी बार हल से जोताई करते समय इसमें अच्छी किस्म की रूड़ी की खाद और कार्बाफिउरॉन 4 किलो प्रति एकड़ या नीम केक 8 किलो प्रति एकड़ डालें। टमाटर की फसल को बैड बनाकर लगाया जाता है, जिसकी चौड़ाई 80-90 सैं.मी. होती है। मिट्टी के अंदरूनी रोगा।

कीड़ों और जीवों को नष्ट करने के लिए मिट्टी को सूरज की किर में खुला छोड़ दें। पारदर्शी पॉलीथीन की परत भी इस काम के लिए प्रयोग की जा सकती है। यह परत सूर्य की किरों को सोखती है, जिससे मिट्टी का तापमान बढ़ जाता है और यह मिट्टी के अंदरूनी रोगा को मारने में सहायक होती है।

पौध की देख-रेख और रोपण

बुवाई से एक महीना पहले मिट्टी को धूप में खुला छोड़ दें। नर्सरी में बीजों को 1.5 सैं.मी. चौड़े और 20 सैं.मी. ऊंचे बैडों पर बोयें। बिजाई के बाद बैडों को प्लास्टिक शीट से ढक दें और फूलों को पानी देने वाले डब्बे से रोज़ सुबह बैडों की सिंचाई करें। रोगा।णओं के हमले से फसल को बचाने के लिए नर्सरी वाले बैडों को अच्छे नाइलोन के जाल से ढक दें।

बुवाई का समय

उत्तरी राज्यों में, बसंत के समय टमाटर की पौध नवंबर के आखिर में बोयी जाती है और जनवरी के दूसरे पखवाड़े में खेत में लगाई जाती है। पतझड़ के समय पौध की बिजाई जुलाई-अगस्त में की जाती है और अगस्त-सितंबर में यह खेत में लगा दी जाती है। पहाड़ी इलाकों में इसकी बिजाई मार्च-अप्रैल में की जाती है और अप्रैल-मई में यह खेत में लगा दी जाती है।

उचित दूरी

किस्म और विकास के ढंग मुताबिक 60x30 सैं.मी. या 75x60 सैं.मी. या 75x75 सैं.मी. का फासला रखें। पंजाब में छोटे कद वाली किस्म के लिए 75x30 सैं.मी. का फासला रखें और वर्षा वाले मौसम के लिए 120-150x30 सैं.मी. का फासला रखें।

बीज की गहराई

नर्सरी में बीजों को 4 सैं.मी. गहराई में बोयें और मिट्टी से ढक दें।

बीज की मात्रा

एक एकड़ में पौध उगाने के लिए 100 ग्राम बीज की मात्रा का प्रयोग करें।

बीज उपचार

फसल को मिट्टी से होने वाली बीमारियों और कीड़े मकौड़ों से बचाने के लिए बीजों को बिजाई से पहले थीरम 3 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 3 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचार करें। इसके बाद टराइकोडरमा 5 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचार करें। बीज को छांव में रख दें और फिर बिजाई के लिए प्रयोग करें।

खेत की तैयारी के समय अच्छी तैयार की हुई रूड़ी की खाद 10 टन प्रति एकड़ डालें और मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें। नाइट्रोजन 60 किलो (130 किलो यूरिया), फासफोरस 25 किलो (155 किलो एस एस पी) और पोटाश 25 किलो (45 किलो एम ओ पी) की मात्रा प्रति एकड़ में प्रयोग करें। पौध लगाने से पहले शुरूआती खुराक के तौर पर आधा हिस्सा नाइट्रोजन को और पूरा हिस्सा फासफोरस और पोटाश का डालें। पौध लगाने के 20-30 दिन बाद बाकी बची नाइट्रोजन का चौथा हिस्सा डालें। पौध लगाने के दो महीने बाद बाकी बची यूरिया डाल दें।

पौध लगाने के 10-15 दिन बाद 19:19:19 के साथ सूक्ष्म तत्वों 2.5-3 ग्राम प्रति लीटर में मिलाकर स्प्रे करें। कम तापमान के कारण पौधे तत्वों को कम सोखते हैं और इससे पौधे के विकास पर भी प्रभाव पड़ता है। इस तरह की स्थितियों में फोलियर स्प्रे पौधे के विकास में मदद करती है। शाखाएं और टहनियां निकलने के समय 19:19:19  या 12:61:00 की 4-5 ग्राम प्रति लीटर स्प्रे करें। पौधे के अच्छे विकास  और पैदावार के लिए पौध लगाने के 40-50 दिन बाद 10 दिनों के फासले पर ब्रोसिनोलाइड 50 मि.ली. प्रति एकड़ को 150 मि.ली. प्रति एकड़ को 150 लीटर पानी में मिलाकर दो बार स्प्रे करें।

अच्छी क्वालिटी और पैदावार प्राप्त करने के लिए फूल निकलने से पहले 12:61:00 मोनो अमोनियम फासफेट 10 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे करें। जब फूल निकलने शुरू हो जाएं तो शुरूआती दिनों में बोरेन 25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी की स्प्रे करें। यह फूल और टमाटर के झड़ने को रोकेगा। कईं बार टमाटरों पर काले धब्बे देखे जा सकते हैं जो कैल्शियम की कमी से होते हैं। इसको रोकने के लिए कैल्शियम नाइट्रेट 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें।

अधिक तापमान में फूल गिरते दिखें तो एन ए ए 50 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी की स्प्रे फूल निकलने पर करें। टमाटर के विकास के समय पोटाश और सलफेट की 3-5 ग्राम प्रति लीटर की स्प्रे करें। यह टमाटर के विकास और बढ़िया रंग के लिए उपयोगी होती है। टमाटर में दरार आने से इसकी क्वालिटी कम हो जाती है और मूल्य भी 20 प्रतिशत कम हो जाता है। इसे रोकने के लिए चिलेटड बोरेन 200 ग्राम प्रति एकड़ प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे फल पकने के समय करें। पौधे के विकास, फूल और फल को बढ़िया बनाने के लिए बायोज़ाइम धनज़ाइम 3-4 मि.ली. प्रति लीटर पानी की स्प्रे महीने में दो बार करें। मिट्टी में नमी बनाई रखें।

खरपतवार नियंत्रण

थोड़े थोड़े समय बाद गुडाई करते रहें और जड़ों को मिट्टी लगाएं। 45 दिनों तक खेत को नदीन रहित रखें। यदि नदीन नियंत्रण से बाहर हो जायें तो यह 70-90 प्रतिशत पैदावार कम कर देंगे। पौध लगाने के 2-3 दिन बाद फ्लूकोरेलिन 800 मि.ली. प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे बिजाई से पहले वाले नदीन नाशक के तौर पर करें। यदि नदीन जल्दी उग रहे हों तो नदीन नाशक के तौर पर सैंकर 300 ग्राम प्रति एकड़ की स्प्रे करें। नदीनों पर नियंत्रण डालने और ज़मीन का तापमान कम करने के लिए पॉलीथीन की परत का प्रयोग कर सकते हैं।

सिंचाई

सर्दियों में 6 से 7 दिनों के फासले पर सिंचाई करें और गर्मियों के महीने में मिट्टी में नमी के मुताबिक 10-15 दिनों के फासले पर सिंचाई करें। सोके के बाद ज्यादा पानी देने से टमाटरों में दरारें आ जाती हैं। फूल निकलने के समय सिंचाई महत्वपूर्णहोती है। इस समय पानी की कमी से फूल झड़ सकते हैं और फल के साथ साथ पैदावार पर भी प्रभाव पड़ता है। बहुत सारी जांचों के मुताबिक यह पता चला है कि हर पखवाड़े में आधा इंच सिंचाई करने से जड़ें ज्यादा फैलती हैं और इससे पैदावार भी अधिक हो जाती है।

हानिकारक कीट और रोकथाम

पत्ते का सुरंगी कीड़ा: यह कीट पत्तों को खाते हैं और पत्ते में टेढी मेढी सुरंगे बना देते हैं। यह फल बनने और प्रकाश संश्लेष।ा क्रिया पर भी असर करता है। शुरूआती समय में नीम सीड करनल एक्सट्रैक्ट 5 प्रतिशत 50 ग्राम लीटर पानी की स्प्रे करें। इस कीड़े पर नियंत्रण करने के लिए डाईमैथोएट 30 ई सी 250 मि.ली.या स्पीनोसैड 80 मि.ली. में 200 लीटर पानी या ट्राइज़ोफोस 200 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें।

सफेद मक्खी: यह पत्तों में से रस चूसकर पौधों को कमज़ोर बनाती है। यह शहद की बूंद की तरह के पत्तों पर काले धब्बे छोड़ती है। यह पत्ता मरोड़ बीमारी का भी कारण बनते हैं।

नर्सरी में बीजों की बिजाई के बाद, बैड को 400 मैस के नाइलोन जाल के साथ या पतले सफेद कपड़े से ढक दें। यह पौधों को कीड़ों के हमले से बचाता है। इनके हमले को मापने के लिए पीले फीरोमोन कार्ड प्रयोग करें, जिनमें ग्रीस और चिपकने वाला तेल लगा हों सफेद मक्खी को फैलने से रोकने के लिए प्रभावित पौधों को जड़ों से उखाड़कर नष्ट कर दें। ज्यादा हमला होने पर एसिटामिप्रिड 20 एस पी 80 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी या ट्राइज़ोफोस 250 मि.ली.प्रति 200 लीटर या प्रोफैनोफोस 200 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें। यह स्प्रे 15 दिन बाद दोबारा करें।

थ्रिप्स: यह टमाटरों में आम पाया जाने वाला कीट है। यह विशेष कर शुष्क मौसम में पाया जाता है। यह पत्तों का रस चूसता है, जिस कारण पत्ते मुड़ जाते हैं। पत्तों का आकार कप की तरह हो जाता है और यह ऊपर की ओर मुड़ जाते हैं। इससे फूल झड़ने भी शुरू हो जाते हैं।

इनकी गिनती देखने के लिए स्टीकी ट्रैप 6-8 प्रति एकड़ में लगाएं। इन्हें रोकने के लिए वर्टीसीलियम लिकानी 5 ग्राम प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें। यदि थ्रिप की मात्रा ज्यादा हो तो इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल /60 मि.ली या फिप्रोनिल 200 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी या फिप्रोनिल 80 प्रतिशत डब्लयु पी 2.5 मि.ली.प्रति लीटर पानी या एसीफेट 75 प्रतिशत डब्लयु पी 600 ग्राम प्रति 200 लीटर या स्पाइनोसैड 80 मि.ली.प्रति एकड़ को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फल छेदक: यह टमाटर का मुख्य कीट है। यह हेलीकोवेरपा के कारण होता है, जिसे सही समय पर यदि कंटरोल ना किया जाये तो यह 22-37 प्रतिशत तक फसल को नुकसान पहुंचाता है। यह पत्ते, फूल और फल खाता है। यह फलों पर गोल छेद बनाता है और इसके गुद्दे को खाता है।

शुरूआती नुकसान के समय इसके लारवे को हाथों से भी इकट्ठा किया जा सकता है। शुरूआती समय में HNPV या नीम के पत्तों का घोल 50 ग्राम प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें। फल बेधक को रोकने के लिए फेरोमोन कार्ड बराबर दूरी पर पौध लगाने के 20 दिनों के बाद लगाएं प्रभावित हिस्सों को नष्ट कर दें। यदि कीड़ों की गि।ाती ज्यादा हो तो सपानोसैड 80 मि.ली. + स्टिकर 400 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें। शाख और फल बेधक को रोकने के लिए कोराज़न 60 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें।

जूं: यह एक खतरनाक कीड़ा है जो 80 प्रतिशत तक पैदावार कम कर देता है। यह कीट पूरे संसार में फैला हुआ है। यह पत्तों को नीचे की ओर से खाता है। प्रभावित पत्ते कप के आकार में नज़र आते हैं। इसका हमला बढ़ने से पत्ते सूखने और झड़ने लग जाते हैं और शाखाएं नंगी हो जाती हैं।

यदि खेत में पीली जुंएं और थ्रिप का हमला देखा जाये तो क्लोफैनापियर 15 मि.ली.प्रति 10 लीटर, एबामैक्टिन 15 मि.ली.10 लीटर या फैनाज़ाकुइन 100 मि.ली.प्रति 100 लीटर असरदार सिद्ध होगा। अच्छे नियंत्रण के लिए स्पाइरोमैसीफेन 22.9 एस सी 200 मि.ली.प्रति एकड़ प्रति 180 लीटर पानी की स्प्रे करें।

बीमारियां और रोकथाम

फल का गलना: यह टमाटर की प्रमुख बीमारी है जो मौसम के परिवर्तन के कारण होती है। टमाटरों पर पानी के फैलाव जैसे धब्बे बन जाते हैं। फल गलने के कारण बाद में यह काले और भूरे रंग में बदल जाते हैं।

बिजाई से पहले बीजों को ट्राइकोडरमा 5-10 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम या थीरम 3 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचार करें। यदि खेत में इसका हमला दिखे तो प्रभावित और नीचे गिरे हुए फल और पत्ते इकट्ठे करके नष्ट कर दें। यह बीमारी ज्यादातर बादलवाइ वाले मौसम में पाई जाती है, इसे रोकने के लिए मैनकोज़ेब 400 ग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 300 ग्राम या क्लोरोथैलोनिल 250 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें। यह स्प्रे 15 दिन बाद दोबारा करें।

ऐंथ्राक्नोस गर्म तापमान और ज्यादा नमी वाली स्थिति में यह बीमारी ज्यादा फैलती है। इस बीमारी से पौधे के प्रभावित हिस्सों पर काले धब्बे पड़ जाते हैं। यह धब्बे आमतौर पर गोलाकार, पानी के साथ भीगे हुए और काली धारियों वाले होते हैं। जिन फलों पर ज्यादा धब्बे हों वे पकने से पहले ही झड़ जाते हैं, जिससे फसल की पैदावार में भारी गिरावट आ जाती है। यदि इस बीमारी का हमला दिखे तो इसे रोकने के लिए प्रॉपीकोनाज़ोल या हैक्साकोनाज़ोल 200 मि.ली.प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें।

यदि इसका हमला देखा जाये तो मैनकोज़ेब 400 ग्राम या टैबूकोनाज़ोल 200 मि.ली. प्रति 200 लीटर की स्प्रे करें। पहली स्प्रे से 10-15 दिनों के बाद दोबारा स्प्रे करें। बादलवाइ वाले मौसम में इसके फैलने का ज्यादा खतरा होता है। इसे रोकने के लिए क्लोरोथैलोनिल 250 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी की स्प्रे करें। अचानक होने वाली वर्षा भी इस बीमारी के बढ़ने में मदद करती है, इसे रोकने के लिए कॉपर वाले फंगसनाशी 300 ग्राम प्रति लीटर + स्ट्रैपटोसाइकलिन 6 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी की स्प्रे करें।

मुरझाना और पत्तों का झड़ना रू यह बीमारी नमी वाली या बुरे निकास वाली मिट्टी में होती है। यह मिट्टी में पैदा होने वाली बीमारी है। इससे तना पानी में डुबोने से मुरझाया हुआ दिखता है और मुरझाना शुरू हो जाता है। इससे पौधे निकलने से पहले ही मर जाते हैं। यदि यह बीमारी नर्सरी में आ जाये तो यह सारे पौधों को नष्ट कर देती है।

पत्तों पर धब्बे इस बीमारी से पत्तों के निचली ओर सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। यह बीमारी पौधे को भोजन के रूप में प्रयोग करती है। जिससे पौधा कमज़ोर हो जाता है। यह आमतौर पर पुराने पत्तों पर फल बनने में थोड़ा समय पहले या फल बनने के समय हमला करती है। पर यह फसल के विकास के समय किसी भी स्थिति में हमला कर सकती है। ज्यादा हमले की स्थिति में पत्ते झड़ने शुरू हो जाते हैं।

खेत में पानी ना खडा होने दें और खेत की सफाई रखें। बीमारी को रोकने के लिए हैकसा कोनाज़ोल के साथ स्टिकर 1 मि.ली.प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें। अचानक वर्षा की स्थिति में इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। धीरे-धीरे हो रहे नुकसान की स्थिति में पानी में घुलनशील सल्फर 20 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी की 2-3 बार 10 दिनों के फासले पर स्प्रे करें।

फसल की कटाई

पौध लगाने के 70 दिन बाद पौधे फल देना शुरू कर देते हैं। कटाई का समय इस बात पर निर्भर करता है कि फलों को दूरी वाले स्थानों पर लेकर जाना है या ताजे फलों को मंडी में ही बेचना है आदि। पके हरे टमाटर जिनका 1/4 भाग गुलाबी रंग का हो, लंबी दूरी वाले स्थानों पर लेकर जाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। ज्यादातर सारे फल गुलाबी या लाल रंग में बदल जाते हैं, पर सख्त गुद्दे वाले टमाटरों को नज़दीक की मंडी में बेचा जा सकता है। अन्य उत्पाद बनाने और बीज तैयार करने के लिए पूरी तरह पके और नर्म गुद्दे वाले टमाटरों का प्रयोग किया जाता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।