मटर की खेती के वैज्ञानिक तथ्य      Publish Date : 03/11/2026

        मटर की खेती के वैज्ञानिक तथ्य

                                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा

रबी सीजन में मटर की खेती किसानों के लिए अच्छी आमदनी का विकल्प बन सकती है। सही किस्म का चुनाव, खेत की तैयारी, समय पर बुवाई और बीज उपचार पर ध्यान देकर किसान बेहतर पैदावार की संभावना को काफी हद तक बढ़ा सकते हैं।

रबी के मौसम में अधिकतर किसान सब्जी की कोई ऐसी फसल लगाना चाहते हैं, जिससे अच्छी उपज मिले और बाजार में भी उसकी मांग निरंतर बनी रहे। मटर एक ऐसी ही एक फसल है। हरी मटर सब्जी के रूप में बिकती है, जबकि सूखे दानों का उपयोग दाल और दूसरे खाद्य पदार्थों के रूप में किया जाता है।

मटर की खेती का एक और अतिरिक्त लाभ है और वह यह है कि मटर एक दलहनी फसल है, जिसकी जड़ों में रहने वाले खास जीवाणु वायुमण्ड़ल से नाइट्रोजन लेकर उसे पौधों के काम आने योग्य परिवर्तित करने में मदद करते हैं, जिससे कि मटर की खेती से मिट्टी की सेहत बनाए रखने में भी लाभ मिल सकता है।

 अगर आप इस रबी सीजन में मटर की खेती करने की तैयारी कर रहे हैं, तो बुवाई से पहले कुछ जरूरी बातें जान लेना आपके लिए बहुत जरूरी है। इनमें सही समय पर खेत को तैयार करना, अच्छी गुणवत्ता वाला बीज चुनाव करना और बीज उपचार करना आदि फसल की शुरुआत से ही बेहतर बनाने में आपकी मदद कर सकता है।

मटर की खेती के लिए आवश्यक मिट्टी

मटर की अच्छी पैदावार के लिए उपजाऊ और अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है। खेत में पानी लंबे समय तक जमा रहने से मटर के पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है और इससे पौधों की बढ़वार भी प्रभावित हो सकती है।

बुवाई से पहले खेत की मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए जरूरत के अनुसार खेत की दो से तीन बार जुताई करनी चाहिए। खेत में बड़े ढेले न रहें और पिछली फसल के अवशेष तथा खरपतवार आदि को भी हटा देना चाहिए। खेत तैयार करते समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होना भी उतना ही जरूरी है।

मटर की बुवाई का उचित समय

उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में मटर की बुवाई अक्टूबर से नवंबर के महीने के दौरान की जाती है। हालांकि, सही समय मटर की उन्नत किस्म, स्थानीय मौसम और खेती के उद्देश्य पर निर्भर करता है। हालांकि अगेती किस्मों की बुवाई इससे कुछ पहले भी की जा सकती है।

बुवाई में ज्यादा देरी करने से फूल आने और फलियां बनने के समय मौसम का बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए आपको अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग की सलाह के अनुसार बुवाई का समय निर्धारित करना चाहिए।

मटर के बीज की मात्रा प्रति हेक्टेयर

मटर की खेती में बीज की मात्रा किस्म, दानों के आकार, बीज के अंकुरण और बुवाई के समय के अनुसार बदलती है। सामान्य मार्गदर्शन के तौर पर कई परिस्थितियों में एक हेक्टेयर खेत के लिए लगभग 70 से 80 किलोग्राम बीज की आवश्यकता हो सकती है।

यह मात्रा हर किस्म और हर खेत के लिए एक जैसी नहीं होती। इसलिए बीज खरीदने से पहले उसकी किस्म की जानकारी लें और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार बीज की मात्रा का निर्धारण करना उचित रहता है।

मटर की बुवाई कतारों में करने से निराई-गुड़ाई, सिंचाई और फसल की देखभाल करना आसान रहता है। पौधों के बीच उचित दूरी रखने से उन्हें बढ़ने के लिए पर्याप्त स्थान प्राप्त होता है।

बीज का उपचार

मटर की बुवाई से पहले बीज उपचार करना फसल की अच्छी शुरुआत के लिए सबसे पहला और उपयोगी हो सकता है। इससे बीज और शुरुआती पौधों में कुछ रोगों का खतरा कम करने में मदद मिलती है।

मटर की खेती में राइजोबियम कल्चर का उपयोग भी किया जा सकता है। इसमें कई ऐसे लाभकारी जीवाणु होते हैं, जो मटर की जड़ों में गांठें बनाने और हवा की नाइट्रोजन को पौधों के उपयोग योग्य बनाने में मदद करते हैं।

बीज उपचार करते समय इन बातों का ध्यान रखें-

  • अपनी मटर की किस्म और क्षेत्र के अनुसार उपयुक्त राइजोबियम कल्चर चुनें।
  • कल्चर के पैकेट पर लिखी मात्रा और इस्तेमाल करने का तरीका अपनाएं।
  • यदि बीज को फफूंदनाशक से भी उपचारित करना है, तो दोनों उत्पादों को इस्तेमाल करने का सही क्रम किसी अनुभवी या कृषि विशेषज्ञ से पूछें।
  • उपचारित बीजों को तेज धूप में न रखें और निर्देशों के अनुसार समय पर बुवाई करें।

ध्यान रखें: राइजोबियम कल्चर की मात्रा उत्पाद के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए अनुमान से मात्रा तय करने के बजाय पैकेट पर दिए निर्देशों का पालन करना सुनिश्चित् करें।

मटर की फसल में अच्छी बढ़वार के उपाय

मटर की अच्छी पैदावार के लिए केवल अच्छा बीज खरीदना काफी नहीं है। बुवाई के बाद फसल की नियमित देखभाल भी जरूरी है।

सिंचाईः खेत में जरूरत के अनुसार नमी बनाए रखें। बहुत ज्यादा पानी जमा होने से भी खेत को बचाएं।

खरपतवार नियंत्रणः खेत में अनचाही घास और खरपतवार को समय समय पर हटाते रहें, ताकि वे मटर के पौधों से पानी और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा न कर सकें।

खाद और उर्वरकः मिट्टी की जांच के आधार पर खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल करें। बिना जरूरत ज्यादा मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करने से बचें।

कीट और रोग की पहचानः पत्तियों पर धब्बे, पौधों का मुरझाना या कीटों के लक्षण दिखाई दें, तो पहले समस्या की सही पहचान करें। इसके बाद ही उचित उपाय अपनाएं।

फूल और फलियां बनने का समयः इस अवस्था में फसल पर विशेष ध्यान देना चाहिए। मिट्टी में नमी की कमी या अधिकता से भी बचाना बहुत जरूरी है।

मटर की खेती से मिट्टी को मिलने वाले लाभ

मटर एक दलहनी फसल है। इसकी जड़ों में राइजोबियम जीवाणुओं की मदद से नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया होती है। इससे मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और फसल चक्र को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, अगली फसल को कितना लाभ मिलेगा, यह मिट्टी की स्थिति, मटर की फसल की बढ़वार और खेत में फसल के अवशेषों के प्रबंधन पर निर्भर करता है। इसलिए मटर को मिट्टी की सेहत सुधारने का एक उपयोगी विकल्प माना जा सकता है, लेकिन इसे खाद और उर्वरक की हर जरूरत का पूरा विकल्प नहीं समझना चाहिए।

किसानों के लिए एक जरूरी सलाह

किसान भाइयों, अगर आप भी इस रबी सीजन में मटर की खेती करना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने क्षेत्र के लिए उपयुक्त किस्म चुनें। इसके बाद सही समय पर बुवाई करें, बीज की मात्रा का ध्यान रखें और बीज उपचार के लिए कृषि विशेषज्ञ की सलाह लें।

खेत की अच्छी तैयारी, संतुलित सिंचाई और समय पर फसल की देखभाल से बेहतर पैदावार की संभावना बढ़ सकती है। मटर की वास्तविक उपज मौसम, मिट्टी, किस्म और खेती के तरीके पर निर्भर करती है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।