
मूली की खेती वैज्ञानिक विधि से करे किसान Publish Date : 19/10/2026
मूली की खेती वैज्ञानिक विधि से करे किसान
प्रो0 आर. एस. सेंगर, डॉ0 शालिनी गुप्ता एवं गरिमा शर्मा
मूली की उन्नत खेती के लाभः
मूली की फ़सल कम समय में अधिक पोषण प्रदान करने वाली फ़सल है। वैसे तो मूली की जैविक कृषि की खेती की जाती है लेकिन इसकी खेती मुख्य रूप से रबी के मौसम में की जाती है। मूली का उपयोग कच्चे खीरे के साथ-साथ सब्जी बनाने के अलावा अचार बनाने के लिए भी किया जाता है। मूली का सेवन करने से पेट में कब्ज और गैस आदि की समस्या नहीं होती है। पथरी की बीमारी में भी इसका सेवन अच्छा माना जाता है।
भारत में मूली की खेती मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार, पंजाब, असम, हरियाणा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है। इसके अलावा अन्य कई राज्यों में भी मूली की खेती की जाती है। अगर इसकी खेती सही तरीके से की जाए तो इससे बेहतर निर्माण के साथ भारी मुनाफा भी कमाया जा सकता है। बता दें कि बड़े-बड़े होटलों और ढाबों पर सलाद के रूप में उपयोग किए जाने के चलते, बाजार में मूली की मांग हमेशा ही बनी रहती है।
मूली की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी

मूली की खेती के लिए के इसका वानस्पतिक विकास अच्छा रहना चाहिए है। मूली की खेती के लिए 10 से 15 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान की आवश्यकता होती है। हालांकि आजकल मूली की खेती पूरे साल की जाने लगी है। वैसे भी अधिक तापक्रम मूली की फसल के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। अधिक तापमान होने से मूली की जड़ें और इसकी पत्तियाँ कड़वी हो जाती है। अब बात करें इसकी खेती के लिए मिट्टी या भूमि की तो इसकी खेती के लिए जीवांश दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है। मूली की खेती के लिए मिट्टी का पी.एच. मान 6.5 के आसपास होना चाहिए।
मूली की बुवाई का उचित समय
मूली की खेती मैदानी और पहाड़ी क्षेत्र दानों में ही की जाती है। देश के मैदानी भागों में इसकी बुवाई का उचित समय सितंबर से जनवरी तक माना जाता है। जबकि पर्वतीय क्षेत्र में इसकी बुवाई अगस्त माह तक जाती है।
किस्मों के अनुसार बुवाई
मूली की कुछ किस्मों की बुवाई अलग-अलग समय की जाती हैं। जिसमें पूसा हिमानी किस्म की बुवाई का सही समय दिसंबर से फरवरी तक का होता है और पूसा चेतकी किस्म की बुवाई का सही समय मार्च से मध्य अगस्त महीने तक हो सकता है।
खेत की तैयारी
मूली की रोपाई से पहले खेत को भलीभंती तैयार कर लेना चाहिए। खेत की तैयार के लिए खेत की पांच से छह बार जुताई कर लेनी चाहिए। बता दें कि मूली की फसल के लिए गहरी जुताई की आवश्यकता होती है क्योंकि इसकी जड़ों की भूमि में गहराई तक जाने वाली मिट्टी की खेती के लिए गहरी जुताई की आवश्यकता होती है। इसके बाद दो बार कल्टीवेटर से जुताई करनी चाहिए और इसके बाद खेत को समतल करने के लिए पाटा लगा दिया जाना चाहिए।
मूली की खेती में खाद एवं पोषण प्रबन्धन
मूली की अच्छी वृद्वि के लिए 200 से 250 क्विंटल अच्छी तरह से सडी हुई गोबर की खाद खेत की तैयारी समय पर खेत की मिट्टी में मिलाना आवश्यक है। इसी के साथ 80 गंधक, 50 फॉस्फोरस और 50 प्रतिशत पोटाश तत्व के रूप में प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करना चाहिए। फॉस्फोरस एवं पोटाश की कुल मात्रा बुवाई के समय तथा नाइट्रोजन की कुल मात्रा को दो बार में दी जानी चाहिए। जिसमें 1/4 मात्राओं की मात्रा निर्धारित की जाती है और 1/4 मात्रा की पहली मात्रा के रूप में निर्धारित की जाती है।
मूली की अच्छी फसल के लिए उन्नत कृषि कार्य
मूली की उत्तम खेती के लिए उन्नत किस्मों का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्नत किस्मों के माध्यम से बेहतर और स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद प्राप्त किए जा सकते है। मूली की कुछ उन्नत किस्मों में कुछ काफी विशिष्ट है जिसमें जापानी सफेद, पूसा देशी, पूसा चेतकी, अरका निशांत, जंबली, बॉम्बे रेड, पूसा रेशमी, पंजाब अगेती, पंजाब सफेद, आई.एच. आर1-1 एवं कल्याणपुर सफेद अच्छा मोती है। वहीं शीतोष्ण एंटीबायोटिक के लिए रैपिड रेड, ह्वाइट टिप्स, स्कारलेट ग्लोब और पूसा हिमानी आदि किस्मों का बीज भी अच्छी तरह से उपलब्ध होता है।
मूली के बुवाई करने की विधि
मूली के बीजों की बुवाई मेड़ों तथा समतल क्यारियों में भी की जाती है। बेसहारा का समय पंक्ति से पंक्ति या मेडो से मेडो की दूरी 45 से 50 से 20 से 25 से 25 तक की दूरी होनी चाहिए। अन्य उपचारों की दूरी 5 से 8 तक होती है। मूली की किस्मों के बीज की बुवाई 3 से 4 सेमी. की गहराई पर करनी चाहिए।
बीज उपचार
कच्चे माल से पहले मूली के बीज का उपचार करना अत्यंत आवश्यक है ताकि मूली के बीज से इसे तैयार किया जा सके। इसके लिए 10 से 12 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज बुवाई के लिए र्प्याप्त होता है। मूली के बीज का शोधन 2.5 ग्राम थाई से एक रिज बीज की कीमत का उपचार करना चाहिए। या फिर 5 लीटर गौमूत्र प्रतिकिलो बीज के खाते से बीजोपचार का उपयोग किया जा सकता है।
मूली की खेती में नियोजन व्यवस्था
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मूली फ़सल में पहली सीलान तीन चार पत्ती आने की अवस्था पर कर-व्यवसाय करना चाहिए। मूली की व्यवस्था व्यवस्था भूमि का हिसाब से करना चाहिए। यह कम मात्रा में हो सकता है।
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समय सीमाः सर्दियों में 10 से 15 दिन तक इसकी बहाली की जा सकती है। वहीं, गर्मियों में प्रति सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता होती है।
मुली में खरपतवारों को नियंत्रित करने के उपाय
मूली की खेती में खरपतवार की समस्या भी रहती है। इसे नियंत्रित करने के लिए फसल की 2 से 3 बार निराई-गुड़ाई की जानी चाहिए। वहीं जब इसकी जड़ों की वृद्धि शुरू हो जाए तो एक बारमेडर्स पर मिट्टी जरूर चढ़ानी चाहिए। 2 से 3 दिन के अंदर 3.3 किलो पेंडामेथलीन 600 से 800 किलो पानी के साथ ग्लूकोज़कर प्रति हेक्टेयर की दर से 2 से 3 दिन के भीतर 3.3 किलोलीटर पेंडामेथलीन 600 से 800 किलो ग्राम पानी के साथ नारियल तेल के लिए कच्चे तेल का प्रयोग करना चाहिए।
मूली में रोग प्रबंधन
मूली की फसल पर विभिन्न रोगों का खतरा मंडराता रहता है। इन रोगों में व्हाईट रस्ट, सरकोस्पोरा कैरोटी, पीला रोग, अल्टरनेरिया पर्ण, अंगमारी रोग प्रमुख हैं। इन रोगों पर नियंत्रण के लिए ग्रैन्यूल नेक्स्ट ड्रग डाईथेन एम 45 या जेड 78 का 0.2 प्रतिशत नासा से छिड़काव करना चाहिए या फिर 0.2 प्रतिशत ब्लाइटेक्स का छिड़काव भी किया जा सकता है।
मूली की फसल के प्रमुख कीट
मूली की फसल में कई प्रकार के कीट लग सकते हैं। इससे उत्पाद में कमी आ सकती है। इसलिए इन कीटों पर समय के रहते नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक है। मूली में मुख्य रूप से मांहू, मूंगी, बालदार कीड़ा, अर्धगोलाकार सुंडी, आरा मक्खी, डायमंड बकटाम कीट का प्रकोप अधिक रहता है। हानिकारक कीटों की रोकथाम के लिए मैलाथियन 0.05 प्रतिशत और 0.05 प्रतिशत डाइक्लोरवास का प्रयोग किया जाना चाहिए। रोग नियंत्रण और कीट नियंत्रण के बारे में बताएं, सभी औषधियों का प्रयोग किसी अनुभवी व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए।
मूली की फसल की कटाई
मूलतः मूली की फसल 40 से 50 दिन में तैयार हो जाती है। जब मूली छोटी अवस्था में हो तब इसकी कटाई नहीं करनी चाहिए। जब तक ये आकार सही आकार में नहीं है तब तक इसे काटना नहीं चाहिए। साथ ही इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि जब आप मूली की जड़ पूरी तरह से विकसित हो जाए तो उसकी कटिंग शुरू कर देनी चाहिए।
मूली का प्रति हेक्टेयर उत्पादन
मूली की खेती के सही तरीके से उसके उत्पाद या निर्माण की मात्रा का पता चलता है। हालाँकि यूरोपीय परिस्थितियों में 80-100 क्विंटल और एशियाई परिस्थितियों में 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक का उत्पादन किया जा सकता है।
मूली की खेती से प्राप्त मुनाफ या लाभ
किसान क्षेत्रीय मंडियों में मूली का मूल्य निर्धारण कर सकते हैं। इसके अलावा शहर के मल्टीपल स्टोर में मूली बेचा जा सकता है। आजकल शहरों में सुपरमार्केट और मॉल्स की ग्रेवी की दुकानों में भी बेची जा सकती हैं, शहरों द्वारा सब्जियों की पूर्ति की जाती है। ऐसे पावर स्टोर में मूली को बेचकर किसान अच्छा लाभ कमा सकते हैं। आम तौर पर मूली का भाव 500 से 1200 रुपये प्रति क्विंटल तक मिल जाता है। यदि सामान्य रूप से खेत से 150 से 200 प्रति एकड़ का भी प्राप्त होता है तब भी किसान मूली की खेती से कम से कम एक लाख रुपये की प्रति हेक्टेयर तक की आय आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।