
गाजर की खेती, उन्नत किस्में एवं कृष्य क्रियाएं Publish Date : 16/08/2026
गाजर की खेती, उन्नत किस्में एवं कृष्य क्रियाएं
प्रो0 आर. एस. सेंगर, डॉ0 रेशु चौधरी एवं गरिमा शर्मा
गाजर, एक प्रमुख सब्जी की फसल होने के साथ ही साथ विभिन्न औषधीय गुणों से भी भरपूर होती है। गाजर का सेवन करने से पेट और नसों से जुड़ी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। साथ ही गाजर का नियमित रूप से सेवन करने से आँखों की समस्या और लिवर की समस्याओं से भी राहत प्राप्त होती है। गाजर विटामिन सी का एक अच्छा एवं प्राकृतिक सा्रोत होता है।
ऐसे में अगर आप गाजर की खेती करना चाहते हैं तो आप इसकी खेती कर अच्छा लाभ अर्जित कर सकते हैं। गाजर की बुवाई के लिए सबसे अधिक उचित समय अक्टूबर से नवंबर के महीने का माना जाता है। इसके अतिरिक्त गाजर की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खेत की तैयारी से लेकर सही बीज और खाद का उपयोग करना भी आवश्यक होता है।
खेत की तैयारीः
गाजर की बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह से दो-तीन जुताई कर मिट्टी को नरम और भुरभुरा बना लेना चाहिए। गाजर की अच्छी जड़ों के विकास के लिए खेत की मिट्टी का भुरभुरी बहुत जरूरी होता है। इससे गाजर की फसल में जड़ों का विकास अच्छा होता है और पैदावार में भी बढ़ोत्तरी होती है।
गाजर की उन्नत किस्में:
गाजर की किस्मों के एशियन वर्ग में पूसा केयर, पूसा मेधाली, पूसा रुधिरा, पूसा आसिता, पूसा वृष्टि, पूसा नयन ज्योति, सेलेक्शन-223, नंबर-29 और हिसार सेलेक्शन आदि गाजर की प्रमुख किस्में हैं। वहीं इसके यूरोपीय वर्ग में लेन्टस, चौण्टने, इम्पेरेटर और पूसा यमदाग्नि जैसी अच्छी किस्में मानी जाती हैं।
बीज की मात्रा और दूरीः
आमतौर पर, गाजर की बुवाई के लिए 5-6 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त रहता है। गाजर की बुवाई करने के दौरान कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी करीब 10 सेंटीमीटर रखना उचित माना जाता है।
खाद मात्रा और सिंचाईः
गाजर की फसल में 25 टन गोबर की खाद के साथ 130 किलो यूरिया, 250 किलो सिंगल सुपर फास्फेट और 200 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना गाजर की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए उचित रहता है। इसी प्रकार से गाजर की फसल में आवश्यकता के अनुसार 5-7 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए और खेत में नमी का उचित स्तर बनाए रखना चाहिए।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
