
भिंडी में लगने वाले प्रमुख कीट, रोग एवं उनकी रोकथाम Publish Date : 19/07/2026
भिंडी में लगने वाले प्रमुख कीट, रोग एवं उनकी रोकथाम
प्रो0 आर. एस. सेंगर, डॉ0 शालिनी गुप्ता एवं गरिमा शर्मा
भिंडी महत्वपूर्ण सब्जी है, हमारे विश्व भर में उगाई जाती है और यह फसल कीटों, रोगों से प्रति संवेदनशील होती है, इसमें कीट जैसे सफेद मक्खी, एफिड्स (माहू), फल छेदक जैसे कीट और रोग आर्द्रपतन/पौध गलन रोग, पीला शिरा मोजेक, जड़ गलन रोग आदि रोग प्रमुख है। भिंडी की फसल को दुनिया भर में कई कीटों से खतरा होता है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं: रस चूसक कीट (जैसे माहू, सफेद मक्खी, हरा तेला), फल और तना छेदक, और पत्ती सुरंगक आदि कीट। ये कीट पत्तियों, तनों, फूलों और फलों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे उपज में कमी आती है। भिंड़ी के विभिन्न रोग जैसे-
पीला शिरा मोजेक वायरसः यह रोग सफेद मक्खियों द्वारा फैलता है और पत्तियों पर पीले धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में फल तक भी फैल सकते हैं। इससे पौधों का विकास रुक जाता है और उपज कम हो जाती है। पाउडरी मिल्ड्यू रोग में पत्तियों और तनों पर सफेद चूर्णी धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में पत्तियां पीली होकर झड़ने लगती हैं।
आर्द्रगलन रोगः इस रोग में पौधों का तना काला होकर सड़ने लगता है, जिससे पौधे कमजोर होकर सूख जाते हैं, जड़ गलन रोग में पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं, जिससे पत्तियां पीली हो जाती हैं और पौधा अंततः मर जाता है।
भिंड़ी के प्रमुख कीटः
1. एफिड्स (माहू):
कीट की पहचानः भिंडी में एफिड्स (माहू) छोटे, नरम शरीर वाले, नाशपाती के आकार के कीट होते हैं जो आमतौर पर पत्तियों के नीचे और तनों पर पाए जाते हैं। ये हरे, पीले, भूरे, लाल या काले रंग के हो सकते हैं, और पंख वाले या पंखहीन हो सकते हैं। एफिड्स पौधों का रस चूसते हैं, जिससे पत्तियों का पीला पड़ना, मुड़ना, और विकृत होना, विकास रुकना, और चिपचिपा हनीड्यू का उत्पादन होता है।
फसल में क्षति की प्रकृतिः भिंडी की फसल में एफिड्स (माहू) कीट, पत्तियों और तनों से रस चूसकर नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे पत्तियां पीली होकर मुरझा जाती हैं और पौधा कमजोर हो जाता है। गंभीर संक्रमण में, पत्तियां मुड़ सकती हैं और पौधे का विकास रुक सकता है।
रोकथाम:
-
माहू कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों ही भिंडी के पौधों के कोमल भागों, फूलों-पत्तियों से रस चूसते है।
-
परिणामस्वरूप पौधों की बढ़वार रूक जाती है, पत्तियाँ मुरझा जाती है तथा पीली पड़ जाती है, अधिक आक्रमण पर तो पत्तियाँ गिर भी जाती है।
-
संक्रमित भाग पर ये कीट एक लसलसा पदार्थ भी स्त्रावित करते है, जिससे फफूंद का आक्रमण बढ़ जाता है।
-
इस कीट का नियंत्रण करने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 70.00 प्रतिशत डब्ल्यूजी / 14 ग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।
-
प्रति एकड़ खेत में 5 से 6 पीली स्टिकी ट्रैप लगाएं।
सफेद मक्खीः

कीट की पहचानः सफेद मक्खी कीट की पहचान करने के लिए, आपको पौधों की पत्तियों के नीचे की ओर ध्यान से देखना होगा। वयस्क सफेद मक्खियाँ छोटे, सफेद, पंखों वाले कीट होते हैं जो पतंगों की तरह दिखते हैं। यह पत्तियों से रस चूसते हैं और पत्तियों पर शहद जैसा पदार्थ छोड़ते हैं, जिससे पौधों पर काली फफूंदी लग सकती है, इनके पंख पाउडर जैसे पदार्थ से ओतप्रोत होते हैं।
फल छेदक कीटः
कीट की पहचानः भिंडी में फल छेदक कीट की पहचान करने के लिए, आपको फलों पर छोटे छेद और विकृति पर ध्यान देना होगा। इसके अलावा, कीट के अंडे और लार्वा (सुंडी) भी देखे जा सकते हैं। भिंडी में फल छेदक कीट की पहचान के लिए, आपको तने और फलों में छेद देखने होंगे, साथ ही मुरझाई हुई और सूखी हुई शाखाएं और फल भी देखने होंगे। यह कीट, जिसे फल और तना छेदक कीट भी कहा जाता है, भिंडी की फसल को बहुत नुकसान पहुंचाता है।
क्षति की प्रकृतिः
भिंडी का यह कीट भिंड़ी की फसल को सबसे ज्यादा वर्षा ऋतु में नुकसान पहुंचाता है। शुरूआती अवस्था में इल्ली कोमल तने में छेद करके खा जाती है और जिससे तना सूख जाता है। यदि फूलों की अवस्था पर आक्रमण होने पर फल लगने से पहले ही फूल गिर जाता है। जब फल अवस्था में यह इल्ली प्रकोप करती है तो फलो में छेदकर गूदे को खा जाती है।
कीट की रोकथामः
-
भिंडी में फल छेदक कीट की रोकथाम के लिए, आप इमामेक्टिन बेंजोएट 5 प्रतिषत एसजी या क्लोरेंट्रानिलिप्रोएल 18.5 एससी का उपयोग कर सकते हैं।
-
इमामेक्टिन बेंजोएट 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें, और क्लोरेंट्रानिलिप्रोएल 0.4 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
-
संक्रमित फलों और टहनियों को इकट्ठा करके नष्ट करना भी महत्वपूर्ण है, और फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करके कीटों की संख्या को कम किया जा सकता है।
आर्द्रपतन/पौध गलन रोगः
रोग की पहचानः भिंडी में आर्द्रपतन या पौध गलन रोग की पहचान करने के लिए, पौधों के तने के आधार पर सड़न और कमजोरी पर ध्यान देना चाहिए, जो आमतौर पर मिट्टी की सतह के पास होता है। रोगग्रस्त पौधे पीले पड़कर मुरझा जाते हैं और अंततः गिर जाते हैं।
क्षति की प्रकृतिः भिंडी में आर्द्रपतन या पौध गलन रोग, एक फफूंद जनित रोग है जो पौधों को अंकुरण से पहले या बाद में प्रभावित करता है, जिससे पौधे मर जाते हैं। यह रोग आमतौर पर ठंडे, नम और अधिक नमी वाले वातावरण में पनपता है।
रोकथामः
-
प्रत्येक वर्ष खेत बदल कर भिंडी की बुवाई करना चाहिए एवं भूमि का सौरीकरण करना चाहिये।
-
भिंडी में आवश्यकता से अधिक सिंचाई नहीं करनी चाहिए।
-
थियोफैनेट मिथाइल 450 ग्राम/एल पायराक्लोस्ट्रोबिन 50 ग्राम/एल डब्ल्यू/वी एफएस/30 ग्राम प्रति 500 लीटर पानी के साथ पौध उगने के बाद प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना उचित है।
-
भिंडी की फसल में ठण्डे व वर्षा वाले मौसम, बादल, अधिक नमी एवं नम व कठोर मिट्टी में यह समस्या अधिक आती है। इस रोग से ग्रसित पौधे में जमीन के सतह से आक्रमण होता है।
पीला शिरा मोजेकः
रोग की पहचानः भिंडी में पीला शिरा मोजेक रोग की पहचान पत्तियों पर पीले धब्बे या शिराओं के पीला पड़ने से की जा सकती है। इसके अलावा, पत्तियों का मुड़ना, सिकुड़ना, और फलों का पीला और सख्त होना भी इस रोग के प्रमुख लक्षण होते हैं।
क्षति की प्रकृतिः पत्तियों की क्षति के कारण पौधे की वृद्धि रुक जाती है, फलों की सड़न के कारण उनकी गुणवत्ता और उपज में कमी आती है, रोग के कारण फल खाने योग्य नहीं रहते हैं, यह एक गंभीर बीमारी है जो बैंगन के फलों को बिक्री के योग्य नहीं बनने देता है।
रोकथामः
-
गर्मियों के दौरान अतिसंवेदनशील किस्मों का प्रयोग करने से बचें, क्योंकि इस मौसम में सफेद मक्खी की गतिविधि अधिक होती है।
-
अमोनियायुक्त नाइट्रोजन उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से बचें, क्योंकि इससे पौधों में वायरल संक्रमण की आशंका बढ़ सकती है।
-
डायफैनथीयुरॉन 50 प्रतिशत डब्ल्यू पी की 250 ग्राम मात्रा या पायरीप्रोक्सीफैन 10 प्रतिशत के साथ बॉयफैनथ्रिन 10 प्रतिशत ईसी0 की 250 मिलीलीटर मात्रा का छिड़काव भी सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए जा सकता है।
-
इसको नियंत्रित करने के लिए तपस यलो स्टिकर ट्रैप 4 - 6 प्रति एकड़ की दर से लगाए।
पाउडरी मिल्ड्यू रोगः
रोग की पहचानः भिंडी में पाउडरी मिल्ड्यू रोग की पहचान पत्तियों और तनों पर सफेद, चूर्ण जैसे धब्बों से की जा सकती है। यह रोग फफूंद के कारण होता है और पत्तियों की ऊपरी सतह पर आमतौर पर पहले दिखाई देता है, लेकिन यह नीचे की तरफ भी फैल सकता है। संक्रमित पत्तियां पीली होकर मुड़ सकती हैं और सूखकर गिर सकती हैं। गंभीर मामलों में, पूरे पौधे पर सफेद पाउडर जैसा आवरण दिखाई दे सकता है।
क्षति की प्रकृतिः भिंडी में पाउडरी मिल्ड्यू रोग, पत्तियों, तनों और फलों पर सफेद पाउडर जैसे फफूंद का विकास होता है। इससे पत्तियां पीली होकर गिर सकती हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है और फल उत्पादन भी कम हो सकता है।
रोकथामः
-
इस रोग के नियंत्रण के लिए थायोफिनेट 70% WP से 250-600 ग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।
-
रासायनिक उपचार में हेक्साकोनोजोल 5 प्रतिशत ईसी की 1.5 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करे। 200 मिली/एकड/200 लीटर पानी को 500 ग्राम/एकड़ के हिसाब से 150 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कररना चाहिए।
-
इसके अलावा इसमें हेक्साकोनाजोल 5 प्रतिशत एस.सी प्रति एकड़ 200-250 मिली. लीटर से छिड़काव करना चाहिए।
जड गलन रोगः
रोग की पहचानः भिंडी में जड़ गलन रोग की पहचान के लिए, पौधों को उखाड़कर इनकी जड़ों को देखना चाहिए। यदि जड़ें काली पड़ गई हैं और पौधा पीला होकर मुरझा रहा है, तो यह जड़ गलन रोग का लक्षण हो सकता है। इसके अतिरिक्त, पत्तियों पर पीलापन और पौधों का मुरझाना भी इस रोग के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं।
क्षति की प्रकृतिः भिंडी में जड़ गलन रोग से पौधों की जड़ें काली पड़ जाती हैं और वे पोषक तत्वों को अवशोषित करने में असमर्थ हो जाती हैं, जिससे पौधे पीले होकर मुरझाने लगते हैं और अंततः मर जाते हैं।
रोकथामः
-
इस रोग के नियंत्रण के लिए फसल की बुवाई से पूर्व कार्बेनडाजिम 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करना चाहिए।
-
इस रोग से प्रभावित पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे पौधे पीले होने लगते हैं। इस रोग से पौधों को बचाने के लिए बुवाई से पहले प्रति किलोग्राम बीज को 2 ग्राम बाविस्टीन से उपचारित करना उचित है। खेत में खरपतवार का उचित प्रबंधन रखें। खेत में जल निकास का प्रबंध रखें तथा अधिक सिंचाई से बचें।
-
इसके अलावा, सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ई.सी. का 300 से 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से 200-300 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
