कद्दूवर्गीय सब्जियों में समन्वित कीट एवं रोग प्रबंधन      Publish Date : 06/06/2026

कद्दूवर्गीय सब्जियों में समन्वित कीट एवं रोग प्रबंधन

                                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा

कद्दूवर्गीय सब्जियों को मानव आहार का एक अभिन्न अंग माना गया है। एक आदमी को रोजाना 300 ग्राम सब्जियां खानी चाहिए, परन्तु भारत में इसका 1/9वां भाग ही मिल पाता है। कद्दूवर्गीय सब्जियों की उपलब्धता साल में आठ से दस महीने तक निरंतर बनी रहती है। इसका उपयोग सलाद रूप में (खीरा, ककड़ी), पकाकर सब्जी के रूप में (तोरई, करेला, परवल) मीठे फल के रूप में (तरबूज व खरबूजा) मिठाई बनाने में (पेठा, परवल, लौकी) अचार बनाने में (करेला) प्रयोग किया जाता है। इन सब्जियों में विभिन्न प्रकार के कीट व रोगों, सूत्रकृमियों एवं खरपतवारों के कारण लगभग 30 प्रतिशत नुकसान होता है।

इस वर्ग की सब्जियों में लगने वाले प्रमुख कीट व रोग तथा उनका प्रबंधन निम्न प्रकार से है।

कद्दूवर्गीय सब्जियों के प्रमुख कीटः

                                  

लालभृंग कीटः

यह चमकीले लाल रंग का कीट पौधे की पत्तियों को विशेषकर पौधों की प्रारम्भिक अवस्था में खाकर छलनी जैसा बना देता है। ग्रसित पत्तियाँ फट जाती हैं तथा पौधों की बढ़वार रूक जाती है।

कीट का नियंत्रणः इस कीट द्वारा होने वाले नुकसान से बचने हेतु फसल की बुवाई नवम्बर में करें। खरपतवारों को नष्ट कर खेत को स्वच्छ रखें । मैलाथियान 5 प्रतिशत दवा 20-25 किग्रा प्रति हेक्टर भूमि में मिलायें। इसके लिए कार्बोरिल 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना प्रभावी रहता है।

कटवर्म:-

यह कीट नन्हें या उगने वाले पौधों के बीज पत्रों तथा पौधों के शीर्ष को काट देते है जिससे खेत में पौधों की संख्या कम हो जाती है।

कीट का नियंत्रणः ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई कर कीट की निष्क्रिय अवस्थाओं को नष्ट कर दें। इसके नियंत्रण के लिए बीजों की बुवाई के समय या पौध रोपाई के समय कार्बोफ्यूरॉन 3 जी 25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में मिलायें।

ब्लीस्टर बीटलः-

यह आकर्षक चमकीले रंग तथा बड़े आकार का भृंग है। इसके पंखों पर तीन काले व तीन पीले रंग की पट्टियाँ होती हैं। यह पुष्पीय कलियों व फूलों को खाकर नष्ट कर देते हैं।

कीट का नियंत्रणः खेत में इनकी संख्या कम होने पर इन्हें हाथ से पकड़कर नष्ट कर देते हैं। अधिक प्रकोप होने पर 0.2 प्रतिशत कार्बोरिल का छिड़काव करें।

लीफ माइनरः-

यह कीट पत्तियों के ऊपरी भाग पर टेढे-मेढ़े भूरे रंग की सुरंग बना देते है।

कीट का नियंत्रणः इसके नियंत्रण हेतु नीम के बीजों का सत 5 प्रतिशत या ट्रायोफॉस 0.5 प्रतिशत का तीन सप्ताह के अंतराल पर छिड़काव करें।

फल मक्खीः-

यह कद्दूवर्गीय सब्जी फसलों में फल पर आक्रमण करने वाला एक प्रमुख कीट है। इसके मैगट छोटे फलों में अधिक नुकसान करते है। इसके मैगट पर सीधा नियंत्रण संभव नहीं है परन्तु वयस्क नर मक्खियों की संख्या पर नियंत्रण करने इनके प्रकोप को कम किया जा सकता है।

कीट का नियंत्रणः इसके नियंत्रण हेतु रात के समय खेत में प्रकाश पाश लगायें तथा नर वयस्कों को फेरोमेन ट्रेप लगाकर नियंत्रित करें। थायोडॉन को 6 मिली प्रति लीटर 4-5 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। कीट की निगरानी हेतु फसल में गंध पाश 2 प्रति एकड़ जमीन आवश्यकता अनुसार लगायें।

चैंपाः-

ये छोटे आकार के काले एवं गहरे हरे रंग के कीट होते हैं। ये कोमल पत्तियों व पुष्प कलिकाओं का रस चूसते हैं। यह कीट वायरस जनित बीमारियों के वाहक का कार्य करता है।

नियंत्रणः इसके नियंत्रण हेतु डाइमिथिएट या फॉस्फोमिडॉन 0.5 प्रतिशत के घोल का 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

लाल मकड़ीः-

यह कीट भूरा, हल्का लाल रंग का होता है। जो पत्तियों की निचली सतह पर उत्तकों को खाकर जालीनुमा बना देता हैं। पर्णहरित के अभाव में प्रकाश संश्लेषण कम होता है। फलस्वरूप उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

नियंत्रणः लाल मकड़ी के नियंत्रण हेतु डाईकोफॉल 18.5 ईसी. 2.5 मिली दवा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

जड़ गांठ सूत्रकृमिः-

यह पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचाता है। प्रभावित पौधा कमजोर होकर पीला पड़ जाता है तथा पौधे का विकास अवरूद्ध होकर फलन नहीं हो पाता है।

नियंत्रणः लम्बे समय तक फसल चक्र अपनायें। मई-जून माह में खेत की गहरी जुताई कर खुला छोड़ दें। नेमागॉन अथवा कार्बोफ्यूरॉन 3जी 25 किग्रा प्रति हेक्टर बुवाई पूर्व भूमि में मिला दें।

कद्दूवर्गीय सब्जियों की प्रमुख व्याधियाँ रोग

फ्यूजेरियम उखटाः

यह रोग एक मृदा जनित फफूंद फ्यूजेरियम स्पीसीज से होता है। इससे प्रभावित पौधा मुरझाकर सूख जाता है। पौधे की जडें़ व भीतरी भाग भूरा हो जाता है तथा पौधे की वृद्धि रूक जाती है। स्पष्ट लक्षण फूल आने व फल बनने की अवस्था में दिखाई देते है।

रोकथामः

  • रोगरोधी किस्मों की बुवाई करें।
  • भूमि सौर्यीकरण करने पर भी बीमारी को कम कर सकते है।
  • बुवाई से पूर्व बीज के बाविस्टीन (1-2 किग्रा) से उपचारित करें तथा बीमारी आने के बाद ड्रेचिंग भी करें।

श्यामवर्ण (एन्थ्रेक्नोज):

यह रोग एक प्रकार की फफूंद कोलेटोट्राईकम लेजीनेरम से होता है। यह रोग तरबूज, कद्दू में अधिक होता है जबकि पेठा में भी यह रोग अधिक होता है। यह रोग गर्म व आर्द्र मौसम में अधिक फैलता है तथा पौधे की किसी भी वृद्धि अवस्था में आ सकता है। पुरानी पत्तियों पर छोटे जलयुक्त या पीले धब्बे बनते है। ये धब्बे कोणीय अथवा गोलाकार हो सकते है बाद में ये आपस में मिल जाते है तथा सूख जाते है। पत्ती का यह सूखा भाग झड़ जाता है। खीरा, खरबूजा, लौकी की पत्तियों पर कोणीय या खुरदरे गोल धब्बे दिखाई देते हैं जो पत्ती के बड़े भाग या पूरी पत्ती को झुलसा देते है।

रोकथामः

  • कद्दूवर्गीय जंगली पौधों को निकाल कर नष्ट कर दें।
  • बीज को थाइरम या बाविस्टीन 2 ग्राम प्रतिकिग्रा बीज से उपचारित करके बुवाई करें।
  • मैंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से सात दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें।

चूर्णिल आसिताः

इस रोग में पत्ती की ऊपरी सतह पर सफेद या धुधंले धूसर रंग के छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं। जो बाद में पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। पत्तियों व फलों का आकार छोटा व विकृत हो जाता है व पौधों की पत्तियां असमय गिर जाती है।

रोकथामः

  • रोग ग्रसित पादप अवशेषों को नष्ट कर दें।
  • रोग की प्रारम्भिक अवस्था में कैराथेन 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

पत्ती झुलसाः

सर्वप्रथम पत्ती पर हल्के भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं जो बाद में गहरे रंग के व आकार में बड़े हो जोते हैं। पत्तियों पर धब्बे केन्द्रीयकृत गोलाकार में बनते है, जिससे पौधों की पत्तियाँ झुलसी हुई दिखाई देती हैं।

रोकथामः

  • स्वस्थ बीज प्रयोग करें।
  • उचित फसल चक्र अपनायें।
  • फसल पर इंडोफिल एम-45, 2-3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

कुकुम्बर मोजेकः

इस रोग से ग्रसित होने पर पौधे छोटे रह जाते हैं तथा ग्रसित पौधों की नयी पत्तियाँ छोटी आकार की तथा पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। पत्तियाँ सिकुड़कर मुड़ जाती है तथा पीले रंग का मोजेक क्रम दिखाई देता है। जिन्हें क्लारोटिक पेचेंज कहते है। कुछ फूल गुच्छे में दिखाई देते है। फल छोटे व विकृत हो जाते है या फलन बिल्कुल नहीं होता है।

रोकथामः

  • उपचारित बीज ही बुवाई हेतु प्रयोग करें।
  • रोगग्रस्त पौधों व जंगली खरपतवारों को उखाड़कर जला दें।
  • इमिडाक्लोप्रिड (3-5 मि.ली./15 लीटर पानी) दवा का एक सप्ताह के अंतराल पर खड़ी फसल पर दो बार छिड़काव करें जिससे वाहक नष्ट हो जाते हैं।

मृदुरोमिल आसिताः

इस रोग में पत्ती की ऊपरी सतह पर हल्के कोणीय धब्बे दिखाई देते है तथा पत्ती की निचली सतह पर मृदुरोमिल फफूंद बैंगनी रंग की दिखाई देती है। फल आकार में छोटे हो जाते हैं तथा रोगी पौधे के पीले धब्बे जल्द ही लाल भूरे रंग के हो जाते हैं।

रोकथामः

  • रोग रोधी किस्मों की बुवाई करें।
  • फसल पकने के बाद फसल अवशेषों को जला दें।
  • खड़ी फसल पर मैंकोजेब 0.2 प्रतिशत की दर से छिड़काव करें।

कलिका उत्तकक्षयः

पत्तियों की शिराओं पर नेक्रोसिस धारियां बन जाती है। पर्व छोटे रह जाते है। उत्तकक्षय हो जाने से कलिका सूख जाती है। धीरे-धीरे कलिका वाली पूरी शाखा सूखने लगती है। पत्तियाँ सिकुड़कर पीली पड़ जाती है।

रोकथामः

  • रोगग्रस्त पादपों को उखाड़कर जला दें।
  • स्वस्थ बीजों को बोयें।
  • इमिडाक्लाप्रिड 3-5 मिली. प्रति 15 लीटर पानी की दर से दो बार छिड़काव करें।
  • खेत के चारों ओर बाजरा की फसल उगायें इससे यह रोग कम आता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।