
मटर की खेती करने की उन्नत तकनीक Publish Date : 31/10/2025
मटर की खेती करने की उन्नत तकनीक
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा
मटर की खेती के लिए एक उचित फॉर्मूलाः बीज की उचित मात्रा, उर्वरक और बुवाई से बढ़ती है पैदावार। पूरे देश में अब रबी फसलों की बुवाई आरम्भ हो चुकी है। वैसे तो रबी सीजन की प्रमुख फसलें गेहूं और सरसों को माना जाता है, लेकिन देश में इस सीजन के दौरान दलहनी फसलें भी बड़े पैमाने पर उगाई जाती है, जो किसानों को अच्छा एवं लाभकारी सौदा साबित होती हैं।
मटर भी एक ऐसी ही दलहनी फसल है, जो न केवल पौष्टिक गुणों से भरपूर होती है, बल्कि भारतीय रसोई में भी इसकी अपना एक विशेष महत्व है। साथ ही, मटर का उपयोग दाल के रूप में भी किया जाता है। अगर आप भी इस सीजन में मटर की खेती करने का विचार बना रहे हैं, तो इसके लिए आपको सबसे पहले खेत की तैयारी और उचित देखभाल और उन्नत किस्मों के बारे में जानकारी होना बहुत जरूरी है। सही तकनीक और अच्छे ख्याल से आप मटर की बेहतरीन पैदावार प्राप्त कर सकते हैं और इसके माध्यम से एक शानदार आय अर्जित कर सकते हैं।
मटर की खेती के लिए खेत की तैयारीः
मटर एक शीत ऋतु की फसल है, जो ठंडे मौसम में अच्छी पैदावार देती है। इस फसल के लिए भुरभुरी और दोमट मिट्टी उत्तम मानी जाती है, क्योंकि ऐसी मिट्टी में जल संचय और वायु का संचार अच्छे तरीके से हो पाता है। मटर के अंकुरण के लिए 22 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसके अलावा, मटर की वृद्धि के लिए 13 से 18 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे आदर्श तापमान माना जाता है। पाले के प्रभाव से मटर की फसल को काफी नुकसान भी हो सकता है, विशेष रूप से इसकी पुष्पन अवस्था के दौरान। इसलिए, मटर को पाले से बचाने के लिए खेत की उचित देखभाल करना बहुत जरूरी है। मटर की फसल को पाले से सुरक्षित रखने के लिए खेत में पलेवा (गहरी जुताई) करना और पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखना महत्वपूर्ण कृषि कार्य है।
बीज दर- शीघ्र पकने वाली किस्मों के लिए 100-120 किग्रा एवं मध्यम व देर से पकने वाली किस्मों के लिए 80 से 90 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है।
बीज उपचार- बीज को थायरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम या बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित अवश्य कर लें और इसके बाद 3 ग्राम प्रति किलोग्राम राइजोबियम के साथ भी मटर के बीज को उपचारित करें।
बीज की दूरी- शीघ्र तैयार होने वाली किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 5-6 सेमी. बनाकर रखें। मध्यम एवं देर से पकने वाली किस्मों में, 45 सेमी. पंक्ति से पंक्ति तथा पौधे से पौधे की दूरी 8-10 सेमी. की दूरी रखें। खेत में पलेवा देकर बतर आने पर 5-7 सेमी. गहराई पर बीज की बुवाई करें।
खाद एवं उर्वरक- अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद 20 टन प्रति हे. की दर से खेत की तैयारी के समय खेत में अच्छी तरह से मिला दें। 40 किग्रा यूरिया, 375 सिंगल सुपर फास्फेट किग्रा. एवं 50 म्यूरेट ऑफ पोटाश बुवाई के समय ही खेत में दें।
मटर की उन्नतशील किस्में:

पूसा प्रगतिः इस किस्म की मटर में फलियों की लंबाई 9-10 सेमी एवं प्रति फली 8-10 दाने पाये जाते है। इस कस्म की पहली तुड़ाई 60-65 दिन में हो जाती है और इसके साथ ही यह पाउडरी मिल्डयु के लिए एक प्रतिरोधी किस्म है। इसकी उपज 70 क्विंटल हरी फलिया प्रति हेक्टेयर है।
पीएलएम-3: मटर इस किस्म की फलियों की लम्बाई 8-10 सेमी एवं फलियों में 8-10 दाने पाये जाते है। इसकी पहली तुड़ाई 60-65 दिन में हो जाती है। इसकी उपज 90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरी फलियां है।
जवाहर मटर-3: मटर की यह किस्म टी-19 एवं अर्लीबेजर के क्रास से विकसित की गई है। इस किस्म में फलियों की लम्बाई 6-7 सेमी एवं फली में दाने 7 तक होते है। इसकी उपज 75 क्विंटल प्रति हे. हरी फलियां है।
जवाहर मटर-4: यह किस्म बीज की बुवाई से 75 दिन में पककर तैयार हो जाती है। फलियों की लम्बाई 7 सेमी एवं फलियों में 6 दाने पाये जाते है। इसके साथ ही इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा 28.7 प्रतिशत तक उपलब्ध होती है।
जवाहर मटर-1: यह किस्म जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय के द्वारा विकसित की गई है। इस किस्म के फलों की तुड़ाई 70-80 दिन में आरंभ हो जाती है। इसकी उपज 90-120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरी फली है। फली में दानों की संख्या 8 से 9 एवं प्रोटीन प्रतिशत 24.6 प्रतिशत तक होता है।
मटर में खरपतवार नियंत्रण

खेतों में पलेवा करके खेत को अच्छी तरह से तैयार करने में ही काफी संख्या में खरपतवार खत्म हो जाते हैं। रसायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 48 घंटे के भीतर पेंडीमिथालीन नामक दवा 3.3 किग्रा/हे. की दर से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना उचित है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
