
सभी विचार धाराओं में मनुष्य Publish Date : 07/11/2026
सभी विचार धाराओं में मनुष्य
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
हजारों वर्षों से धरती पर मनुष्य न केवल निवास कर रहे हैं बल्कि विभिन्न क्षेत्रों और समूहों में रहते हुए विभिन्न प्रकार की विचार धाराएं भी विकसित हुई हैं। क्योंकि यह सभी विचार मनुष्यों द्वारा ही किए गए हैं अतः विश्व की सभी प्रकार की विचार धाराओं में मनुष्य केंद्रबिंदु रहा है। मनुष्य का विचार मनुष्य के लिए हुआ परंतु फिर भी इन सभी धाराओं में अनेक प्रकार की भिन्नता है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हिमालय से कन्याकुमारी तक फैली भूमि अर्थात भारत में जो विचार प्रवाह विकसित हुआ वह विश्व की अन्य सभी विचार धाराएं से पूरी तरह भिन्न रहा।
विश्व में अन्य स्थानों पर जहां मनुष्य ने केवल अपने शरीर को ही सब कुछ समझा और उसी के सुख को अपना सर्वस्व सुख माना है वहीं भारत के लोगों ने मनुष्य के अस्तित्व को केवल शरीर के अस्तित्व तक सीमित नहीं रखा अतः शारीरिक सुख से परे भी सुख की अवधारणा विकसित हुई। यह कोई सिद्धांत नहीं बल्कि यहां के लोगों ने व्यवहार किया और अनुभव किया जिसके आधार पर यह सिद्धांत विकसित हुआ। अन्य विचार धाराएं जहां मनुष्य को संकीर्णता में धकेलती हैं वहीं भारतीय चिंतन मनुष्य को उदारता की तरफ ले जाते हुए पूरे संसार को अपना और अपने जैसा अनुभव करवाती है।

एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य, एक जीव का दूसरे जीव से, एक वनस्पति का दूसरी वनस्पति से, या यह सभी एक दूसरे के भी जीवन में सहायक क्यों बनते हैं? इनका कोई न कोई संबंध तो है। धरती के सभी समूहों ने मनुष्य कैसा हो यह विचार तो किया है लेकिन इन सभी संकल्पनाओं के मनुष्यों आज कोई पूरे विश्व को स्वीकार्य है तो वह भारत का मनुष्य है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।