आस्मिक उत्कर्ष      Publish Date : 03/11/2026

                    आस्मिक उत्कर्ष

                                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

सही अर्थों में मनुष्य बनने के लिए व्यवहार, आचार, संस्कार और स्वभाव-इन चारों का परिष्कार आवश्यक है। व्यवहार में करुणा और मृदुता का समावेश होना चाहिए। जब तक मनुष्य अपने व्यवहार को क्रूरता से मुक्त नहीं करेगा, तब तक सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। करुणामय व्यवहार ही स्वस्थ समाज की आधारशिला है। मनुष्य की दूसरी बड़ी कमजोरी विषमता है। समाज में एक ओर असीम संपन्नता है, तो दूसरी ओर अभाव की स्थिति।

यह असमानता सामाजिक तनाव और संघर्ष को जन्म देती है। मनुष्य की तीसरी दुर्बलता है- स्वयं को हानि पहुँचाने वाली प्रवृत्तियां. क्रोध, अहंकार, भय, लोभ और वासना जैसे आंतरिक विकार मनुष्य को भीतर ही भीतर जलाते रहते हैं। ये केवल मन को ही नहीं, शरीर और भावनाओं को भी रोगग्रस्त बना देते हैं। इसलिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने आवेगों और कषायों पर नियंत्रण स्थापित करे तथा आत्मानुशासन का विकास करे।

                              

सही अर्थों में मनुष्य बनना ही जीवन की सबसे बड़ी साधना है। जब मनुष्य करुणा, समता और आत्मसंयम को जीवन में उतार लेता है, तभी वह अपने आस्मिक उत्कर्ष की दिशा में अग्रसर होता है और मानवता को नई ऊंचाइयों तक ले जाता है। इसके लिए अध्यात्म में गोता लगाना जरूरी है। अध्यात्म का अर्थ है- अपने भीतर स्थित दिव्यता का जागरण. मनुष्य तभी सही अर्थों में मनुष्य बनता है, जब वह बाह्य उपलब्धियों से ऊपर उठकर आत्मा के स्वर को सुनना प्रारंभ करता है।

करुणा, समता, अहिंसा और आत्मसंयम केवल नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि आत्मा की सहज अभिव्यक्तियां हैं। जब मनुष्य अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह पर विजय प्राप्त कर आत्म-साक्षात्कार की दिशा में अग्रसर होता है, तभी उसका जीवन साधना बन जाता है। अध्यात्म मनुष्य को केवल बेहतर व्यक्ति ही नहीं बनाता, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सेतु भी बनता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।