
आखिर फूटने लगे अंखुएं Publish Date : 31/10/2026
आखिर फूटने लगे अंखुएं
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं अन्य
-
इन्फ्रास्ट्रक्चर और नए जमाने वाले सेक्टर इसमें अगुआई करते दिख रहे। लेकिन क्षमता बढ़ाने को लेकर कंपनियों का रुख अब भी सावधानी भरा है।
सरकार ने जब इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़े जारी किए, तो दो तरह के आंकड़ों को बड़ी जिज्ञासा के साथ देखा गया। ये थेरू निवेश और खपत, जो अर्थव्यवस्था की ग्रोथ के मुख्य इंजन हैं। पहली तिमाही में निवेश पिछले साल के मुकाबले करीब 12 फीसद बढ़ा जबकि खपत में सात फीसद की बढ़ोतरी हुई।
निवेश के आंकड़े खास तौर पर अहम थे। कई सालों से केंद्र सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर को तेजी देने के लिए कैपिटल एक्सपेंडिचर (पूंजीगत खर्च) पर भारी व्यय कर रही है। इस उम्मीद में कि इस निवेश खर्च के कारण कॉर्पाेरेट सेक्टर भी जोरदार निवेश करेगा और देश में नई नौकरियां पैदा करने में मदद मिलेगी जिनकी देश को बेहद जरूरत है। लेकिन निजी निवेश सुस्त ही बना हुआ है। इस कारण नीति-निर्माता इससे जूझ रहे हैं कि प्राइवेट सेक्टर का निवेश कैसे बढ़ाया जाए।
पैदल वालों का हक सबसे पहले
जरा सोचकर देखिए! पैदल चलने के लिए भी आपको संविधान की शरण लेनी पड़े तो कैसा लगेगा। भारत कुछ ऐसी ही स्थिति में है। 19 जून को एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुरक्षित और स्पष्ट रूप से निर्धारित फुटपाथों पर चलने का हक संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 में निहित है, जो स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का आधार हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पैदल चलने वालों के अधिकार “प्राथमिक” हैं और मोटर आवागमन पर उन्हें वरीयता दी जानी चाहिए।
यह फैसला 2014 में आंध्र प्रदेश के रायदुर्ग में पांच वर्षीय मणियार साहेब की सड़क दुर्घटना में मौत के मामले से जुड़ा था। मामला मुआवजा विवाद से शुरू हुआ, जो आगे मौलिक अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल में बदल गया। बीते 15 वर्षों में कई शहरों ने पैदल चलने के अनुकूल सड़कों की समस्या पर नए सिरे से सोचा है। 2012 से बेंगलुरु, चेन्नई और पुणे ने शहरी सड़क डिजाइन से जुड़े कार्यक्रमों को पायलट स्तर पर लागू किया। पर ऐसे प्रयास काफी कम हैं। ऐसे में कोर्ट का आदेश सही वक्त पर आया है। हर स्थानीय प्राधिकरण पर अब सुरक्षित फुटपाथों के निर्माण और रखरखाव की कानूनी रूप से बाध्यकारी जिम्मेदारी है। पहली मिसाल आंध्र प्रदेश ने पेश की, जिसने 8 अगस्त को “पैदल यात्री सुरक्षा और सार्वभौमिक सुलभता नीति 2026” को मंजूरी दी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा
- सुरक्षित और स्पष्ट रूप से निर्धारित फुटपाथों पर चलना मौलिक अधिकार है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 से मिलता है।
- पैदल यात्रियों के अधिकार “प्राथमिक” हैं और उन्हें मोटर वाहनों के आवागमन पर वरीयता दी जानी चाहिए।
- सुरक्षित फुटपाथ बनाना और उसका रखरखाव करना हर नगर निगम, शहरी विकास प्राधिकरण और पंचायत का कानूनी दायित्व है।
शहरों से आखिर कहां हुई चूक
- शहरी सड़क डिजाइन के मानक मौजूद हैं मगर उन्हें कभी अनिवार्य नहीं बनाया गया।
- सड़क निर्माण के टेंडर में मुख्य सड़क को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि फुटपाथ का काम ठेकेदारों पर छोड़ दिया जाता है या उनको पूरी तरह से हटा ही दिया जाता है।
- अगर कहीं सड़कों का निर्माण समग्र शहरी डिजाइन के अनुरूप किया भी जाता है, तो वहां भी नियमित रखरखाव बहुत कम होता है।
क्या किए जाने की है जरूरत
यह समझना होगा कि फुटपाथ, सड़क और नालियां एक ही व्यवस्था का हिस्सा हैं। टेंडर में डिजाइन संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन अनिवार्य हो और तैयार परियोजनाओं में नियमित रखरखाव सुनिश्चित किया जाए।
- पैदल यात्रियों को प्राथमिकता देने वाली व्यवस्था लागू की जाए. फुटपाथों को बाधाओं से मुक्त रखा जाए और दिव्यांगजनों के लिए भी उनकी पहुंच पक्की की जाए।
- सड़क व्यवस्था से जुड़े विभिन्न समूहों इंजीनियरों, ठेकेदारों और ट्रैफिक पुलिसक को बहुत अच्छे ढंग से प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
सामाजिक सुधार या ध्रुवीकरण?
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले मदरसों पर कार्रवाई और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के तहत नए निकाहनामे की कवायद ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। सरकार इसे शिक्षा व्यवस्था में सुधार, कानून के अनुपालन और महिला अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में जरूरी कदम बता रही है। विपक्ष और मुस्लिम संगठनों की नजर में यह चुनाव से पहले सामाजिक ध्रुवीकरण की रणनीति है। यानी मुद्दा सिर्फ मदरसों या निकाहनामे का नहीं, बल्कि उस सियासी संदेश का भी है जो इन फैसलों के जरिए समाज तक पहुंचाया जा रहा।
राज्य सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के सचिव डॉ0 पराग मधुकर धकाते के मुताबिक, निर्धारित मान्यता और शैक्षिक मानकों का पालन न करने वाले मदरसों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। देहरादून, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल के हल्द्वानी क्षेत्र में अब तक 17 मदरसों को सील किया गया है। तीन के संचालकों ने उन्हें बंद करने की लिखित सूचना दी है। देहरादून की आजाद कॉलोनी में मदरसा जामिया-तुस-सलाम अला-इस्लामिया को सील किया गया, तो मदरसा दार-ए-अरकम और मदरसा दारुल उलूम रहीमिया के प्रबंधकों ने संचालन बंद करने संबंधी अंडरटेकिंग दी। हल्द्वानी और ऊधमसिंह नगर में भी ऐसी ही कार्रवाई हुई। बाजपुर में चार मदरसों को सील किया गया। प्रशासन का कहना है कि निरीक्षण के दौरान संचालक जरूरी दस्तावेज और मान्यता संबंधी कागजात पेश नहीं कर सके।
सरकार की दलील है कि यह कार्रवाई किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने 1 जुलाई, 2026 से उत्तराखंड मदरसा बोर्ड समाप्त कर उसकी जगह उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया है। सरकार का उद्देश्य मदरसों को उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड से जोड़ना, एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम लागू करना और विज्ञान, गणित तथा कंप्यूटर जैसी आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देना बताया गया है।
मगर यहीं से विवाद की दूसरी परत सामने आती है। कुछ मदरसा संचालकों का दावा है कि उन्होंने मान्यता या पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी थी और इसके लिए शुल्क भी जमा किया था। बाजपुर के मदरसा जामिया हनफिया रज़ाउल उलूम के संचालक इरशाद अली के अनुसार, उन्होंने अधिकारियों को आवेदन और शुल्क जमा करने की रसीद भी दिखाई, फिर भी संस्थान सील कर दिया गया. उनका दावा है कि एक बैठक में उन्हें रजिस्ट्रेशन के लिए 30 सितंबर तक वक्त दिए जाने की सूचना मिली थी।
कुछ मदरसा संचालकों ने नई मदरसा शिक्षा व्यवस्था और मान्यता संबंधी प्रावधानों को नैनीताल हाईकोर्ट में चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नई व्यवस्था में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण और शिक्षा बोर्ड से मान्यता की अनिवार्यता के कारण कई संस्थानों के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं। प्रारंभिक सुनवाई में अदालत ने सरकार से जवाब मांगा है।
सरकार ने यूसीसी को लेकर भी एक नया संदेश देने की कोशिश की है। उत्तराखंड वक्फ बोर्ड और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग एक नए आधिकारिक निकाहनामा मॉडल पर काम कर रहे हैं। वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स के अनुसार, प्रस्तावित मॉडल में दूसरी, तीसरी और चौथी शादी के प्रावधान वाले कॉलम हटा दिए गए हैं. यूसीसी के तहत एक समय में एक ही विवाह को मान्यता देने की व्यवस्था लागू है।
प्रस्तावित निकाहनामे में पंजीकृत मौलवी या काजी के जरिए निकाह, पहचान संबंधी दस्तावेज और शपथपत्र जैसी औपचारिकताओं को भी महत्व दिया गया है। सरकार का तर्क है कि इससे विवाह के पंजीकरण में पारदर्शिता आएगी और पहचान छिपाकर या गलत जानकारी के आधार पर होने वाली शादियों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी।
दूसरी ओर, मुस्लिम धर्मगुरुओं और कुछ संगठनों का आरोप है कि निकाहनामे के जरिए धार्मिक मामलों में दखल बढ़ाया जा रहा है। उनका तर्क है कि विवाह और पारिवारिक कानून से जुड़े मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत कानून की संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों का आरोप है कि चुनावी माहौल में इन मुद्दों को प्रमुखता देकर सरकार ध्रुवीकरण को हवा दे रही है। उनका कहना है कि यदि कार्रवाई नियमों के उल्लंघन पर आधारित है तो सभी संस्थानों पर समान मानक और पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया लागू होनी चाहिए। अतिक्रमण हटाने के अभियान को भी इससे जोड़ा जा रहा है।
वहीं, सरकार के अनुसार, सरकारी और वन भूमि से अवैध कब्जे हटाने की कार्रवाई बिना भेदभाव की जा रही है। सरकार के दावों के मुताबिक, अब तक बड़ी संख्या में मजारों, मस्जिदों और मदरसों समेत धार्मिक ढांचों को अतिक्रमण की श्रेणी में कार्रवाई का सामना करना पड़ा है और हजारों एकड़ भूमि को कब्जे से मुक्त कराया गया है।
असल सवाल यही है कि इन कदमों को जनता कैसे देखती है। इन मुद्दों को सरकार ने एक साथ बहस में ला दिया है। अब देखना है कि यह एजेंडा सामाजिक सुधार की जमीन मजबूत करता है या चुनावी ध्रुवीकरण की।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।