नई शताब्दी में संघ की भूमिका      Publish Date : 30/10/2026

         नई शताब्दी में संघ की भूमिका

                                                                                                                          प्रो0 आर. एस. सेंगर

आज के 101 वर्ष पूर्व विजयादशमी के अवसर पर ही अपने हिन्दू समाज को रावण के दस शीशों की तरह दस बुराइयों से मुक्त करने का एक कार्य  प्रारंभ हुआ, जो कालांतर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। सनातन परंपरा का संवाहक हिंदू आत्म शून्यता के रसातल में चला गया था इसलिए विदेशी गौरव को  न केवल गर्व से स्वीकार करने लगा था बल्कि उसके प्रभाव में भारत एक राष्ट्र के भाव को ही भूल गया था।

सामाजिक कुरीतियों के प्रभाव में स्वयं को हिंदू कहने का भय इतना बढ़ गया था कि इतिहास से अपनी जिन सद्गुण विकृतियों से सबक लेना चाहिए था उसका गुणगान करने लगे थे। अपने ही भाइयों के प्रति संवेदन शून्यता इस स्तर पर पहुंच गई थी कि परस्पर अविश्वास के कारण प्राप्त पराधीनता को ही अपना भाग्य समझ कर सभी प्रकार के धर्म की गलत परिभाषा गढ़ने में अपना समाज लग गया था। हिंदू का भाग्य हिंदू ही बदलेंगे कोई बाहर से नहीं आएगा। अतः इन बुराइयों को समाप्त कर एक संगठित आत्मविश्वास से भरा हुआ संपूर्ण संसार के कल्याण की कामना के लिए शक्ति संपन्न हिंदू समाज का चित्र विश्व पटल पर उपस्थित करने वाले कार्य की यात्रा आज नई शताब्दी में प्रवेश कर चुकी है।

                                     

शताब्दी पूर्व जिस कार्य को हिंदू समाज में भी असंभव कहा जाता था आज उसी कार्य की स्वीकार्यता संपूर्ण विश्व में व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन के आदर्श संस्करण के रूप में हो रही है। इस स्वीकार्यता को संघ कार्य की भारत में सफलता के रूप में समझा जा सकता है। पिछली शताब्दी में रावण के दस शीशों का दहन हुआ और नई शताब्दी में दस दिशाओं में नए परिवर्तन के अंकुरण को पुष्पित पल्लवित करना है। सामाजिक समरसता जहां कुरीतियों को समाप्त करने के लिए है वहीं पर्यावरण का संरक्षण तीनों लोकों में प्रकृति के संचालन का मार्ग सुगम करेगा।

स्व भाव का जागरण हमे आत्म विस्मृति से मुक्त कर नागरिक कर्तव्य के नए सोपान लिखने की प्रेरणा देगा। परिवार संस्था को प्रभावी करने के पीछे भारत का विमर्श बदलने की शक्ति स्पष्ट अनुभव की जा सकती है। पूरे संसार में विश्व बंधुत्व का भाव देने का सामर्थ्य और जिम्मेदारी यदि धरती पर किसी के पास है तो वह भारत ही है, लेकिन यह करते समय हमे अपनी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के प्रति भी सचेत रहना होगा क्योंकि आसुर शक्तियों के पास भी  तकनीकी का वही स्तर है जो हमारे पास है।

                               

हर युग में धर्म और अधर्म एक दूसरे के सम्मुख खड़े हुए हैं लेकिन हर बार विजय श्री धर्म को ही प्राप्त हुई है। हमारे राष्ट्र को सभी चुनौतियों के सम्मुख विजय शाली बनाए रखें और हम सभी धर्म के मार्ग पर निरंतर बढ़ते रहें विजयादशमी पर ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं और ऐसा करने के लिए हम साधना कर सकें इस आशीष की कामना भी करते है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।