
जानामि धर्मं न च में प्रवृत्ति Publish Date : 28/10/2026
जानामि धर्मं न च में प्रवृत्ति
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
मै धर्म को जनता हूं लेकिन यह मेरी प्रवृत्ति नहीं है, यह कहने और करने वालों का इतिहास कोई नया नहीं है बल्कि हर युग में रहा है। कंस,दुर्योधन, कर्ण,भीष्म, धृतराष्ट्र जैसे कितने ही उदाहरण भरे हैं, केवल यही नहीं स्वयं अर्जुन भी मोह ग्रस्त हो कर धर्म के मार्ग पर चलने में असमर्थता जताने लगे थे।
मनुष्य कभी भी धर्म के मार्ग पर चलने के प्रति अर्जुन की तरह उदासीन या कौरवों की तरह अरुचि वाला हो सकता है यह मनुष्य की प्रवृत्ति है, इसलिए कौरव हों या पांडव दोनों का उद्धार करने के लिए कृष्ण को आना ही होता है। कृष्ण केवल मार्गदर्शक ही नहीं है बल्कि उस अभिभावक की तरह हैं धर्म के मार्ग पर चलने को केवल प्रेरित ही नहीं करते बल्कि बाध्य कर देते हैं, कौरव और पांडव दोनों एक जैसे हैं कृष्ण दोनों को बाध्य करते हैं लेकिन कौरव फिर भी अधर्म का मार्ग छोड़ कर धर्म के मार्ग पर नहीं बढ़ते हैं और पांडव बढ़ जाते हैं।

कृष्ण ने किसी से कोई भेदभाव नहीं किया क्योंकि उनका गीता का ज्ञान और विराट रूप दोनों पक्षों के नायकों ने देखा था इधर अर्जुन ने तो उधर भीष्म ने। गीता ने धर्म का ज्ञान कराया तो विराट दर्शन ने उसके अनुपालन को बाध्य किया। अर्जुन को यह समझ में आ गया, भीष्म को नहीं आया, परिणाम के रूप में भारत के एक बड़े ऐतिहासिक युद्ध ने जन्म लिया अनेकों वंशावलियां समाप्त कर दी।
अधर्म की कीमत सभी को चुकानी होती है जैसे किसी सड़े फूल या फल की दुर्गंध आस पास सबको भुगतनी पड़ती है। यही स्थिति धर्म के रूप में सुगंधित पुष्प के साथ भी है। हम सदैव धर्म का अनुसरण करते रहे ऐसी शक्ति श्री कृष्ण हम सभी को प्रदान करें ऐसी प्रार्थना है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।