रक्षा का संकल्प      Publish Date : 27/10/2026

                  रक्षा का संकल्प

                                                                                                                  प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

शरीर का कोई अंग स्वयं में कैसा भी हो लेकिन उसकी उपयोगिता और उसका जीवन अस्तित्व शरीर के साथ ही है। इसी प्रकार मनुष्य स्वयं कितने ही गुणों से युक्त क्यों न हो उसका अस्तित्व तो सजीवों के संसार में ही रहता है। आत्मा देह को प्राप्त करने के बाद ही धर्म का प्रकटीकरण कर पाती है और यह धर्म सदैव किसी और के प्रति व्यवहार से संबंधित होता है। 

हमारे आस पास जो कुछ भी है उसकी रक्षा इस लिए करनी है कि वे हैं तब तक ही हम हैं, यह चिंतन विश्व में सर्वत्र में किसी न किसी रूप में स्वीकार किया ही गई है। किसी ने मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा अर्थात समाज से ही मनुष्य है, यदि समाज नहीं तो मनुष्य भी नहीं। इसी समाज को संरक्षित करने की भावना का संकल्प है रक्षा बंधन। अपना इतिहास और उससे प्राप्त प्रेरणाएं सदैव इस संकल्प को प्रभावी बनाती हैं कि जब हम किसी की रक्षा करने को संकल्पित होते हैं तब स्वयं ही अपना जीवन अर्थ पूर्ण लगने लगता है।

                             

हमारे परिवार, हमारे गांव मुहल्ले, हमारा देश, पर्यावरण, वे सभी लोग जो किसी  न किसी रूप से हमसे जुड़ हैं उन सभी की रक्षा का संकल्प हमारे जीवन को सदैव सही मार्ग पर चलाने में सहायक सिद्ध होता है। इतिहास प्रमाण है कि जब जब समाज में एक दूसरे की सुरक्षा का संकल्प कमजोर हुआ तब तब अराजकता और संवेदनहीनता में वृद्धि आई और पूरा समाज ही संकट ग्रस्त हुआ।

सड़क पर चलते हुए ऑफिस में काम करते हुए या फिर घर में परिवार के साथ रहते हुए, सदैव एक दूसरे की सुरक्षा का भान रखना और प्रयास करना ही इस रक्षा बंधन का उद्देश्य है अतः आइए हम सब अपने राष्ट्र के साथ संपूर्ण विश्व की सुरक्षा करने के लिए अपने आस पास उनकी सुरक्षा का संकल्प लें जिन्हें इसकी अत्यंत आवश्यकता है। रक्षा बंधन की अनेक अनेक शुभेक्षा।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।