सब कुछ ठीक हो जाएगा, परन्तु कब तक      Publish Date : 25/10/2026

    सब कुछ ठीक हो जाएगा, परन्तु कब तक

                                                                                                                   प्रो0 आर. एस. सेंगर  

’यह हमेशा से ही कहा जाता रहा है कि सकारात्मक रहो, परन्तु इसमें सवाल उठता है है कि किस हद तक और क्या सकारात्मकता की भी कोई सीमा होती है।’

कई बार जब आप बहुत अधिक दुःखी होते हैं और ऐसे में कोई आकर मुस्कुराते हुए आपसे बस इतनी सी बात कह दे ‘अरे, सब कुछ ठीक हो जाएगा, चिल करो!’ इस दौरान यह कहने वाले की नीयत चाहे कितनी अच्छी भले ही हो, परन्तु उस पल आपका मन करता है कि आप उस व्यक्ति पर चिल्ला पड़ें। इस दौरान आपको हर हाल में बोलना ही पड़ता ही है सब कुछ ठीक है, यह सबकुछ ठीक है बोलने और जबरदस्ती मुस्कुराने का यही दबाव को आजकल ‘टॉक्सिक पॉजिटिविटी’ कहलाती है।

                               

ऐसे में मेडिकल साइंस का भी यही मानना है कि दुःख, गुस्सा या एदासी जैसी भावनाओं को छिपाना कोई समझदारी नहीं अपितु अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ करना भी साबित हो सकता है।

टॉक्सिक पॉजिटिविटी का अर्थ

टॉक्सिक पॉजिटिविटी का अर्थ है कि सम्बन्धित व्यक्ति से हर परिस्थिति में जबदस्ती सकारात्मक बने रहने की उम्मीद करना और नकारात्मक भावनाओं को नजरअंदाज करना। यह उस समय दिखाई देती है, जब कोई दुःख, गुस्सा या परेशानी के बताए जाने पर कहे कि ‘सब ठीक हो जाएगा’ या ‘हमेशा खुश रहो।’ इससे भावनाओं को समझने के बजाय उन्हें दबाने का अहसास अधिक होता है।

इमोशनल सप्रेशन का खतरा

जब हम अपने दुख या डर को बलपूर्वक दबाते हैं और बाहर से खुश होने का नाटक करते हैं, तो मेडिकल साइंस इस स्थिति को ‘इमोशनल सप्रेशन’ कहता है। इस सम्बन्ध में किए गए न्यूरोलॉजिकल शोध बताते हैं कि भावनाओं को दबाने से शरीर में स्ट्रेस हॉर्मोन कॉर्टिसोल का स्तर तेजी से बढ़ता है। इसके कारण नींद का न आना, सिर में दर्द आदि समस्याओं के साथ हमारा इम्यून सिस्टम भी कमजोर होने लगता है। उदासी का अनुभव करना कमजोरी की कोई निशानी नहीं होती है, बल्कि यह हमारे मस्तिष्क का एक स्वाभाविक हीलिंग प्रोसेस होता है।

  • 301 कर्मचारियों के एक अध्ययन, जिसमें 76.4 प्रतिशत महिलाएं थी, में पाया गया कि टॉक्सिक पॉजिटिविटी भावनात्मक थकान और शर्म महसूस कराती है।
  • 31.75 प्रतिशत लोगों ने बताया कि वह अधिकाँश समय दूसरे लोगों की टॉक्सिक पॉजिटिविटी को पहचान लेते हैं।
  • 13.9 प्रतिशत भारतीय लोगों में मानसिक विकारों का जीवन काल प्रसार भावनाओं को दबाने वाले व्यवहारों के रूप में पाया गया है।

‘मैं तुम्हारे साथ हूँ’

                                    

यदि आपका कोई मित्र अथवा सहेली या घर का कोई सदस्य परेशान है तो आप उसे ‘सब ठीक हो जाएगा’ के जैसी टॉक्सिक पॉजिटिविटी की बाते बोलने के बजाय सॉलिडैरिटी स्टेटमेंट्स का उपयोग करें, जैसे ‘यह एक कठिन समय है’ या ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ’ के जैसे वाक्य कहें। आप मन की भावनाओं को दबाने के स्थान पर उन्हें नाम भी दे सकते हैं। ‘नेम इट टू टेम इट’ तकनीक के अनुसार, ‘मुझे गुस्सा आ रहा है’ या ‘मैं निराश हूँ’ जैसे शब्द कहने से भावनाओं को स्वीकार करने में सहायता प्राप्त होती है और इससे तानव का स्तर भी कम हो सकता है।

आपको स्वीकार करना सीखना होगा

टॉक्सिक पॉजिटिविटी, प्रत्येक नकारात्मक भावना को जबरन सकारात्मक सोच से ढ़क देने का एक तरीका है और यह तरीका हमारी मानसिक सेहत के लिए हानिकारक होता है। इससे व्यक्ति वास्तविक भावनाओं को दबाने, अपराधबोध का अनुभव करने और समस्याओं को नजरअंदाज करने लगता है। लम्बे समय तक ऐसा करते रहने से तनाव, चिंता, भावनात्मक थकान और आत्मसम्मान में कमी की स्थिति आती है। अतः आपको सलाह दी जाती है कि दुख, गुस्सा या निराशा आदि भावनाओं को नकारने के स्थान पर उन्हें स्वीकार करें, समझें और सही व्यक्यिों से सहायता प्राप्त करें।

पेरशानी न बने

टॉक्सिक पॉजिटिविटी कई बार स्वयं पर भी अत्याधिक दबाव बनाती है। ऐसे में हर समय आपो खुश दिखने या अपनी स्वाभाविक भावनाओं को छिपाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि दुख, गुस्सा और थकान आदि भावनाएं भी हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा होती हैं। ऐसी स्थिति में हमें अपनी भावनाओं को स्वीकार करना चाहिए और अपने आपको समझने का पूरा समय देना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार किसी विश्वासपात्र व्यक्ति से बात भी की जा सकती है। बेशक सकारात्मक सोच बहुत अच्छी चीज है, किन्तु वास्तविकता को नकारना भी कोई सही बात नहीं होती है। इसलिए आप स्वयं के प्रति बेशक दयालू रहें, लेकिन इसके साथ ही अपनी सीमाओं को पहचानकर उनके दायरे में रहें।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।