जीवन की सार्थकता      Publish Date : 24/10/2026

                  जीवन की सार्थकता

                                                                                                                   प्रो0 आर. एस. सेंगर

जीवन सृष्टि का सबसे बड़ा रहस्य और ईश्वर के द्वारा प्रद्वत सबसे बड़ा उपहार है। जीवन के जन्म और मृत्यु के बीच का समय मात्र ही नहीं है, बल्कि यह चेतना, कर्म, अनुभव संघर्ष और आत्मविकास की एक सतत यात्रा होती है। मानव जीवन तभी सफल होता है, ज बवह अपने अस्तित्व के उद्देश्य को समझते हु स्वयं के साथ ही साथ समाज और समस्त सृष्टि के कल्याण हेतु अपना सहयोग समर्पित करें। दार्शनिक दृष्टि से भारतीय चिंतन जीवन को आत्मा की अनंत यात्रा एक पड़ाव मात्र मानता है।

भगवद् गीता के अनुसार शरीर नश्वर है, परन्तु आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। इसलिए जीवन का वास्तविक लक्ष्य केवल भौतिक सुख सुविधाओं का संग्रह करना ही नहीं होता, अपितु यह आत्मज्ञान, सत्य, करूणा और धर्म के मार्ग पर चलकर अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करता है।

                               

इस प्रकार से देखा जाए तो जीवन न तो भाग्य का खेल है और न ही केवल इच्छाओं की पूर्ती का साधन है। जीवन आत्मविकास, लोकमंगल और सर्त्मों का अवसर होता है। अतः जीवन के प्रत्येक क्षण को मल्यवान मानते हुए यदि मानव सत्य, प्रेम, सेवा और परिश्रम को अपने जीवन का मंत्र बना ले तो उसका जीवन स्वयं उसके लिए आनंद का स्रोत औश्र समाज के लिए प्रेरणा का एक प्रकाश स्तम्भ बन जाता है। व्यवहारिक दृष्टि से भी जीवन निरंतर सीखने, कर्म करने और परिस्थितियों के साथ संतुलन स्थापित करने की कला ही एक नाम होता है। जीवन में सफलता और असफलता, सुख और दुःख, लाभ एवं हानि आदि सभी जीवन के शिक्षक होते है।

                            

ऐसे में जा व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी धर्य, परिश्रम करते हुए सकारात्मक बना रहता है, वही इस जीवन केी परीक्षा में सफल हो पाता है। परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का पूरी ईमानदारी के साथ निवर्हन करना जीवन की सार्थाकता के आधार सतम्भ होते हैं। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करने में समाज एवं राष्ट्र का जो योगदान होता है, उसका ऋण चुकाने का सबसे उत्तम उपाय भी यही होता है कि व्यक्ति अपनी सार्थक भूमिका से राष्ट्र और समाज को समृद्व करने का महत्वपूर्ण कारण बनें और यही मानव के जीवन की वास्तविक सफलता और सर्वोच्च उपलब्धि होती है।   

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।